संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

गांधी की तारीफ हृदय परिवर्तन नहीं मोदी का अवसरवाद है
 

? मसीहुद्दीन संजरी

             प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तमाम जुमलेबाजियों के बाद भी ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिख रहा है जिससे लोगों को अच्छे दिनों के आने की आहट भी मिल सके। वहीं अब यह भी साफ होता जा रहा है कि चुनाव पूर्व अपने वादों के अनुरूप सरकार के पास देश को आर्थिक महाशक्ति बनाने या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए भी कोई रोडमैप नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें सरकार अपने ही चुनाव पूर्व किए गए भारी भरकम वादों के दबाव में आ गई दिखती है।

              ऐसे में भावनात्मक मुद्दों पर उसकी निर्भरता आने वाले समय में और बढ़ने वाली है। जहां एक तरफ देश की साझा विरासत का मान रखना इसकी मजबूरी है तो वहीं साम्प्रदायिक संगठनों के विश वमन पर आंखें बंद रखना इसकी ज़रूरत है। महात्मा गांधी के नाम का कसीदा भी पढ़ना है और गोडसे के प्रसंशकों की पीठ भी थपथपानी है। यही कारण है कि जब मोहन भागवत यह बयान देते हैं कि भारत में बसने वाले सभी लोग हिंदू हैं तो प्रधानमंत्री उस पर चुप्पी साध लेते है। इसे किसी एक व्यक्ति के बयान के तौर पर नहीं देखा जा सकता। वह एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे एक ऐसे संगठन के मुखिया हैं जहां नरेंद्र मोदी भी नेकर पहन कर कतार में खड़े होते हैं। इसी विचारधारा की पैदावार नाथू राम गोडसे भी था जिसने राश्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की थी। यह कोई आरोप नहीं बल्कि तथ्य है कि आरएसएस और हिंदू महासभा पूरी तरह नाथू राम गोडसे के पीछे खड़ी थी और बापू की हत्या के बाद इनके सदस्यों ने मिठाई बांटी थी। इनके इसी आचरण की वजह से सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इन संगठनों पर प्रतिबंध भी लगाया था। इनके उस दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, गोडसे आज भी इनका नायक है। फिर यह कैसे सम्भव है कि इन संगठनों के प्रति भी उसकी निष्ठा बनी रहे और महात्मा गांधी और सरदार पटेल भी उसके आदर्श हों।

             जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आस्ट्रलिया के शहर ब्रिस्बेन में गांधी प्रतिमा का अनावरण करते हुए यह कहते हैं कि दो अक्टूबर को पोरबंदर में एक व्यक्ति का जन्म नहीं हुआ था बल्कि एक युग का जन्म हुआ था।

             गांधी जी आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने अपने जीवन काल में थे तो यह वक्तव्य विश्व स्तर पर इस शांति दूत और उसके विचारों के प्रति श्रद्धा और स्वीकार्यता की मजबूरी है, उनके विचारों के प्रति सम्मान या आदर भाव नहीं। यह दोगलापन है। अमरीका की यात्रा के दौरान भी प्रधानमंत्री का चैंका देने वाला वक्तव्य सामने आया था। जब उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि मुसलमान अपने देश के लिए जीते हैं और उसी के लिए मरेंगे। मुसलमानों की देश भक्ति पर कोई सवाल नहीं। भारत का मुसलमान अलकायदा को कभी कामयाब नहीं होने देगा। हालांकि संघ और भाजपा हमेशा आतंकवादी घटनाओं के लिए मुसलमानों को जि़म्मेदार मानते रहे हैं। स्वंय प्रधानमंत्री ने लोकसभा चुनावों के दौरान पूरे मुस्लिम समुदाय या इस्लाम धर्म को आतंकवाद के दानव से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन विदेशी दौरे पर अपने साम्प्रदायिक बौनेपन की छवि से बाहर निकलने के लिए उन्हें इस रास्ते का चयन करना पड़ा।

            विदेशी दौरों पर वह लगातार ऐसे प्रयास करते नज़र आए हैं। म्यामांर के अपने दौरे में आतंकवाद के मामले में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए। देश की कई बड़ी आतंकवादी वारदातों में हिंदुत्व के ध्वज वाहकों के लिप्त पाए जाने के बाद आडवानी ने भी सुर बदला था। इससे पहले आतंकवाद को मुसलमानों और इस्लाम से जोड़ने की अगुवाई करने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को भी यह कहना पड़ा था कि आतंकवाद को किसी धर्म से जोड़ना ठीक नहीं है। लेकिन क्या यह माना जा सकता है कि इनके विचार बदल गए हैं? नहीं, आडवाणी ने परिस्थितियों से मजबूर होकर अपना राग बदला था और मोदी के सामने भी पुरानी छवि के साथ विश्व स्तर पर खुद अपनी स्वीकार्यता का संकट है। अगर उनके मन मस्तिष्क में गांधी जी के अहिंसा के दर्शन प्रति तनिक भी आस्था होती तो कभी भी गोधरा कांड के बाद होने वाले मुस्लिम विरोधी दंगों को क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं कहते। दंगाइयों का बचाव नहीं करते। अक्ष रधाम आतंकी हमले में बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों पर पोटा लगाने की, सुप्रीम कोर्ट के अनुसार गृहमंत्री की हैसियत से बिना दिमाग का इस्तेमाल किए अनुमति नहीं देते। फर्जी इनकाउन्टरों में लिप्त गुजरात के उच्च पुलिस अधिकारियों को कानून के श िकंजे से बचाने के दाव पेच न करते। दंगों और फर्जी इनकाउन्टरों की छींटे स्वंय उनके दामन पर न होतीं। विचारों में बदलाव कभी भी संभव है लेकिन उसके लिए मात्र परिस्थितियों के अनुकूल वक्तव्य देना काफी नहीं होता, अगर ऐसा होता है तो फिर यह सिर्फ अवसरवाद है। कोई सकारात्मक परिवर्तन स्वागत योग्य होना चाहिए इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता। परन्तु वास्तव में ऐसा होते हुए दिखाई भी देना चाहिए।

             गांधी जी के लिए श्रद्धा सुमन और गोडसे के अभिभावकों को नमन, मुसलमानों को देशभक्ति का प्रमाण पत्र देना और उन्हें कब्रस्तान या पाकिस्तान भेजने का नारा लगाने वालों के साथ गलबहियां करना, बिना किसी भेदभाव 125 करोड़ भारतीयों की बात करने का दावा करना और मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलने वालों को मंत्रिमंडल में शामिल करके पुरस्कृत करना इन वक्तव्यों के खोखलेपन को जाहिर करता है। यह सब किसी बदलाव के लक्ष ण नहीं बल्कि जनता की आंखों में धूल झोंकने और अपने साम्प्रदायिक और फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की धुर्त चाल है। इसे समझने की ज़रूरत है।  

? मसीहुद्दीन संजरी