संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

3 दिसंबर: विश्व विकलांग दिवस पर विशेष
...ताकि अभिशाप न बन पाए: विकलांग बच्चों का जीवन

? डा. गीता गुप्त

              हाल ही में आन्ध्रप्रदेश के काकीनाड़ा में एक स्कूल में तीन नेत्रहीन छात्रों की पिटाई का वीडियो सामने आया है। पिटाई करने वाला व्यक्ति स्कूल का शिक्षक है। पुलिस ने शिक्षक और उसके सहयोगी को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के अनुसार, जिले के रायुडुपालम क्षेत्र के ग्रीनफील्ड स्कूल में कक्षा में शोर मचाने पर छात्रों की पिटाई की गई। एक कर्मचारी ने अपने मोबाइल पर चुपके से घटना का वीडियो बना लिया और इसे आन्तरिक विवाद के बाद मीडिया में उजागर कर दिया। ऐसी घटनाओं से पता चलता है कि विकलांगता बच्चों के लिए कितना बड़ा अभिशाप है। शिक्षकों की क्रूरता और समाज की संवेदनहीनता ऐसे बच्चों को शिक्षा से विमुख कर देती है। वैसे भी बच्चों का पालन-पोषण और भविष्य-निर्माण एक कठिन कार्य है। लेकिन यह कार्य तब एक चुनौती बन जाता है, जब बच्चे सामान्य न होकर विकलांग या असमान्य हों। यह एक गम्भीर विषय है, जिस पर अभिभावकों, शिक्षा-संस्थानों और समाज को भी अधिक संवेदनशील और सजग होकर विचार करना चाहिए क्योंकि असामान्य बच्चे सबसे अधिक उन्हीं की अवहेलना का शिकार होते हैं। आत्मीयता का अभाव, अपनों की उपेक्षा और दिशाहीनता ऐसे बच्चों का मनोबल तोड़ देती है। वे निराशा और हीन भावना के शिकार हो जाते हैं।

                शिक्षा के विशेष राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षणों से देश भर में ऐसे 32 लाख बच्चों की पहचान की गई है। इनमें से 28 लाख बच्चे विद्यालयों में पढ़ रहे हैं और 28 राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के एक लाख उनतीन हजार बच्चों को घर पर ही शिक्षा दी जा रही है। जबकि चार लाख असामान्य बच्चे अभी भी विद्यालयीन शिक्षा से वंचित हैं। गौरतलब है कि भारत में वर्ष 2009-10 में विकलांग, आदिवासी एवं दलित बच्चों को समावेशी शिक्षा देने की योजना लागू की गई है तथा इसमें कक्षा 9 से 12वीं तक के 93 प्रतिशत बच्चों को शामिल किया गया है। सर्व शिक्षा अभियान के लागू होने से दलित एवं आदिवासी बच्चांे का प्रवेश बढ़ा है। सरकार ने वर्ष 2013-14 में दलितों के लिए 12600 करोड़ और आदिवासियों के लिए 6533 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है। जबकि असामान्य बच्चों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। उच्च शिक्षा में भी ऐसे बच्चों के लिए विभिन्न कार्यक्रम आरम्भ किए गए हैं, जैसे पाॅलीटेक्निक की पढ़ाई, नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए वित्तीय सहायता, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नेट परीक्षा में छूट, औपचारिक शिक्षा के अलावा रोजगारमूलक प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति, निःशुल्क पुस्तकें, गणवेश आदि का प्रबंध।

                निःसंदेह सरकार विकलांग बच्चों की शिक्षा और बेहतर जीवन पद्धति हेतु सचेष्ट है। वैसे भी शारीरिक या मानसिक दृष्टि से विकलांग बच्चे का जन्म माता-पिता के लिए बहुत पीड़ादायक होता है। ऐसे बच्चों को विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। प्रायः देखा जाता है कि असामान्य या विकलांग बच्चों में विलक्षण प्रतिभा होती है जिसे निखारने-संवारने का हरसम्भव प्रयास किया जाना चाहिए। ताकि बच्चे अपने को कमतर न मानें और जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण आशावादी बना रहे। सरकार ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ऐसे उपाय किए हैं कि विकलांगता बच्चे के लिए अभिशाप न बने। परन्तु इसकी जानकारी अभिभावकों को भी होनी चाहिए। कानून में विकलांगता को श्रेणीबद्ध किया गया है। इनमें अंधत्व,श्रवणबाधता, पैरो से अपंगता आदि के आधार पर शासकीय चिकित्सक प्रमाणपत्र जारी करते हैं। 40 प्रतिशत से अधिक विकलांगता की स्थिति में जांच के उपरान्त अधिकृत चिकित्सक इस संबंध में प्रमाणपत्र दे देते हैं। जिसके आधार पर विकलांग बच्चों को सरकार द्वारा प्रदत्त सभी सुविधाएं मिल सकती हैं।

                 ध्यान रहे कि अक्षम बच्चों के लिए 18 वर्ष की उम्र तक निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गई है। विकलांग बच्चों के लिए स्कूल तक आवागमन की सुलभ व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली में आवश्यक संशोधन के भी निर्देश दिए गए हैं। सभी शासकीय शिक्षण संस्थाओं और सरकारी अनुदान प्राप्त शिक्षा संस्थाओं में तीन प्रतिशत स्थान विकलांग विद्यार्थियों के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है। सरकार ने शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों के आर्थिक स्वावलंबन का भी ध्यान रखा है। अतएव शासकीय सेवाओं में उनके लिए तीन प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। शिक्षा के उपरान्त दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, पैरों से अपंग या सेरिब्रल पाल्सी से पीडि़त लोगों के लिए सरकारी नौकरी में एक प्रतिशत स्थान आरक्षित है। उनके लिए अधिकतम आयु में छूट का भी प्रावधान है। यदि आरक्षित पदों पर योग्य उम्मीदवारों की भर्ती नहीं हो पाती, तो ये पद अगली बार की भर्ती में जुड़ जाते हैं। इन पदों पर सामान्य व्यक्तियों की भर्ती नहीं हो सकती। विकलांग कर्मचारियों को निःशुल्क बीमा सुविधा भी प्रदान की जाती है। विशेष रोजगार कार्यालय में पंजीयन के बाद भी एक वर्ष तक नौकरी न मिल पाने की स्थिति में विकलांगों को बेरोजगार भत्ते की पात्रता भी है।

              असामान्य बच्चों को बेहतर जीवन प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा समुचित प्रयास किये जा रहे हैं लेकिन अधिकतर लोग अज्ञानवश पूरा लाभ नहीं उठा पाते हैं। बस और ट्रेन में विकलांगों के अलावा उनके सहयोगी के लिए भी किराये में रियायत का प्रावधान है। रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड, हवाई अड्डे, सार्वजनिक स्थानों, प्रतीक्षालयों और शौचालयों आदि में इन लोगों के लिए विशेष व्यवस्था के निर्देश हैं। इन स्थानों पर व्हील चेयर की उपलब्धता होनी चाहिए। साथ ही ब्रेल लिपि और ध्वनि संकेतों में सूचनाएं देने का प्रबंध भी होना चाहिए। यह ज्ञातव्य है कि अक्षम व्यक्तियों के लिए वर्ष 1995 में बने कानून के अनुसार, अपाहिज़ और सामान्य नागरिकों में कोई अन्तर नहीं है। उन्हें भी एक सामान्य नागरिक के सारे अधिकार प्राप्त हैं। इसके अलावा कानूनन कुछ विशेष रियायतें व सुविधाएं दी गई हैं। इनमें शिक्षा व रोजगार सहित अन्य कई प्रावधान हैं।

              पिछले दिनों असामान्य बच्चों तथा आदिवासी एवं दलित बच्चों को शिक्षा का अधिकार कानून के तहत समावेशी शिक्षा देने के कार्यक्रम की राष्ट्रीय निगरानी समिति की बैठक में शिक्षा से वंचित चार लाख असामान्य बच्चों का मामला सामने आया। यह इतना गम्भीर विषय है जिस पर अभिभावकों, शिक्षकों, शिक्षा-संस्थानों और पूरे समाज को चिंतन एवं विमर्श करना चाहिए। हमारे आसपास यदि काकीनाड़ा जैसी घटनाएं घट रही हैं तो हमें अपनी जागरूकता का परिचय देकर उसपर विराम लगाने का प्रयास करना चाहिए। सरकार अब निःशक्तजन के सम्मान की रक्षा हेतु भी चिंतित है इसलिए संसदीय समिति ने आमजन से सुझाव मांगे हैं। वह निःशक्तजन अधिकार विधेयक का प्रस्ताव लाने की तैयारी में है। तदनुसार, विकलांगों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने पर पांच साल तक की जेल की सजा का प्रावधान होगा। नौकरी व शिक्षण संस्थानों में प्रवेश हेतु आरक्षण तीन से बढ़ाकर पांच प्रतिशत करने और कानून का पालन नहीं होने पर दण्ड के लिए विशेष न्यायालय की स्थापना का भी प्रावधान है। इसके अलावा अधिकारों की रक्षा हेतु केन्द्र व राज्य स्तर पर आयोग के गठन का प्रावधान भी है। कानून बन जाने पर सार्वजनिक भवनों में रैम्प-निर्माण प्रावधानों का भी पालन करना अनिवार्य होगा।

              उल्लेखनीय है कि पांच श्रेणियों में निःशक्तजन का आरक्षण होगा। 1. पूर्णतःदृष्टि सेरेब्रल पाॅल्सी से पीडि़त भी शामिल। 4. आॅटिज्म, बौद्धिक निःशक्तता व मानसिक रुग्णता वाले 5. बहु निःशक्तता वाले। प्रस्ताविक विधेयक के अनुसार, विकलांग व्यक्ति को अंधा, बहरा, लंगड़ा या लूला कहना अपमानिक करना है। ऐसा करने पर सजा दी जाएगी। आरक्षण प्रावधानों का पालन न होने पर कार्रवाई और विशेष न्यायालयों का प्रावधान है। कानून तोड़ने पर छह माह से दो वर्ष तक दण्ड और दस हजार से पांच लाख तक जुर्माना हो सकता है। निःशक्त के नाम पर गलत फायदा उठाने पर दो साल की सजा या एक लाख रुपए तक जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं। निःशक्तजन को अपमानित, प्रताडि़त करने, भेदभाव, यौन उत्पीड़न या निःशक्त महिला का जबरन गर्भपात करने पर छह माह से पांच साल तक कारावास की सजा हो सकती है। प्रस्तावित विधेयक यदि कानून का रूप ले सका तो यह समाज के हित में होगा।

                निःसंदेह विकलांग बच्चों की समस्या जटिल है। लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति और कुछ कर दिखाने का जज्बा रखने वाले बच्चों की राह आसान हो जाती है। कानून का सम्बल भी उनके राह की कठिनाइयां कम करने में सहायक होगा। लेकिन हमारा भी यह नैतिक दायित्व है कि उनके जीवन को अभिशाप न बनने दें। ऐसे बच्चों की भरपूर मदद करें ताकि वे हमारे सहयोग और सरकारी नीतियों के बल पर अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकें।

                
? डा. गीता गुप्त