संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

बेजबरुआ कमेटी की रिपोर्ट पर चुप क्यों है मोदी

? राजीव कुमार यादव

                पिछले दिनों दिल्ली में एक और मणिपुरी छात्र जिनग्रान केन्जू का शव उनके घर से बरामद हुआ। उनके शरीर पर कई जगह गहरे जख्मों के निान थे। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन सालों 2011 से 2012 में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ अपराध में 270 फीसदी की वृद्धि हुई है। जिसमें छेड़खानी की घटनाओं में 177 फीसदी और बलात्कार में 17 फीसदी की वृद्धि हुई है।

                मौजूदा राजग सरकार पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति कितनी संवेदनशील है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीदो तानिया की दिल्ली में 29 जनवरी 2014 को हुई हत्या के बाद पूर्वोत्तर राज्यों से आने वाले लोगों की स्थिति का जायजा लेने के लिए गठित बेजबरुआ कमेटी की रिपोर्ट 11 जुलाई 2014 से ही गृह मंत्रालय के पास पड़ी है। लेकिन आज तक उस पर अमल करना तो दूर,संसद में बहस तक नहीं हुई है। जबकि चुनाव प्रचार के दौरान मोदी पूर्वोत्तर में जाकर दिल्ली में उनके साथ होने वाले र्दुव्यवहार को भारतीयता के खिलाफ बताते नहीं थकते थे। जाहिर है, बेजबरुआ कमेटी जो इस बात को स्प्टता से रखती है कि मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता के मुकाबले पूर्वोत्तर के लोगों को सबसे ज्यादा दिल्ली में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है, पर मोदी सरकार का यह रवैया पूर्वोत्तर के लोगों के लिए अच्छे दिनोंकी आमद तो नहीं है। खासकर तब जब पूर्वोत्तर को कथित भारतीय मुख्यधारा से जोड़ने के नाम पर मोदी सरकार ने अरुांचल के किरन रिजीजू को गृह राज्य मंत्री बनाया है,जो इस मसले पर संसद में कह चुके हैं कि पूर्वोत्तर के लोगों के साथ होने वाली भेदभाव की घटनाएं तथ्यात्मक नहीं हैं और उनके खिलाफ होने वाले हमले नरुद्येष्य हैं।

                सवाल उठता है कि क्या पूर्वोत्तर भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव सिर्फ एक दुखद आंकड़े हैं। जिन्हें कानून व्यवस्था को चुस्त करके ठीक किया जा सकता है?या मोदी सरकार की असंवेदनशीलता या गृहराज्य मंत्री का बयान किसी भी अन्य मसले की तरह सिर्फ टालूरवैया है? या फिर पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति कथित मुख्यधारा के भारतीयों खासकर दिल्ली के,का यह व्यवहार एक खास किस्म के सामाजिक सांस्कृतिक और राजनैतिक अवधारणा की देन है।

                 दरअसल, देखा जाए तो इस समस्या की सबसे बड़ी वजह भारतीयता का उत्तर भारतीय अवधारणा है। जो अपने को देश के केन्द्र में मानते हुए स्वयं को मुख्य धारा कहता है। जबकि बाकियों को उत्तर-पूर्व या दक्षिण भारतीय कहकर उन्हें इस कथित मुख्यधारा से बाहर मानता है। जो एक तरह से पूर्वोत्तर या दक्षिण भातीयों के दोयम दर्जे का नागरिक मानने की मानसिकता की पृष्ठभूमि तैयार करता है। जिसका एक मजबूत सांस्कृतिक स्रोत उत्तर भारतीय समाज जो भाषाई स्तर पर हिन्दी भाषी और धार्मिक और नस्लीय रूप से हिन्दुत्ववादी और आर्यवादी है, उसका दूसरे नस्लों से पूर्वोत्तर के संदर्भ में मंगोलियाई और दक्षिण के संदर्भ में अनार्य, से घृणा है। जो कितनी मजबूत है इसका अंदाजा इससे लग जाता है कि हमारे इतिहास के स्कूली पाठ्यक्रम जो किसी भी देश में राष्ट्रवाद का सबसे मजबूत स्रोत होता है से पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत एक सिरे से गायब है। इस हिन्दी पट्टी का शायद ही कोई छात्र मिजोरम, त्रिपुरा या केरल के स्वतंत्रता संग्रामी का नाम बता पाए। इसमें भी पूर्वोत्तर की स्थिति और बुरी है। एक आम उत्तर भारतीय इन राज्यों के इतिहास के बारे में सिर्फ यही मिथक जानता है कि महाभारत के अर्जुन की ादी मणिपुर की राजकुमारी उलूपी से हुई थी और राजनीतिक जानकारी रखता है कि इन राज्यों पर चीन की नजर है जिसे बचाना है। यानी हमारी कल्पनाओं में पूर्वोत्तर सिर्फ एक रणनीतिक भू भाग है जिसे सैन्य तरीके से बचाना है।
जाहिर है इस मानसिकता के साथ पली बढ़ी आबादी अगर उन्हें बाहरी की तरह देखती है तो उनके नजरिए में कानूनों को सख्त बनाकर बदलाव नहीं लाया जा सकता। यह दूसरे तरह के और गहरे सामाजिक सांस्कृतिक प्रकृया से गुजरे बगैर संभव नहीं है।

                मसलन हिन्दी पट्टी के उलट पूर्वोत्तर का समाज मातृ सत्तात्मक है जहां महिलाएं पुरुों से कहीं ज्यादा सामाजिक-आर्थिक सक्रियता रखती हैं। लिहाजा उनमें खुलापन भी कहीं ज्यादा है। ऐसे में दिल्ली, जहां राजनीतिक और सांस्कृतिक दबदबा पुरुष प्रधान उत्तर भारतीयों का है, में पूर्वोत्तर की महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी किसी भी दंडात्मक प्रक्रिया के बल पर सुनिश्चित नहीं कराई जा सकती। उसके लिए सबसे अहम शर्त है कि पहले उत्तर भारतीय समाज अपने पुरुष प्रधान ढांचे को तोड़े। लेकिन क्या मारल पुलिसिंग खाप, बलात्कार के लिए महिलाओं को जिम्मेदार मानने की मानसिकता और दिल्ली से सटे हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बच्चियों को गर्भ में ही मार डालने के सामाजिक संकट वाले समाज में इसकी उम्मीद की जा सकती है?

                  दूसरे, पूर्वोत्तर को लेकर यह सौतेली मानसिकता राजनीति में भी तार्किक तौर पर प्रतिबिंबित होती है। इसीलिए हम देखते हैं कि पूर्वोत्तर के लोगों को कथित मुख्यधारा से जोड़ने का कोई राजनीतिक एजेंडा किसी भी पार्टी के पास नहीं है। दिल्ली की सरकार उन्हें सिर्फ विकास के नाम पर आर्थिक पैकेज देकर जोड़ना चाहती है या फिर रणनीतिक तौर पर राष्ट्रवाद के सैन्य पहलुओं मसनल आफ्स्पा जैसे कानूनों के जरिए। जो दरअसल विलगाव ही पैदा करता है। जिसमें सत्तारूढ़ भाजपा सरकार और संघ परिवार का रवैया संकट को और ज्यादा बढ़ाने वाला है। क्योंकि संघ परिवार पूर्वोत्तर के राज्यों को ईसाई खंड मानता है। जो उसके भारत के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना में कहीं फिट नहीं बैठता।

                 इसीलिए उसके पास इन सात राज्यों के लिए अपनी एक अलग ही रणनीति है। उनमें मुस्लिम विरोधी भावना को भड़का कर उन्हें हिन्दुत्व की मुहिम में रणनीतिक रूप से इस्तेमाल करने का। जिसकी तस्दीक इस तथ्य से हो जाती है कि अगस्त 2012 में दक्षिण भारत में पूर्वोत्तर के लोगों में दहशत फैलाने के लिए हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े लोगों ने फर्जी एमएमएस को बल्क में भेजकर यह अफवाह फैलाया था कि मुसलमान उन पर बड़े पैमाने पर हमला करने वाले हैं। जिसके बाद हजारों की संख्या में पूर्वोत्तर के लोग पलायन कर गए थे। गौरतलब है कि इस मामले में हिंदुत्ववादी संगठनों का हाथ पाया गया था। जिन्होंने फर्जी एमएमएस में तिब्बती आंदोलनकारियों के आत्मदाह के फुटेज को दिखाते हुए कैप्शन लगाए थे कि ये आसाम के बोडो हिन्दू हैं जिन्हें मुसलमानों ने जला दिया है। जिसके बाद केन्द्र सरकार ने मामले की जांच करते हुए नफरत फैलाने वाले वेबसाइटों को प्रतिबंधित करना ुरू किया तो उसमें अधिकतर वेबसाइट हिंदुत्ववादियों द्वारा संचालित पाए गए।

                इसलिए बेहतर यही है कि मोदी सरकार लुकईस्ट पालिसी के तहत दूसरे देशों को भारत से जोड़ने से पहले पूर्वोत्तर के लोगों को दिली तौर पर देश के दूसरे लोगों से जोड़े। ताकि मिजोरम के मुख्यमंत्री लालथन हावला को वह दुबारा न कहना पड़े जो उन्हं 2009 में सिंगापुर में कहना पड़ा था कि उनसे भारत में लोग पूछते है कि क्या वे भारतीय हैं?


 

? राजीव कुमार यादव