संस्करण: 19अक्टूबर -2009

कर्नाटक में राजा से रंक तक
सभी दे रहे हैं बाढ पीड़ितों को सहायता

 

एल.एस.हरदेनिया

यदि समाज में संवेदनशीलता हो तो प्रकृति के प्रकोप से उत्पन्न मुसीबत में उसकी कितनी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है यह कर्नाटक और विशेषकर बंगलौर शहर ने दिखा दिया है। हाल में कर्नाटक में बाढ़ और अप्रत्याशित बरसात से भारी नुकसान हुआ है। सैकड़ों लोग मारे गए, हजारों बेघर हो गये और करोड़ों की संपत्ति की हानि हुई। जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई अकेली सरकार नहीं कर सकती। अत: वहां का आम आदमी दिल खोलकर मदद कर रहा है। धनी तो मदद कर ही रहा है, गरीब भी कर रहा है। वृध्द भी कर रहा है और युवा भी। बंगलौर के एक वरिष्ठ नागरिक ने अकेले 20 लाख रूपये दान किए हैं। इनका नाम है व्ही. एस. कृष्णा अय्यर। वे स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व सांसद और मंत्री हैं। अय्यर के अलावा अनेक वरिष्ठ नागरिकों ने मुक्त हस्त से दान दिया है। अनेक वरिष्ठ नागरिकों ने दस हजार रूपये से अधिक रकम दान में दी है। जैसे एम. एम. रंगाईया, जिन्होंने स्वयं 10 हजार रूपये राहत कोष में दिए हैं का कहना है कि जिस मुसीबत का सामना बाढ़ पीड़ितों को करना पड़ा रहा है उसे देख-सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाएगा।

        बंगलौर में प्रतिदिन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में सभी दलों व समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक काफिले में निकलते हैं। जहां से भी यह काफिला गुजरता है, हजारों हाथ मदद के लिए आगे आ जाते हैं। दान देने वालों में व्यापारी, डॉक्टर, वकील आदि सभी शामिल रहते हैं। गरीब से गरीब व्यक्ति भी दान के लिए आगे आता है। ऐसे ही दान देने वालों में कुप्पमा भी शामिल हैं। कुप्पमा हॉकर का काम करती हैं। उनकी प्रतिदिन की कमाई केवल 75 रूपये है। उन्होंने अपनी एक दिन की कमाई में से 25 रूपये राहत कोष में दिए।
 

           इस काफिले को प्रतिदिन की यात्रा में लाखों रूपये प्राप्त हो रहे हैं। बंगलौर के अलावा कर्नाटक के अन्य शहरों से भी राहत कोष के लिए दान प्राप्त हो रहा है। व्यक्तियों के अलावा संस्थाएं भी दान दे रही हैं। जैसे मैसूर रेस क्लब ने 10 लाख रूपये दिए हैं, सेन्ट जॉन मेडिकल कालेज एवं अस्पताल ने 11 लाख रूपये दिए हैं, एएमसी इंजीनियरिंग कॉलेज ने 5 लाख रूपये, इंटरनेशनल कर्नाटक क्रिशियन एसोसिएशन ने 10 लाख रूपये, मंगलौर जिला प्रशासन ने 2 करोड़ रूपये, चामुंडेश्वरी बिजली निगम ने 250 ट्रांसफार्मर, सेन्चुरी ग्रुप के डॉ. पी. दयानंद पई और पी. सतीश पई ने 1 करोड़ रूपये और साहित्यकार चंदवासप्पा ने 50 हजार रूपये दिए हैं।
 

             इसके अलावा कई संस्थाएं खाद्य सामग्री, दवाईयां, कपड़े आदि भेज रही हैं। एक संस्थान, जिसका नाम पूनम ग्रुप है, प्रतिदिन 50 हजार रोटियां, 6 हजार बिस्किट के पैकिट व दवाईयां भेज रहा है। पूनम ग्रुप के प्रवक्ता हरीश के अनुसार अभी तक वे पांच लाख से ज्यादा रोटियां भेज चुके हैं। उन्होंनें अनेक गांवों की भोजन की आवश्यकता पूरी करने की जिम्मेदारी ली है। कर्नाटक के एक नाटक समूह ने पूरे प्रांत में नाटकों का प्रदर्शन कर सहायता एकत्रित करने की घोषणा की है। यहां तक कि दृष्टिहीनों के एक समूह ने भी राहत कोष में दान देने की घोषणा की है। कर्नाटक के सभी गिरजाघरों के मुखियाओं ने एक बैठक कर बड़े पैमाने पर सहायता एकत्रित करने का निर्णय लिया है।
जहां गैर सरकारी स्तर पर सहायता के अनेक प्रयास हो रहे हैं वहीं कई स्थानों पर शासन के विरूध्द शिकायतें सुनने में आ रही हैं। बाढ़ से कितना नुकसान हुआ है इसका अंदाज केवल उन्हें है जिन्होंने या तो उस पीड़ा को भोगा है या जिन्होंने अपनी जान हथेली पर रखकर बाढ़ पीड़ितों की सहायता की है। एक बाढ़ पीड़ित ने बताया ''हमने अपना सब कुछ खो दिया है। हमने अपना घर, बर्तन, अनाज, कपड़े सब कुछ बाढ़ में गंवा दिया है।''

               अभी भी बड़े पैमाने पर सहायता की आवश्यकता है। हजारों लोगों को अभी भी अनाज, बच्चों को लिए दूध और बीमारों को दवाईयां उपलब्ध नहीं हैं।

                     प्रशासन के प्रयासों के बावजूद सभी बाढ़ पीड़ितों तक सहायता नहीं पहुंच पा रही है। अनेक बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में बीमारियां फैलने की संभावना है। परंतु ऐसे इलाकों में यथेष्ट मेडिकल सहायता नहीं पहुंच पा रही है। कर्नाटक के निवासियों को भयंकर मुसीबत का सामना करना पड़ा। बाढ़ का पानी ऐसे स्थानों पर पहुंच गया था जहां पहिले कभी नहीं पहुंचा। बाढ़ में फंसे लोगों की मुसीबतों की दिल दहलाने वाली कहानियां सुनने को मिलीं। बाढ़ में फंसे लोगों को मौत के मुंह से बचाने का विवरण नेशनल डिसास्टर रिसपान्स टीम के सदस्यो से सुनने को मिला। इस टीम के एक सदस्य के अनुसार वे जब एक गांव में गये तो उन्होंने पाया कि 35 महिलाएं एक पेड़ पर शरण लिए हुए थीं। इनमें से कुछ महिलाओं की गोद में दुधामुंहे बच्चे भी थे। बड़ी कठिनाई से इन महिलाओं को बचाया जा सका। इस टीम के सदस्यों ने लगभग 4000 ग्रामीणों को बाढ़ की विभीषिका से बचाया। इस टीम के सदस्य अद्भुत साहसी होते हैं। इन्हें अपनी जान पर खेलकर पीड़ितों को बचाने की जबरदस्त क्षमता होती है। उन्हें इसके लिए सघन प्रशिक्षण दिया जाता है। उन हजारों लोगों में जिनका सब कुछ बाढ़ में बह गया एक आईएएस अधिकारी भी थे। संयोग की बात यह है कि ये अधिकारी, जिनका नाम एस. एम. जामदार है, स्वयं बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाने के कार्य के प्रभारी भी हैं। इनका पुश्तैनी मकान बेलगाम जिले के तोरगल गांव में था। इस मकान को उनके दादाजी ने 50 साल पहिले बनवाया था। इनके गांव के पास एक छोटी नदी है। इस नदी में आई जोरदार बाढ़ में पूरा गांव बह गया।
 

                  इस बाढ़ के बाद कर्नाटक में इस मुद्दे पर बहस हो रही है कि क्या यह विभीषिका मानव निर्मित थी या यह प्राकृतिक प्रकोप था। कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश ने कृष्णा नदी पर विशाल बांध बनाये हैं। आंध्रप्रदेश के श्रीसेलम बांध से 1700 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है। चूंकि श्रीसेलम बांध से बिजली का उत्पादन होता है इसलिए इस बांध को लबालब भरा जाता है और पूरी तरह भरने से पहिले इस बांध से पानी नहीं छोड़ा जाता। ऐसी स्थिति में अनापेक्षित तेज बारिश होने पर यकायक पानी छोड़ना पड़ता है। तीनों राज्यों में बांधों से पानी छोड़ने के मामले में समन्वय की कमी रहती है। जंगल कट जाने के कारण पेड़ों के माध्यम से धीमा होने वाला जलप्रवाह अब अत्यंत तीव्र हो गया है और सिधा तेज गति से नदियों और नालों में पहुंच जाता है। वैसे नदियों पर बांध बनाने का एक प्रमुख उद्देश्य बाढ़ की विभीषिका को कम करना होता है परंतु यह दु:ख की बात है कि ये बांध ही अब बाढ़ की विभीषिका का कारण बन रहे हैं। बाढ़ से कितना नुकसान होता है इस बात का अंदाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष की बाढ़ से हुई हानि की भरपाई के 32 हजार करोड़ रूपये की आवश्यकता होगी। यदि बाढ़ की विभीषिका नहीं होती तो इस भारी-भरकम रकम का उपयोग विकास के अन्य कार्यों के लिए किया जा सकता था।
 

एल.एस.हरदेनिया