संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

गैस पीडि़तों के साथ धोखे का अंतहीन सिलसिला

? एल.एस.हरदेनिया

               2-3 दिसंबर 1984 की भयानक रात यूनियन कार्बाइड काॅर्पोरेशन के भोपाल स्थित संयंत्र में नियमित रख-रखाव कार्य के दौरान रिसते हुए वाल्वों व जंगदार पाइपों के माध्यम से बहुत सारा पानी एक स्टोरेज टैंक में घुस गया। इसके कारण 60 टन प्राणघातक रसायन मिथाइल आइसो सायनेट (टी.एल.वी 0.02 पीपीएम) से भरे टैंक क्रमांक ई-610 में प्रतिक्रिया स्वरूप भारी मात्रा में गर्मी व दबाव उत्पन्न हुए और मिथाइल आइसो सायनेट, हाईड्रोजन साइनाइड, मोनो मिथाइल अमीन, कार्बन मोनोआक्साइड सहित 20 अन्य रसायनों का यह 40 टन जहरीला मिश्रण घने बादलों की शक्ल में फैलने लगा जबकि सुरक्षा तंत्र (जो कि अव्वल तो ऐसी जोरदार प्रतिक्रियाओं के लिहाज से नाकाफी थे) या तो बंद थे या ठीक से काम नहीं कर रहे थे या फिर उनकी मरम्मत हो रही थी। फैक्ट्री से निकला गैस का यह बादल ठंडी व हल्की उत्तरी हवाओं पर सवार हो, 5 लाख सोते लोगों पर छा गया। यह जहरीला बादल 20 से 30 फिट ऊंची दीवार की शक्ल में जमीन को घेरता हुआ आगे बढ़ गया और रात एक बजे तक पूरा शहर एक गैस चैम्बर में तब्दील हो गया।

            रिसन के समय फैक्ट्री के सायरन जान-बूझकर बंद रखे गये, जिससे लोगों को रिसाव का पता तभी लगा जब जहरीली गैस ने उन्हें घेर लिया। लोग खांसते-हांफते हुए उठे। उनकी आंखे जल रही थीं मानो वे आग पर रखी हों। गैस से घिर चुके लोग पूरे के पूरे परिवार, बच्चों को गोद में उठाये भागने लगे और शहर छोड़ने की फिराक में भागते लोगों के सैलाब ने, कई छोटे-छोटे बच्चों के हाथ उनके मां-बाप के हाथों से छुड़वा दिये। लोग अपना शारीरिक नियंत्रण खो बैठे और उनका मलमूत्र अपने आप बह निकला। कुछ लोग अनियंत्रित बेहिसाब उल्टियां करने लगे और दिमागी बुखार की टूटन से गिरकर मर गये। गैस के कारण लोगों के फेफड़े जलने लगे। इससे उनके अंदर इतना पानी बना कि उनके फेफड़े पानी से भर गये और वे अपने ही शारीरिक द्रव्यों में डूबकर मर गये।

               3 दिसंबर 1984 मरते लोगों से घिरे भोपाल के अस्पतालों के डाक्टर यह नहीं जानते थे कि इसका इलाज क्या है। इलाज की जानकारी के लिए उन्होंने यूनियन कार्बाइड के चिकित्सा अधिकारी को बुलाया। उसने बताया कि यह गैस आंसू गैस के समान ही है और इलाज के लिए आपको बस आंखों को पानी से धो देना है। अस्पतालों के मुर्दाघर लाशों से पट गये थे। कब्रिस्तान और श्मशान लाशों के अम्बार से निपटने में असमर्थ थे और अगले तीन दिन, तीन रात तक शहर के विभिन्न हिस्सों में अनवरत रूप से अंतिम संस्कार होते रहे। दुर्घटना के तत्काल बाद हुई मृत्युओं की संख्या के बारे में निश्चितता से शायद ही कभी पता चले, लेकिन स्वतंत्र एजेंसियों के बहुत ही सुरक्षित अनुमानों के अनुसार भी, पहले तीन दिनों में करीबन 8000 लोग मौत की नींद सो गये। सरकारी एजेंसी इंडियन कांउसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च का निष्कर्ष है कि करीबन 5,20,000 गैस प्रभावित लोगों के खून में यह जहर बह रहा था, जिसने उनके शरीर के लगभग प्रत्येक तंत्र को हानि पहुंचायी।

             3 दिसंबर 1984 के बाद झूठ व फरेब का एक अंतहीन सिलसिला प्रारंभ हो गया। सभी झूठ बोल रहे थे, सभी धोखा दे रहे थे। सबसे बड़ा झूठ यूनियन कार्बाइड की तरफ से बोला जा रहा था। जब हजारों लोग अंतहीन पीड़ा से गुजर रहे थे, जब लोगों को ऐसा लग रहा था कि उनके जीवन का वह अंतिम दिन है, उस समय यूनियन कार्बाइड की ओर से यह कहा जा रहा था कि जो गैस लोगों ने सूंघी थी, जिस रसायन ने उनकी आंखों पर असर किया है, उससे आंखों को उतना ही नुकसान होगा जितना अश्रु गैस से होता है। पीडि़तों से कहा गया कि पानी से आंखे धो लीजिए सब ठीक हो जाएगा। फरेब और धोखे से भरी बात यूनियन कार्बाइड का डाॅक्टर कह रहा था। इतना बड़ा झूठ बोलकर डाॅक्टर ने अपने पवित्र प्रोफेशन से गद्दारी की थी।

              कार्बाइड के अलावा राज्य सरकार ने भी अपना उत्तरदायित्व ठीक से नहीं निभाया। जिस फैक्ट्री ने हजारों लोगों की सामूहिक हत्या की, उसके कर्ताधर्ताओं को दंडित करने के लिए कोई कारगार कदम नहीं उठाया गया। जब कोई व्यक्ति हत्या करता है तो उसे तुरंत हिरासत में ले लिया जाता है, परंतु जिनकी लापरवाही से चंद घंटों में हजारों लोगों ने मुत्यु का आलिंगन कर लिया है, उन्हें एक दिन भी हिरासत में नहीं रखा गया।

               गैस रिसन के बाद राज्य सरकार ने एक जांच आयोग का गठन किया। परंतु कुछ दिनों बाद उसे भी भंग कर दिया गया। यदि आयोग को भंग ही करना था तो उसे गठित ही क्यों किया गया? अमेरिकन यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष एंडरसन यहां आए। वे क्यों आये थे? उनसे किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया। वैसे ऐसे समय जब भोपाल के लाखों लोग आक्रोशित थे भोपाल आकर एंडरसन ने बड़ा खतरा मोल लिया था। क्या वे पीडि़तों से मिलने आए थे या उनके आने का असली उद्देश्य कुछ और था? यह आज तक पता नहीं लगा। उन्हें गिरतार कर लिया गया। मुझे लगता है कि उनकी गिरतारी एक राजनीतिक स्टंट था। अब न एंडरसन जीवित है और ना ही तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह, जिनने एंडरसन की गिरतारी का आदेश दिया था। इसलिए एंडरसन की गिरतारी और उनकी रिहाई के रहस्य का पर्दा नहीं उठ पायेगा।

              घटना के बाद दर्जनों की संख्या में अमरीकी वकील भोपाल आ गये। इन वकीलों को अमरीका में एंबुलेंस चेजर कहा जाता है। ये वकील गैस पीडितों का शोषण न कर पाएं इसलिए भारत सरकार ने संसद से एक कानून पारित करवाया। इस कानून के अनुसार गैस पीडि़तों की ओर से मुकदमा लड़ने का अधिकार और पैरवी करने की जिम्मेदारी भारत सरकार ने ले ली। यह कहना कठिन है कि भारत सरकार का यह निर्णय सही था या नहीं। परंतु बाद का घटनाक्रम बताता है कि भारत सरकार ने यह उत्तरदायित्व ईमानदारी से नहीं निभाया। यदि भारत सरकार ने यह उत्तरदायित्व ठीक से निभाया होता तो विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के लिए उत्तरदायी लोगों को कम से कम फांसी की सजा हो गई होती। परंतु सजा मिलना तो दूर सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन कार्बाइड को अपघटित जिम्मेदारी से ही मुक्त कर दिया। यह सभी को ज्ञात है कि जिन न्यायाधीश ने यूनियन कार्बाइड को यह वरदान दिया था वे बाद में इंटरनेशनल कोर्ट में न्यायाधीश बन गए थे। बाद में इस निर्णय के विरूद्ध प्रधानमंत्री व्ही.पी. सिंह ने अपील की थी परंतु भारत सरकार के ढीले रवैये के कारण गैस पीडि़तों को यथेष्ठ क्षतिपूर्ति नहीं मिल सकी। यदि ऐसी घटना अमरीका में हुई होती या ऐसी घटना से कोई अमरीकी प्रभावित होता तो उसे हमारी तुलना में भारी भरकम रकम क्षतिपूर्ति के रूप में मिलती। अमरीका अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर संभव कीमत चुकाने को तैयार रहता है, उसी अमरीका ने हमारे देश के इन निर्दोष इंसानों की मौत पर एक आंसू तक नहीं बहाया। जहां तक मुझे याद पड़ता है, अमरीका की ओर से शोक संदेश तक नहीं आया। गैस रिसन के बाद अनेक बार हमारे प्रधानमंत्री अमरीका गए होंगे। इसी तरह वहां के राष्ट्रपति भारत आए होंगे। दुःख की बात है कि इन यात्राओं के दौरान एक बार भी यह मामला दोनों की वार्ताओं के एजेण्डे पर नहीं रहा।

               इतने वर्षों के बाद, आज भी यह पता नहीं लग सका है की गैस पीडि़तों के इलाज की सर्वाधिक प्रभावशाली दवा क्या है। इस बीच भोपाल में अनेक विदेशी डाक्टर आए, डाक्टरों के सम्मेलन भी हुए। सम्मेलनों के दौरान इन डाक्टरों ने आश्वासन दिए कि वे अपने देशों में पहुंचकर प्रभावशाली दवाएं बताएंगे। परंतु वे वायदे भी वायदे ही रह गए। भारत में भी इस संबंध में गंभीर अनुसंधान नहीं हुए।

             गैस पीडि़तों के हितों के संरक्षण के लिए अनेक संगठन बने। इन संगठनों ने गैस पीडि़तों के हितों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। परंतु संगठनों में यदि आपसी प्रतिस्पर्धा नहीं होती तो गैस पीडि़तों के हितों की बेहतर देखभाल हो सकती थी। त्रासदी का एक दुःखद पहलू यह भी है कि अनेक ऐसे लोगों ने भी क्षतिपूर्ति पाने के लिए झूठ का सहारा लिया और यह दावा किया कि गैस रिसन की रात्रि को वे भोपाल में थे। अनेक मामलों में गैस अदालतों, वकीलों और डाक्टरों की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए गए हैं।


 

? एल.एस.हरदेनिया