संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

क्या मनरेगा बची रहेगी?

?  रीना मिश्रा

                सा लगता है कि नरेन्द्र मोदी सरकार गांव के गरीब परिवारों के लिए वरदान बनी महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के खात्मे के लिए कमर कस चुकी है। मोदी सरकार ने पूरे देश में लागू इस योजना को अब 200जिलों तक सीमित करने का प्रस्ताव किया है। इसके साथ ही मोदी सरकार का दूसरा प्रस्ताव यह है कि परिसंपत्तियों के निर्माण की जरूरत के मद्देनजर किसी काम में श्रम के इतर होने वाले खर्चों को इस योजना में बढ़ाया जाएगा। इस तरह सरकार ने परिसंपत्तियों के निर्माण के लिहाज से इसे नाकाम मान लिया है और इस तरह से मोदी सरकार इस योजना में श्रम के इस्तेमाल में कमी की योजना बना रही है।

             गौरतलब है कि यूपीए सरकार द्वारा मनरेगा कानून सन् 2005 में लागू किया गया था। यह योजना भले ही हर जरूरतमंद परिवार के एक सदस्य को 100दिन का रोजगार देने का वादा करती है और काम न मिल पाने पर मजदूर को बेरोजगारी भत्ता लेने का अधिकार देती है। लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कानूनन रोजगार मांगने के अधिकार का इस्तेमाल कम लोगों द्वारा ही किया गया है। बावजूद इसके वर् 2006 में पूरे देश में लागू होने के बाद से इस कानून के तहत अब तक पांच करोड़ लोगों को काम दिया गया है। यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल 2010-11 में मनरेगा का बजट अपने चरम पर था। उस समय यह 40000 करोड़ रुपये था। मौजूदा वित्तीय वर्ष में यह घटकर 33000 करोड़ रुपए हो गया है। यह राि देश के सकल घरेलू उत्पाद के 0.3 फीसदी के बराबर है। मनरेगा को खत्म करने की वकालत करने वालों का तर्क इस योजना में खर्च होने वाले धन को लेकर है, जिनसे मोदी सरकार भी सहमति जताते हुए इसे धीरे-धीरे खत्म कर देने की बात कर रही है। लेकिन इस योजना के बजट पर हल्ला मचाने वाली मोदी सरकार को यह समझना चाहिए कि केवल सोने और हीरे के कारोबार में लगी कंपनियों को मनरेगा पर आए खर्च के तकरीबन दोगुने 65,000 करोड़ रुपये के बराबर के कर की छूट दी गई है। जिससे वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक सिर्फ 0.7 फीसदी कामगारों को ही रोजगार मिलता है। जबकि मनरेगा के तहत 25 फीसदी ग्रामीण परिवारों को मिलता है।

               दरअसल मोदी सरकार की मंा उन तमाम कल्याणकारी योजनाओं को आर्थिक बोझ बता करके उनके खात्मे के लिए माहौल बनाना है। ताकि उनके खात्मे को जनमत के अनुरूप बताया जा सके। इसी रणनीति के तहत कुछ दिनों पहले ही योजना आयोग को भी खत्म किया गया और विकास की योजनाओं को निजी कम्पनियों के हवाले किए जाने का रास्ता खोला गया। जिससे सबसे बड़ा झटका भारतीय राज्य के उस कल्याणकारी अवधारणा को हुआ है जिसकी बात हमारा संविधान करता है। इसलिए मनरेगा को बोझ मानने का मतलब गरीबों और मजदूरों को बोझ मानना है। जिसके खिलाफ पिछले दिनं ही लाखों मजदूरों ने वाम दलों के नेतृत्व में प्रदर्शन किया है।

                 बहरहाल, मनरेगा को निरर्थक बताने के तमाम दावों के बीच अगर हम आंकड़ों को देखें तो उससे भी तस्वीर साफ हो जाती है। महाराष्ट्र में मनरेगा के तहत जिन 4100 जगहों पर काम किया गया वहां पाया गया कि 60 फीसदी काम से षि क्षेत्र को मदद मिली है जबकि 75 फीसदी काम प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर षि से जुड़ा हुआ था। वि्व बैंक ने 2009 में मनरेगा को विकास में एक बाधा करार दिया था लेकिन 2014 में उसकी एक रिपोर्ट में इसे ग्रामीण विकास का एक शानदार उदाहरण कहा है।

                 हालांकि सरकार की इस योजना को सीमित करने का सीधा मतलब लाभकारी लोगों के अधिकारों में कटौती है। ऐसे कार्यक्रम जो लोगों को अधिकार देते हैं, उनकी मंशा लोगों को सुरक्षा देने की होती है। लेकिन अगर ये अधिकार एकतरफा तरीके से वापस लिए जाते हैं तो कानून का मकसद ही बेमानी हो जाता है। अगर ऐसा हुआ तो योजना लागू किए गए जिलों और प्रखंडों में मजदूरों के चयन में भारी पक्षपात होगा। कुछ विषेशज्ञ कहते हैं कि बेहतर परिस्थितियों वाले इलाकों में मनरेगा की कोई मांग नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही इशारा करती है। वास्तव में मनरेगा के तहत किए जाने वाले कामों की लंबी मांग सूची है।

                 वैसे भी, ग्रामीण इलाकों में मनरेगा से वास्तविक लाभार्थी ही लाभ उठाते हैं। इससे जुड़े अर्थास्त्रियों का कहना है कि मनरेगा से जुड़ी शर्तें और कम मजदूरी की वजह से अपेक्षात बेहतर परिस्थिति वाले मजदूर जिनके पास और भी अच्छे अवसर हैं, इतर विकल्प तलाश लेते हैं। इस तरह से असली लाभार्थियों को चुनने के तरीके के कारण कई अर्थशास्त्रियों ने मनरेगा की तारीफ की थी। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे समृद्ध राज्यों ने उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य की तुलना में मनरेगा में अधिक खर्च किया है। यह आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की बेहतर प्रशासनिक क्षमता को बताता है।

                दरअसल मनरेगा ने जो सबसे महत्वपूर्ण काम किया है वह यह कि इसके चलते बड़े हरों में काम के लिए गांवों से होने वाले पलायन में काफी कमी आई है। जिसके चलते लोग अपने गांवों और परिवार के साथ रह कर अपना पेट पाल सकते थे। इसलिए किसी भी जनपक्षधर सरकार के लिए यह जरूरी था कि इसके दायरे को और ज्यादा बढ़ाया जाता और मजदूरी दर बढ़ाई जाती। ताकि गरीबों को भी लगता कि सिर्फ कापोरेट घरानों के लिए ही नहीं उनके लिए भी अच्छे दिन आ गए हैं।
 

?   रीना मिश्रा