संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

वित्तीय साक्षरता के बिना नहीं चलेगी जनधन ?

? डा. सुनील शर्मा

          इस समय समाचारों में सबसे ज्यादा सुर्खियों मोदी सरकार की वित्तीय समावेशन योजना- जनधन है। आंकड़ों के मुताबिक 28 अगस्त 2014 से प्रारंभ इस योजना में अब तक 7.5 करोड़ से ज्यादा बचत खाते खोले जा चुके है। इस योजना के मुख्य आकर्षण जीरो बैलेंस से एवं बगैर पहचान के खाता खोलाजाना, खाताधारी का मुफत में 1.30 लाख रूपये का दुर्घटना बीमा तथा छःमाह तक सफलतापूर्वक खाता संचालन के उपरांत 5 हजार रूपये का ओवर ड्राफट की सुविधा आदि हैं। बैंकों द्वारा शुरूआती ना नुकर के बाद अब खाते खोलने की प्रक्रिया रफतार पर है। योजना की शुरूआत से अब तक इसमें अनेक संशोधन भी आ चुके है जैसे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐलान किया था कि जनधन योजना के तहत बैंक में खाता खुलवाने वाले सभी खाताधारकों को जीवन बीमा कवर दिया जाएगा, लेकिन अभी हाल ही बीमा कवर के लिए कई तरह की शर्त लगाईं हैं,पिछले सप्ताह बैंकों को जारी दिशा निर्देशों में कहा गया है कि बीमा परिवार के केवल 15 से 59 वर्ष के उम्र के एक ही सदस्य का होगा, परिवार के इस सदस्य को भी केवल 5 साल के लिए बीमा कवर मिलेगा। इसके साथ ही सरकारी उपक्रम में कार्यरत या सेवानिवृत कर्मचारियों, आयकर रिटर्न भरने वाले व्यक्तियों और आम आदमी बीमा योजना के दायरे में पहले से बीमित व्यक्ति इस योजना के दायरे में नहीं आएॅगें, इन श्रेणियों के व्यक्ति के परिवार के सदस्य भी बीमा कवर के पात्र नहीं होगें। इसके दायरे में केवल ही व्यक्ति शामिल रहेंगें जिनका रूपे कार्ड और बायोमेट्रिक कार्ड बैंक खाते से जुड़ा हो और वो 45 दिन में कम से कम एक बार कार्ड को आवश्यक रूप से उपयोग करें। वास्तव में इन शर्तों ने प्रधानमंत्री के ऐलान की हवा ही निकाल दी क्यांेकि अब इस योजना में शामिल 90 फीसदी खाताधारी बीमा कवर से बाहर हो जाएगें। ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में और सरकारी कर्मचारियों के बेरोजगार आश्रितों में बीमा कवर का लाभ इस योजना से जुड़ने का एक कारण था। इसमें कम से कम 45 दिन में एक बार रूपे कार्ड में स्वेप करने की शर्त अधिकांश ग्रामीण और मजदूर वर्ग के लोगों को बीमा कवर के दायरे से बाहर कर देगी क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में कार्ड स्वेप मशीन और एटीएम मशीन अभी भी दूर की कौड़ी ही है, वित्तीय साक्षरता के अभाव में इन खाताधारियों का आवश्यक रूप से कभी न कभी 45 दिन की समय सीमा से चूकना तय है। अतः योजना का यह आकर्षण सिर्फ वाहवाही लूटने का प्रयोजन ही हुआ। वास्तव में सरकार की ईमानदारी और आमजन की भलाई के लिए जरूरी है कि वित्तीय समावेशन की शर्त के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों और आयकर दाताओं को छोड़ सभी को उम्र की अधिकतम सीमा से हटकर इसका लाभ मिलना चाहिए।

             खाताधारियों की संख्या पर भी सरकार फूल कर कुप्पा हो रही है आंकड़ों के मुताबिक मात्र 3 माह में ही लक्ष्य से अधिक खाता यानि लगभग 7.8 करोड़ खाते खोले जा चुके है। लेकिन अब भी 20 फीसदी परिवार ऐसे हैं जिनका कोई बैंक खाता नहीं है बल्कि इस योजना में बड़ा हिस्सा उनका है जो पहले से ही खाताधारी है और जिनका किसी न किसी योजना के तहत खाता खुल चुका है इनमें से अधिकांश ने अपने पुराने खाते को ही जनधन योजना में शामिल कराया है। बैंकों ने भी आंकड़ों में फेर में यह आसान काम किया है और वंचित वर्ग अभी भी जनधन योजना से दूर है।ग्रामीण और मजदूर वर्ग में इस योजना से जुड़ने का एक कारण इसमें 5 हजार रूपये क कार्ड के जरिए कर्ज की सुविधा होने का लाभ है लेकिन उन्हें यह लाभ तब ही मिलेगा जबकि वो इस खाते में सक्रिय रूप से लेनदेन करेंगें लेकिन ज्ञात आंकड़ों के मुताबिक लगभग 6 करोड़ खातों में शून्य जमा है और अधिकांश को छः माह पूरा होने का इंतजार है ताकि वो 5 हजार रूपये निकाल सके लेकिन उनका यह खुशफहमी शून्य जमा खाते से पूरी नहीं होने वाली है। और संभावना है कि इस अवधि के पश्चात करोड़ों खत्म बंद की श्रेणी में शमिल हो सकते हैं। वास्तव में यह योजना तब ही सफल हो सकती है जब वित्तीय साक्षरता की बात इसके शुरूआत से ही की जाए और यह देश के बचत खाते से वंचित लगभग 15 करोड़ परिवारों तक पहुॅचाने की कवायद बने। उन परिवारों को बताया जाए कि बैंक में खाता क्यों जरूरी है उन्हें बताया जाए कि बैंक में जमा पैसे में तरलता, वृद्वि और सुरक्षा की गारण्टी होती है उन्हें बताया जाए कि बैंक में उनके हिस्से की सब्सिडी आसानी से आ सकती है और इसमें से ओवर ड्रा करने के लिए उनका खाता जीवंत बना रहना चाहिए। अब तक इस योजना की केवल अच्छी मार्केटिंग हुई है लेकिन धरातल से कोसों दूर है और निकट भविष्य में वित्तीय साक्षरता का अभाव इसे बीच में बंद कर सकता है।

? डा. सुनील शर्मा