संस्करण: 19अक्टूबर -2009

अम्लीय वर्षा एक पर्यावरणीय संकट

स्वाति शर्मा

संपूर्ण विश्व अभी ओजोन क्षरण और ग्रीन हाउस प्रभाव के दुष्परिणाम से उबर भी नहीं पाया है, कि अम्लीय वर्षा ने पर्यावरण को संकट में डाल दिया है। यह समस्या अभी विकसित देशों में तबाही मचा रही है, लेकिन वह दिल दूर नहीं, जब यह समस्या विकासशील देशों के आगे खड़ी हो जाएगी। अम्लीय वर्षा पर्यावरण के सभी घटकों (भौतिक एवं जैविक) को खतरे में डाल देती है। जब मानव जनित स्रोतों से उत्सर्जित सल्फर डाई ऑक्साइड (एस ओ 2) एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड (एन ओ 2) गैस वायुमंडल की जल वाष्प के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक एसिड व नाइट्रिक एसिड का निर्माण करती हैं तथा यह अम्लश् जल के साथ पृथ्वी के धारातल पर पहुंचता है, तो इस प्रकार की वर्षा को अम्लीय वर्षा कहते हैं।

प्राकृतिक पर्यावरण को नष्ट करने में अम्लीय वर्षा की प्रमुख भूमिका होती है। यह वर्षा मुख्यतया कनाडा, स्वीडन, नार्वे, फिनलैंड, इंग्लैंड, नीदरलैण्ड, जर्मनी, इटली, फ्रांस, तथा यूनान जैसे विकसित देशों में विगत चार-पांच दशक से एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बनी हुई है। इसने धरातल पर मौजूद संपूर्ण भौतिक एवं जैविक जगत को खतरे में डाल दिया है। अम्लीय वर्षा का दुष्प्रभाव एक स्थान विशेष तक ही सीमित नहीं रहता और न ही यह सल्फर डाइ ऑक्साइड तथा नाइट्रस ऑक्साइड उगलने वाले औद्योगिक एवं परिवहन स्रोतों के क्षेत्रों तक ही सीमित रहता है। यह स्रोतों से दूर अत्यधिक विस्तृत क्षेत्रों को भी प्रभावित करती है, क्योंकि अम्लीय वर्षा के उत्तरदायी कारक गैसीय रूप में होते हैं, जिन्हें हवा तथा बादल दूर तक फैला देते हैं। जिससे ब्रिटेन एवं जर्मनी में स्थित कारखानों से निकली सल्फर डाइ ऑक्साइड एवं नाइट्रस ऑक्साइड के कारण नार्वे, स्वीडन तथा फिनलैण्ड में विस्तृत अम्लीय वर्षा होती है, जिसके फल स्वरूप इन देशों की अधिकांश झीलों के जैवीय समुदाय समाप्त हो चुके है, इसीलिए ऐसी झीलों को अब जैविकीय दृष्टि से मृत झील कहते हैं।

अम्लीय वर्षा नामक यह पर्यावरणीय आपदा भारतवासियों को भी झेलनी पड़ सकती है। नई दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार भारत के कुछ हिस्सों में वर्षा जल की रासायनिक प्रकृति धीरे-धीरे अम्लीयता की ओर बढ़ रही है। रिपोर्ट के अनुसार राजधानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र मध्य प्रदेश, तमिलनाडु एवं अंडमान द्वीपों में वर्षा जल की अम्लीयता लगातार बढ़ती जा रही है। भारत के प्रमुख औद्योगिक शहरों मुंबई, कोलकाता, कानपुर, नई दिल्ली, आगरा, नागपुर, अहमदाबाद, हैदराबाद, जयपुर, चेन्नई एवं जमशेदपुर आदि नगरों के वायुमंडल में अम्लीय वर्षा उत्पन्न करने वाली विषाक्त सल्फरडाइ ऑक्साइड गैसों की सांद्रता काफी बढ़ गई है। एक अनुमान के अनुसार सन् 1990 में हमारा देश 4400 किलो टन सल्फर हवा में छोड़ता था, जबकि आज इसकी मात्रा बढ़ कर 7500 किलो टन के आसपास है जो सन् 2015 एवं 2020 में बढ़ कर क्रमश: 10900 किलो टन एवं 18500 किलो टन हो जाएगी। भाभा एटामिक रिसर्च सेंटर व वर्ल्ड मीट्रोलॉजिकल ऑरगनाइजेशन द्वारा किए गए अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि अधिकांश भारतीय नगरों में वर्षा जल में अम्लता का स्तर सुरक्षा सीमा से अभी कम है, लेकिन वह दिन दूर नहीं, जब अम्लीय वर्षा विकसित देशों की तरह भारत में भी तबाही मचाना शुरू कर देगी। भारत में भी हानिकारक गैसों की सांद्रता पर रोकथाम पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पा रही है।
 

          अम्लीय वर्षा का पारिस्थितिक तंत्र पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इससे जल प्रदूषण बढ़ता है, जिससे इसमें रहने वाले जीव-जंतु नष्ट होने लगते हैं। कनाड़ा के ओन्टोरियों प्रांत में 2,50,000 झीलों में से 50,000 झीलें अम्लीय वर्षा से बुरी तरह प्रभावित हैं जिनमें से 140 झीलों को मृत घोषित कर दिया गया है। अम्लीय वर्षा का वनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे पत्तियों की सतह पर मोम जैसी परत नष्ट हो जाती है, साथ ही पत्तियों के स्टोमेटा बंद हो जाते हैं। फलस्वरूप पौधों में प्रकाश संश्लेषण वृध्दि, श्वसन, जनन, वाष्पोत्सर्जन आदि सारी जैविक क्रियाए मंद पड़ जाती हैं। इससे पेड़-पौधो सूखने लगते हैं। कनाड़ा, यू.एस.ए. स्वीडन, नार्वे, फिनलैण्ड, जर्मनी व मध्य यूरोप के कई देशों में वन संपदा को अम्लीय वर्षा से भारी क्षति हुई है। सल्फर डाइ ऑक्साइड के अधिक सांद्रण से लाइकेन मर जाती हैं। अम्लीय वर्षा से मिट्टी में अम्लीयता बढ़ जाती है। मिट्टी की उत्पादकता घट जाती है क्योंकि अधिक अम्लता के कारण मिट्टी में स्थित खनिज एवं अन्य पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। खेतों में खड़ी फसल को भी इससे बहुत नुकसान होता है। अम्लीय वर्षा से मानव में सांस एवं त्वचा की बीमारियां हो जाती हैं। आंखों में जलन होने लगती है तथा सल्फर डाइ ऑक्साइड की अधिक सांद्रता के कारण क्षति होती है। इससे पत्थर एवं संगमरमर जैसी वस्तुएं विशेष रूप से प्रभावित होती हैं। यूनान, इटली व अन्य कई यूरोपीय देशों में संगमरमर एवं अन्य कीमती मूर्तियां अम्लीय वर्षा से धुलती जा रही हैं। आगरा का प्रसिध्द ताजमहल भी धुंधला पड़ता जा रहा है।
 

                     अम्लीय वर्षा की समस्या से तभी छुटकारा पाया जा सकता है, जब विभिन्न स्रोतों से अम्लीय वर्षा उत्पन्न करने वाली सल्फर डाइ ऑक्साइड एवं नाइट्रस ऑक्साइड गैसों को वायुमंडल में घुलने से रोका जाए। अब परंपरागत ईंधान की जगह सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा देना होगा। कल-कारखानों, बिजली घरों तथा ऑटोमोबाइल आदि में ऐसे ईंधन का प्रयोग किया जाए। कारखानों की चिमनियों के मुंह पर बैग फिल्टर लगाया जाए तथा कोलाइडल टैंक बनाया जाए। समय-समय पर वाहनों की जांच की जाए। जिन झीलों व जलाशयों की अम्लीयता बढ़ गई है, उनमें चूना डाला जाना चाहिए। इस प्रकार अम्लीय वर्षा पर रोक लगाने के साथ ही साथ यह भी आवश्यक है कि इस समस्या के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से निपटाया जाए। पश्चिमी देशों के साथ-साथ हमारे देश में भी सार्थक उपाय किए जाने चाहिए।
 



स्वाति शर्मा