संस्करण: 19अक्टूबर -2009

आदिवासी परिवारों की संतान हैं भारतीय
 

 

 

प्रमोद भार्गव

भारत व भारतीयता के परिप्रेक्ष्य में नए शोध परक अध्यन ने तय किया है कि मूल भारतीय दो आदिवासी परिवारों की संतानें हैं। भारतीयों की उतपत्ति संबंधी इस सिध्दांत को आधुनिक डीएनए तकनीक के माध्यम से व्यापक स्तर पर किए गए एक अध्यन से सामने लाया गया है। आर्य - अनार्य के स्थापना संबंधी मूल्यों को नकारते हुए इस जांच से साबित हुआ है कि दक्षिण भारतीय पूर्वज 65 हजार वर्ष पहले भारतीय उप महाद्वीप में आए थे। अध्यन ने तय किया है कि देश की एक अरब से ज्यादा जनसंख्या में अनेक भाषाओं, बोलियों, जातियों व धर्मों में बंटी होने के बावजूद उसमें गहरी अनुवांशिक समानताएं हैं। इस नए सिध्दांत के सामने आने के पश्चात भी क्या हम इस प्रचलित धारणा को नकार पाएंगे कि आर्य मूल भारतीय नहीं थे ? यदि हम इन नए आंख खोल देने वाले सत्यों पर विश्वास नहीं करते तो ये अध्यन किसलिए ? क्योंकि इस सिलसिले में सामने आया यह कोई पहला अध्यन नहीं है ?
 

                पिछली सदी के मध्य प्रसिध्द जीव वैज्ञानिक चार्ल्स डारविन ने विकासवाद के सिध्दांत को स्थापित करते हुए जाहिर किया था कि पेड़-पौधो, पशु-पक्षी और यहां तक की मनुष्य भी हमेशा से आज जैसे नहीं रहे हैं, बल्कि वे बेतरतीब बदलाव ;रैन्डम म्यूटेशन और प्राकृतिक चयन ;नेचुरल सिलेक्शन द्वारा निम्नतर से उच्चतर जीवन की ओर विकसित होते रहे हैं। डारविन ने इस बात पर भी जोर दिया कि नर-वानरों की जिस खास प्रजाति से मानव का विकास हुआ, उसके संबंधी आज भी अफ्रीका में मौजूद हैं। इसलिए इस तथ्य का निर्धारण होता है कि आदिमानवों ने सबसे पहले अफ्रीका में जन्म लिया। बंदर इंसान के पुरखे थे डारविन के इस सिध्दांत को पचा पाना उस जमाने के धर्मगुरुओं को उसी तरह कठिन था जिस तरह आज हमारे पाश्चात्य व साम्यवादी पूर्वग्रह से जुड़े मनीषियों को भारतीयता से जुड़ा कोई भी पक्ष या अध्यन पचा पाना मुश्किल होता है। यही कारण है कि इस तरह के जो भी नए शोधं व अध्यनों से नए दृष्टिकोण सामने आए हैं उन्हें नजरअंदाज ही किया गया है। क्योंकि आर्य और द्रविड़ के बीच आनुवंशिक रिश्ता जोड़ने वाला यह सिध्दांत सर्वमान्य हो जाता है तो इससे कई विवादित सिध्दांत और अवधारणाओं पर विराम तो लगेगा ही इस सिध्दांत की प्रतिपादना भारतीय राष्ट - राज्य की एकता और अक्षुण्णता के लिए भी किसी वरदान से कम साबित नहीं होगी।
 

                 भारतीय संस्कृति के निर्माता और वेदों के रचयिता आर्य भारत के मूल निवासी थे। यदि प्राचीन भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टि से देखें तो आर्य भारत के ही मूल निवासी थे। पाश्चात्य इतिहास लेखकों ने पौने दो सौ साल पहले जब प्राच्य विषयों और प्राच्य विद्याओं का अध्यन शुरु किया तो बड़ी कुटिल चतुराई से जर्मन विद्वान व इतिहासविद् मेक्समूलर ने पहली बार 'आर्य' शब्द को जाति सूचक शब्द से जोड़ दिया। वेदों का संस्कृत से जर्मनी में अनुवाद भी पहली बार मेक्समूलर ने ही किया था। ऐसा इसलिए किया गया जिससे आर्यों को अभारतीय घोषित किया जा सके। जबकि वैदिक युग में 'आर्य' और 'दस्यु' शब्द पूरे मानवीय चरित्र को दो भागों में बांटते थे। प्राचीन साहित्य में भारतीय नारी अपने पति को 'आर्यपुरुष' अथवा 'आर्य-पुत्र' नाम से संबोधित करती थी। इससे यह साबित होता है कि आर्य श्रेष्ठ पुरुषों का संकेतसूचक शब्द था। ऋग्वेद, रामायण, महाभारत, पुराण व अन्य संस्कृत ग्रंथों में कहीं भी आर्य शब्द का प्रयोग जातिसूचक शब्द के रुप में नहीं हुआ है। आर्य का अर्थ 'श्रेष्ठि' अथवा 'श्रेष्ठ' भी है। वैदिक युग में तो वैसे भी जाति व्यवस्था थी ही नहीं। हां, वर्ण व्यवस्था जरुर अस्तित्व में आ गई थी। इसके अलावा वेद तथा अन्य संस्कृत साहित्य में कहीं भी उल्लेख नहीं है कि आर्य भारत में बाहर से आए। यदि आर्य भारत में बाहर से आए होते तो प्राचीन विपुल संस्कृत साहित्य में अवश्य इस घटना का उल्लेख व स्पष्टीकरण होता।
 

                ताजा शोध का सार है कि सबसे पहले 65 हजार साल पहले अंडमान और दक्षिण भारत में लोगों का आगमन और आबादी का क्रम शुरु हुआ। इसके करीब 25 हजार साल बाद उत्तर भारत में लोगों के आने का सिलसिला शुरु हुआ। इस अध्यन दल के निदेशक डॉ लालजी सिंह का कहना है कि हम सब भारतीय उत्तर और दक्षिण के इन आदि पुरखों की ही संताने हैं। सवर्ण - अवर्ण जातियों और आदिवासियों के आनुवंशिक गुण व लक्षण कमोबेश एक जैसे हैं। इसलिए आर्य और द्रविड़ ;अनार्य के परिप्रेक्ष्य में कोई विभाजित रेखा खींचने की जरुरत नहीं रह जाती।
 

                इस अध्यन से सामने आया है कि जब भारतीय समाज में निर्माण की प्रक्रिया शुरु हुई तब अलग-अलग कबीलों जैसे समूहों से जातियों का उदय हुआ। फलस्वरुप अखण्ड भारत का उत्तर और दक्षिण भारत में विभाजन तो व्यर्थ है ही कबीले और जातियां भी बेमानी हैं, क्योंकि सभी भारतीय समुदाय व जातियां एक ही कुटुम्ब से विकसित हुए हैं।
 

                  यह शोध भाषा, रंग और नस्ल जैसे भेद भरे विभाजक छद्म को भी नमंजूर करता है। दरअसल उत्तर और दक्षिण के विभाजन की बात तो अंग्रेज हुक्मरानों ने बांटों और राज करो दृष्टिकोण के चलते की। उन्नीसवीं शताब्दी में योरोपीय विचारकों ने अपने वंशों के लोगों को श्रेष्ठ साबित करने के नजरिये से रंग व नस्ल के आधार पर श्रेष्ठता की अवधारणा गढ़ी। मसलन गोरा रंग श्रेष्ठ माना गया और उसी के अनुसार गोरे, गेहुएं और तांबई त्वचा वाले उत्तर भारतीय श्रेष्ठ और काले या सांवले रंग वाले दक्षिण भारतीय हेय मान लिए गए। उत्तर की भाषा संस्कृत और दक्षिण की भाषाओं को भिन्न परिवारों में रखा गया। जबकि इन सभी भाषाओं की जननी संस्कृत रही है। गंगा घाटी से आयरलैंड तक की भाषाएं एक ही आर्य परिवार की आर्य भाषाएं हैं। इसी कारण इन भाषाओं में लिपि एंव उच्चारण की भिन्नता होने के बावजूद अपभ्रंशी समरुपता है और इन भाषाओं का उद्गम स्त्रोत संस्कृत है। इससे भी यह निश्चित होता है कि आदिकाल में एक ही परिवार की आर्य भाषाएं बोलने व लिखने वाले पूर्वज कहीं एक ही स्थान पर रहे हैं। बंगाली इतिहासकार ए.सी.दास इस स्थान अथवा मूल भारतीयों का निवास स्थान 'सप्त सिंधु' मानते हैं जो पंजाब में था। यदि ताजा अवधारणा को भारतीयों के जन्म की मान्यता मिल जाती है तो हो सकता है हम धर्म, जाति और संप्रदाय से उठकर कुछ नया सोचें और अपनत्व की भावना कायम हो। नए अर्थ की यह सैध्दांतिकी अपना ली जाती है तो भारत का नया सामाजिक व सांस्कृतिक पुनर्जन्म तो होगा ही हमारी संप्रभुता को उत्पन्न हो जाने वाले आंतरिक खतरों पर भी किसी हद तक विराम लगेगा।
 



प्रमोद भार्गव