संस्करण: 19अक्टूबर -2009

 


गोपाष्टमी 26 अक्टूबर 2009 के संदर्भ में
नस्ल सुधार से ही संभव है गोवंश संरक्षण

 

डॉ.सुनील शर्मा

शु गणना 1983 के अनुसार देश में 20.5 करोड़ गोवंश था, पशु गणना 1993 तथा 2003 में यह घटकर क्रमश: 19.5 करोड़ और 18.7 करोड़ रह गया है। पिछले 6 वर्षों के दौरान गोवंश की संख्या में लगातार तेजी से कमी आई है। संभवत: वर्तमान में देश में गोवंश की संख्या 16 करोड़ के आसपास ही होगी। यह सत्य है कि देश की अर्थव्यवस्था में गोवंश का बड़ा योगदान है। सकल कृषि उत्पाद का 33 फीसदी हिस्से में इनकी भागीदारी है। दुग्धा उत्पादन, कृषि कार्य एवं भू उत्पादकता संरक्षण में गोवंश की महत्वपूर्ण भागीदारी है, लेकिन गोवंश की लगातार घटती संख्या इस बात का प्रतीक है कि पशुपालकों एवं किसानों का गोवंश के प्रति लगाव घटता जा रहा है जबकि भारत जैसे छोटी जोत वाले देश की खेती गोपालन एवं गो संरक्षण से ही जीवित रह सकेंगी। पेट्रोलियम ऊर्जा की आसमान छूत कीमतें एवं इसके लिए अपने देश की परावलम्बन की स्थिति में प्रदूषण रहित एवं एवं सस्ते वेकल्पिक ऊर्जा का स्त्रोत गोवंश ही हो सकता है। अनेक कुटीर उत्पादों के रूप में गोवंश को ग्रामोद्योग का आधार बनाया जा सकता है। आज के किसान गो आधारित कृषि,गो आधारित स्वास्थ्य,गो आधारित ऊर्जा एवं गोआधारित ग्रामोद्योग अपना कर अपनी सभी समस्याओं का समाधान अकेले गोपालन से कर सकते हैं। यह सब भारतीय नस्ल की गायों के द्वारा ही हो सकता है, लेकिन भारतीय नस्ल की गायों पर अस्तित्व का संकट है। हमारे देश में सन् 2003 की पश गणना के अनुसार 187 करोड़ गोधान है। इनमें मुख्यत: 30 मान्य भारतीय नस्लें हैं,10 से अधिक अन्य अपहचानित नस्लें हैं। उपयोगिता के आधार पर इन्हें तीन भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम हैं दूध देने वाली नस्लें, ये अधिक दूध देने वाली गायें हैं परंतु इनके बैल अधिक भारवाही नहीं होते हैं। इनमें साहीवाल, लालसिंधी, गीर व राठी नस्लें आती हैं। दूसरे वर्ग में भारवाही नस्लें हैं। भारत की अधिकांश देशी नस्लें इसी वर्ग में आती है। इनमें प्रमुख रूप से अमृतमहल, बेचुर, बरगुर, डांगी, हल्लीकर, कांग्याम, केनकथा, खैरीगढ़, खिल्लारी, मालवी, नागोरी, निभारी, पवार, लालकंधारी एवं सीरी नस्लें आती हैं। इस वर्ग की नस्लें प्राय: बैलों के लिए ही पाली जाती हैं। तीसरा वर्ग द्विकाजी नस्लों का है अर्थात इनकी गायें अच्छा दूध देती हैं और इनके बैल भी अधिक शक्तिशाली होते हैं। इस वर्ग में प्राय: देवनी, गावलाव, हरियाना, कांकरेज, कृष्णावैली, मेवाती, अंगोल एवं थारपारकर आदि नस्लें आती हैं। ये सभी नस्लें भारतीय परिवेश में पली बढ़ी हैं। अत: यहां की जलवायु में रहने की इनमें विलक्षण क्षमता है। असामान्य जलवायु का इनकी उत्पादन एवं कार्यक्षमता पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। इनमें उत्तम रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है, अत: रोगों से आर्थिक हानि बहुत ही कम होती है। स्वदेशी नस्ल की गायें न्यूनतम पोषण, आहार एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उपयोगी सिध्द होती हैं। आज भारत की 30 प्रसिध्द नस्लों में से अधिकतर समाप्ति की कगार पर हैं। सर्वश्रेष्ठ थारपारकर नस्ल को भी संकरित कर समाप्ति की ओर धकेला जा रहा है।

गुजरात प्रदेश की सराहना करनी होगी कि उसने 'क्रॉसब्रीडिंग' करने के दबाव के बावजूद भी अपने यहां की गीर नस्ल पर निरंतर कार्य किया है जिसके परिणाम स्वरूप गुजरात में 25 लीटर प्रतिदिन दूध देने वाली गायें भी आज सुलभ हैं। वहां सहकारिता एवं गोशालाओं के जरिये भी नस्ल सुधार का कार्य चल रहा है। भारतीय गायों पर विदेशों में शोध कार्य चल रहा है। इजराइल ने गीर नस्ल एवं बेचर नस्ल पर कार्य करके सिध्द किया है कि भारतीय गाय आज दूध देने की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ गाय है। ब्राजील में गीर गायों को विशेष संरक्षण दिया जा रहा है, वहां गीर गाय को ब्राम्हण काउ के नाम से जाना जाता है तथा ब्राजील कर सर्वाधिक दूध देने वाली गाय गीर गाय ही है। हरियाणा, साहीवाल एवं गंगातीरी गायों पर विदेशों में कार्य हुआ है और इसके बहुत अच्छे परिणाम आये हैं। विदेशों में दूध और मांस का लक्ष्य रखकर गोसंवर्धान किया जाता है। जबकि भारत को दूध एवं खेती-बाड़ी के लिए बैलों की आवश्यकता है। आज भी हमारी 67 प्रतिशत खेती बैलों पर निर्भर है। निकट भविष्य में बैलों की आवश्यकता रहेगी, इसलिये हमारे गोसंवर्धान का लक्ष्य सर्वांगी नस्ल तैयार करना होना चाहिये यानि कि बछिया अधिक दुधारू हो और बछड़ा खेती जोत के लायक उत्तम बैल बने।

भारत की मान्य नस्लों की क्रॉसब्राडिंग पर पूर्णतया रोक लगा देनी चाहिये ।इन मान्य नस्लों में गीर, थारपारकर, कांकरेज, ओंगोल, कांगायम, एवं देवनी आदि प्रमुख हैं। इसमें अधिकांश नस्लों से सेलेक्टिव ब्रीडिंग या अपग्रेडिंग के माध्यम से नस्ल सुधार किया जाना चाहिये। इससे इनके स्थाई गुणों को आंच आये बिना दूध एवं बैल शक्ति में वृध्दि हें सकेगी। आज हमारे पास ढाई से तीन हजार लीटर दूध प्रति ब्यांत के साथ उत्तम बैल देने वाली गायें मौजूद हैं। इन मान्य नस्लों पर क्रॉसब्रीडिंग करके उनके मूल गुणों को नष्ट करना देश के लिये अत्यंत हानिप्रद सिध्द हो रहा है।

आज करोड़ों किसानों को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली गोसंवर्धान नीति में इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि सर्वांगी नस्लों जैसे कि हरियाणा, थारपारकर, गीर, कांकरेज, कांगायाम एवं देवनी आदि को सेलेक्टिव ब्रीडिंग से सवंधर्त किया जाये। जो कम दूध वाली कम मान्य नस्लें हैं, उनको देशी मान्य नस्लों से ही संकरित करके सर्वांगी नस्ल विकसित करनी चाहिये। इस प्रकार भारतीय नस्लों के संकरण को अपग्रेडिग कहते हैं। महाराष्ट्र के सतारा जिले के धोकमोंड क्षेत्र में पिछले अनेक वर्षों से अपग्रेडिंग का कार्य होता आया है, और इसके बहुत अच्छे परिणाम भी सामने आये हैं। ऐंसा ही प्रयास देश में अन्य स्थानों पर भी किये जाने की आवश्यकता है।
 

       किसानों के पास शुध्द नस्ल की भारतीय गायें उपलब्धा हो सकें, इसके लिये पहले हमें गोशालाओं पर ध्यान देना होगा और गोशालाओं में अच्छे नस्ल का भारतीय गोवंश तैयार हो इसके लिये दसप (दस प्रतिशत) प्रणाली का उपयोग किया जाना चाहिये। आज देश में लगभग तीन हजार अच्छी गोशालायें हैं इन्हें देशी नस्ल सुधार केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिये तथा इन गोशालाओं को नस्ल सुधार के लिये आर्थिक सहायता उपलब्धा कराना चाहिये नस्ल सुधार के लिये गोवंश की सतत् देखभाल की जरूरत होती है जोकि गोशालाओं में ही संभव है। पशुपालकों, किसानों और सरकारी अमले के दिमाग में नस्ल सुधार के नाम पर जर्सीकरण का भूत सवार है इस पर तत्काल रोक अनिवार्य है।

 


डॉ. सुनील शर्मा