संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

राहुल को साहसी बनना होगा
 

? मणिशंकर अय्यर

              युवक कांग्रेस और एन.एस.यू.आई. के चुनावों से हमें सबक लेना होगा कि हम इन चुनावों को बंद न करें बल्कि पार्टी अध्यक्श सहित कांग्रेस के प्रत्येक विभाग और स्तर पर ऊपर से नीचे तक चुनाव करवायें और टिकट वितरण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनायें। दिसंबर 2013 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी पराजय के तत्काल बाद राहुल गांधी ने घोणा की थी कि वे कांग्रेस को इस तरीके से बदलने जा रहे है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

              राहुल द्वारा पार्टी में बदलाव करना वैसा आसान साबित नही हुआ जैसा शायद उन्होने एक साल पहले सोचा था। जैसा कि हम जानते है, उनके (शायद) उग्र सुधारवादी विचारों के खिलाफ कांग्रेस में एक रूढि़वादी तत्व भी मौजूद है जो उन्हे उस मार्ग की ओर आगे बढ़ने पर चेतावनी देता है जिस मार्ग पर बहुत थोड़ी यात्रा की गई हो। आखिरकार, यह वर्तमान व्यवस्था ही है जिसने कांग्रेस को सीताराम केसरी के अध्यक्ष पद से निकाले जाने के दुःखद प्रसंग के उपरान्त कठिन परिश्रम और जी-जान से पुनः खड़ा किया था। यह वही व्यवस्था है जिसने 2004 में कांग्रेस को विजय दिलाई। और यह वही कांग्रेस है जिसने हमें 2009 में जबरदस्त जीत दिलाई, जब पार्टी ने 65 सीटों की बढ़त के साथ अपनी सीटों को 141 से बढ़ाकर 206 कर लिया। वह भी सत्ता विरोधी लहर की पूरी अवधि के बावजूद। पार्टी को इस बार बहुत तगड़ा झटका जरूर लगा है लेकिन सिर्फ एक झटके की वजह से आमूलचूल परिवर्तन क्यों? दूसरी ओर पार्टी के भीतर उग्र सुधारवादी तत्व राजीव गांधी द्वारा 1885 में दिये गये उस भाषण की ओर इशारा करते है जो उन्होनें कांग्रेस की स्थापना के शताब्दी समारोह में दिया था तथा कहा था कि सत्ता के दलालों को उनके अड्डे से खदेड़ने की जरूरत है (जैसा कि जीसस ने मुद्रा विनिमय करने वालों को मंदिर से बाहर निकाल दिया था।) इसी घोषणा के परिणामस्वरूप तत्पश्चात हुये चुनावों में पार्टी की सबसे बड़ी विजय हुई थी। यद्यपि राजीव के शेष कार्यकाल में उस टिप्पणी पर कम ही ध्यान गया लेकिन उसका परिणाम उमाशंकर दीक्षित रिपोर्ट में सामने आया जिसमें पार्टी के लोकतंत्रीकरण के लिये रोडमेप तैयार किया गया था। राजीव की आशंकाओं का कांग्रेस को तब अहसास हुआ जब पांच साल बाद हुये लोकसभा चुनाव में पार्टी 1984 की तुलना में आधी से भी कम सीटों पर खिसक गई। निःसंदेह विपक्ष में बैठने पर पार्टी का प्राथमिक कार्य दीक्षित रिपोर्ट पर पुनः विचार कर उसे अमल में लाना था। कांग्रेस कार्य समिति ने 4 अप्रेल 1990 को आयोजित एक बड़ी बैठक में दीक्षित कमेटी की सिफारिशों का समर्थन किया था। उन सिफारिशों को जुलाई 1990 के मध्य में मावालंकार हाल में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में प्रस्तुत किया गया जहां उन्हे खूब सराहा गया।

              लेकिन सिर्फ एक पखवाड़े बाद मंडल और कमण्डल संघर्ष हो गया जिसके परिणामस्वरूप वी.पी. सिंह सरकार के बिखर जाने के संकेत मिल रहे थे। उसके संक्षिप्त अंतराल के बाद अल्पसमय के लिये चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने और मार्च 1991 में पुनः चुनाव की स्थिति निर्मित हो गई। दो महीने बाद राजीव की हत्या हो गई और पार्टी में सुधार के लिए उनकी योजनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। तब से उन योजनाओ को पुनर्जीवित नहीं किया गया है। यद्यपि, प्रथम ए.के.एंटनी समिति (1999) ने पार्टी सुधार के लिये की गई सिफारिशों के अंत में यह सुझाव दिया था कि पार्टी प्रत्याशियों के टिकिट लोकसभा चुनाव के 6 माह पहले एवं विधानसभा चुनावों के 3 माह पहले घोषित किये जायेंगे - इस अनुशंसा का कांग्रेस कार्यसमिति भी अनुमोदन कर चुकी है लेकिन तब से लेकर आज तक वे सिर्फ धूल खा रही है।

                जब राहुल ने कहा था कि वे पार्टी को इस तरह से बदल देंगे कि आप कल्पना भी नही कर सकते तो पता नही उनके मन में क्या था। किन्तु यह अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नही होगा कि एंटनी-दीक्षित समिति की अनुशंसाओं सहित जो भी उनके मन में था वह एक सीमा तक उनके द्वारा किये गये कार्यो और प्रयासों में दिखाई देता है जो उन्होने कांग्रेस महासचिव रहते हुये युवक कांग्रेस और एन.एस.यू.आई. में बदलाव के लिये किये।
इन दो संस्थाओं में कराये गये चुनावों ने एक ऐसी पार्टी के गलियारों में आंतरिक प्रजातंत्र के झोंके का अहसास कराया जिसमें सितंबर 1950 के नासिक चुनाव के बाद से ब्लाक स्तर से अकबर रोड़ तक कोई भी चुने हुये पदाधिकारी नही थे। नासिक चुनाव नेहरू और पार्टी की कठोर धर्मनिरपेक्ष विंग से निराशा के बाद संपन्न हुये थे, जिनमें पुरूषोत्तमदास टंडन को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था, तब से लेकर आधी से ज्यादा सदी बीत जाने तक पार्टी के सुखद और लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव नही हुये है। राहुल द्वारा युवा कांग्रेस, एनएसयूआई में चुनाव के जो प्रयोग किये वे पूर्णतः सफल नही हुये। इसमें धन और बाहुबल का प्रयोग होने के अप्रिय सबूत भी मौजूद थे। इसके अलावा, कई प्रमुख मुख्यधारा के कांग्रेस परिवारों ने अपने उत्तराधिकारियों को इन मुख्य संगठनों में चुनाव जीतते हुये देखा। यदि इन चुनावों की परिणति भी मनोनयन की ही भांति हुई तो इनका क्या औचित्य था? खैर, इसका एक संभावित जवाब यह है कि अगर पितृ संस्था संरक्षण प्रदान करने तक सीमित रहकर कार्य करती है तो निःसंदेह वैसे ही नतीजे मुख्य अनुषंगी संगठनों के चुनावों के भी आयेंगे। लिहाजा हम इससे सबक लें कि दीक्षित-एंटनी के सुझाये पथ का परित्याग न करें बल्कि कांग्रेस के प्रत्येक विभाग और प्रत्येक स्तर पर नीचे से ऊपर तक चुनाव करवायें जिसमें पार्टी का सर्वोच्च पद भी शामिल हो और टिकिट वितरण की प्रक्रिया को पारदर्शी बनायें।

              मई 2014 की अभूतपूर्व पराजय के बाद यदि कोई चीज पार्टी में जान डाल सकती है तो वह पार्टी के चुनाव ही होंगे। फिर भी पार्टी में उन लोगों को भी उचित महत्व देना होगा जो बदलावों को स्वीकार करने में गंभीर अवरोध पैदा करते है। यह देखना होगा कि सुधारवादी और रूढि़वादी विचारों में किस प्रकार साम्य स्थापित किया जा सकता है?

                 रूद्रांग्शु मुखर्जी की बहुत ही उत्कृष्ट और शानदार किताब नेहरू एण्ड बोसः पेरेलल लाइव्स पिछले महीने प्रकाशित हुई है जो शायद उस पहेली के जवाब की ओर इशारा करती है। यह पुस्तक उस दुविधा से सरोकार रखती है जो नेहरू के समक्ष 1936-37 में उस समय पैदा हो गई थी जब गांधीजी के प्रेरित करने पर उन्होने अनिच्छापूर्वक कांग्रेस का नैतृत्व करने की चुनौती को स्वीकार किया था। गांधीजी इसे कांटों का ताज कहते थे। वह भी तब जब 1937 के प्रथम आमचुनाव सिर पर आ गये थे। नेहरू की गहरी अरूचि का कारण यह था कि कांग्रेस के वरिष्ठ नैतृत्व के मध्य उनके बहुसंख्यक साथियों को उनके पूर्ण स्वराज्य और समाजवाद जैसे विचार स्वीकार नही थे और उन लोगों में महात्मा गांधी भी सम्मिलित थे। नेहरू उस समय 47 साल के थे अर्थात राहुल की वर्तमान उम्र से ज्यादा अन्तर नही था और उनके परंपरागत विरोधी काफी अधिक उम्र के थे। वह बात जिसने उन्हे सबसे ज्यादा परेशान किया वह यह थी कि वे पार्टी को एक ही दिशा में ले जाने का दिखावा कर रहे थे जबकि दूसरे अनेक लोग जो उनके साथ होने चाहिये थे, कांग्रेस को एक दूसरी या वास्तव में विपरीत दिशा में खींच रहे थे?

              आखिरकार, शीघ्र वे खुद ही लोगों के पास गये और उन्होने लगातार भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक ट्रेन, हवाई जहाज, कार, साइकिल, घोड़े की पीठ पर बैठकर, हाथी पर बैठकर और पैदल यात्राएं करके प्रचार किया। उन्होने देश के कोने-कोने में जाकर लोगों से उनकी बोली और मुहावरों में ऐसे विषयों पर बात की जो प्रायः गूढ़ थे। लोगों ने उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुना। देश में ऐसा प्रचार पहले कभी नही देखा गया था। इसके परिणामस्वरूप 11 प्रांतों में से 8 में पार्टी की भारी जीत हुई। इस जीत के पश्चात वे दृढ़ता से चाहते थे कि कांग्रेस उन्हे अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से मुक्त कर दें किन्तु इस प्रस्ताव को प्रांतीय प्रमुखों द्वारा खारिज कर दिया गया था तथा वे भी अपनी जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिये उतने ही व्यग्र थे। इस आशंका की पुष्टि हो गई थी कि वे कांग्रेस अध्यक्ष बनने के इच्छुक नही थे लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के तंग घेरे के बाहर लोगों ने गांधी के बाद उनका सबसे अधिक लोकप्रिय नेता के रूप में सम्मान किया। लोकप्रियता के मामले में उनका सिर्फ सुभाषचन्द्र बोस से ही मुकाबला था जिन्होने नेहरू के बाद 1938 में कांग्रेस की बागडोर संभाली।

             सुभाषचन्द्र बोस का उग्र सुधारवाद 41 साल की उम्र में (आज के राहुल की तुलना में वे छोटे थे।) नेहरू से भी अधिक कठोर और सुदृढ़ था। नेहरू के उन लोगों से पूर्णतः मतभेद थे जिन्हे वे ओल्ड गार्ड कहा करते थे। उनका गंभीर रूप से स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद उन्होने ओल्ड गार्ड्स को साधकर रखने की भरपूर कोशिश की तथा अपने सिद्धान्तों अथवा व्यापक उद्धेश्य पर नजर रखते हुये ओल्ड गार्ड का भी पार्टी में समायोजन किया। वे जब भी लोगों के बीच गये उन्होने उनका एक नायक की तरह स्वागत हुआ।

             पार्टी के बड़े नेताओं, कार्यकर्ताओं और व्यापक जनसमूह से सीधे की गई अपील में वे इतने सफल थे कि गांधीजी के न चाहने के बावजूद वे डटकर खड़े रहे और दूसरे कार्यकाल में भी कांग्रेस को जीत दिलाई। यह दुखद था कि इसके परिणामस्वरूप नेहरू और बोस में दरार पैदा हो गई और बोस ने अपनी अलग पार्टी फारवर्ड ब्लाक का गठन कर लिया। इसके बाद नाटकीय रूप से वे अंग्रेजों के जाल से बचकर जर्मनी चले गये। वहां से वे पंडुब्बी के माध्यम से टोक्यो पंहुचे और बाद में ताइपे में विमान दुर्घटना में उनका दुखद अंत हो गया। लेकिन उन्होने अपने देशवासियों के दिलों में और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में खुद के लिए एक चिरकालिक स्थान बना लिया है।

            नेहरू की 125 वीं जयंती के अवसर पर मैं राहुल को मुखर्जी की छोटी सी कृति, विशेषकर अध्याय 5 पार्टी अध्यक्षगण ( पेज 137 से 174) तक पढ़ने की अनुशंसा करता हूँ। यह उनकी शंकाओं का समाधान कर सकती है और उन्हे खुद के लिये तय किये गए मार्ग पर साहसपूर्वक आगे बढ़ने में मदद कर सकती है।


 

? मणिशंकर अय्यर