संस्करण: 19अक्टूबर -2009

 

अप्रासंगिक हो गया सत्ता और राजनीति का पुराना ढर्रा
राहुल गांधी ने उठाया बदलाव का चुनौतीपूर्ण बीड़ा

राजेंद्र जोशी

 

रानीति और सत्ता के क्षेत्र में गुजरे जमाने की हकीकत कुछ और थी, वर्तमान जमाने की हकीकत कुछ और है तथा आने वाले समय की हकीकतें कुछ और ही होंगी। सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों और देशकाल की स्थिति के अनुरूप सत्ता संचालन के प्रयोगों में बदलाव किया जाना आवश्यक ही नहीं बल्कि एक अनिवार्यता सी लगने लगी है। क्योंकि पूर्व से चला आ रहा व्यवस्था संचालन का दर्श अब अप्रासंगिक हो गया है। मुक्त होने के बाद भारत के नवनिर्माण में जिस तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था का उद्भव हुआ उसमें शनै: शनै: आवश्यक सुधारों के साथ-साथ विकास और जनकल्याण के कार्यों के क्रियान्वयन के सूत्रों की शैलियों में भी परिवर्तन होता आया है। आजादी मिलने के बाद भारत के नवोन्मेष के लिए तैयार की गई नीतियों के सूत्र कुछ और थे तथा उनके क्रियान्वयन की पध्दति भी तत्कालीन हालात के अनुरूप ही थी। आजादी मिलने के बाद अपने पांव पर खड़े होने की कठिन और बड़ी चुनौतियों का जिस तरह यहां के राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र ने मुकाबला कर विकास के उद्देश्य में कामयाबी हासिल की, वह ऐतिहासिक है। उस दौर में जिस तरह की योजनाओं, कार्यक्रमों और नीतियों का निर्धारण हुआ, वह उस समय के राजनेताओं के प्रजातांत्रिक सोच का ही उपलब्धिपूर्ण आकलन था। देश के नवनिर्माण के लिए नेहरू युग में जिस तरह की राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जा रही थी, वह यहां की सत्ता और राजनैतिक संगठनों के लिए पर नये अनुभव के समान थी। दासता और सामंती दौर की शासन व्यवस्था के तुरंत बाद जनतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता पर काबिज होने के लिए राजनैतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धाओ का दौर शुरू हुआ तथा विभिन्न विचारधाराओं के आधार पर राजनीति का चरित्र बदलना शुरू हो गया। केंद्र और राज्यों में काबिज रहे राजनैतिक दलों ने अपनी अपनी विचारधाराओं के अनुरूप देश में अशिक्षा, असमानता, बेरोजगारी और गरीबी के खिलाफ कई तरह के कार्यक्रम योजनाऐं और नीतियां बनाई और उन्हें परंपरागत शासनतंत्र की शैलियों में ही क्रियान्वित करने का अभियान शुरू किया। पंडित नेहरू के समय देश में आर्थिक, औद्योगिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और सामाजिक उत्थान की दिशाये तय हुई तो इंदिरा गांधी के युग में देश में गरीबी, निरक्षरता, वर्गभेद, धर्म संप्रदाय और जातिगत कट्टरवादी विचारधाराओं के खिलाफ संघर्ष का माहौल निर्मित हुआ। राजीव गांधी ने भारत को 21वीं सदी में एक सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्व में स्थापित करने के सपने को साकार करने के लिए जन-जन में अलग जगाया और देश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को विज्ञान, तकनीकी और इलेक्ट्रॉनिकी क्रांति की उपलब्धियों से समर्थ, सक्षम और संपन्न बनाने के सूत्रों को लागू किया। कांग्रेस की सत्ताओं के साथ ही सत्ता का स्वाद चखने वाली राष्ट्रीय पार्टियों के घटकों ने भी मिल-जुलकर देश में विकास की दिशा में अपने-अपने सूत्रों का संचालन किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के दो दशक बाद से ही सत्ता लोलुपता की होड़ में राजनीति के चरित्र ने करवटें बदली जिससे राजनैतिक शुचिता और उसकी स्वस्थ परपंराऐं चूर-चूर होने लगी। संविद सरकारों और जनता सरकार का गठन देश की राजनैतिक परंपराओं में आए बदलाव के उदाहरण के रूप में देखा गया। सत्ता पर काबिज होने वाले राजनैतिक दलों में तो परिवर्तन देखा जाता रहा किंतु प्रशासनिक तंत्र परंपरागत बाबूगिरी के ढर्रे से मुक्त नहीं हो पाया। नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए सत्तारूढ़ दलों की प्रतिबध्दता का ग्राफ भी उतना नहीं बढ़ पाया जितनी, उम्मीद की जाती रही हैं। सत्ता में पद लोलुपता, निहित स्वार्थ, भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और प्रशासनिक अयोग्यता के चलते कतिपय राजनेताओं के चरित्र में आये विकारों का अक्सर पर्दाफाश होते रहना इस बात का प्रतीक है कि राजनैतिक संगठनों में सेवा के प्रतिबध्दता का अभाव होता जा रहा है। बाहुबलियों और धनबलियों के प्रवेश से भी राजनैतिक ढर्रा दूषित होने लगा।

 

आज विश्व में विज्ञान, तकनीकी, और आर्थिक विकास के अनेक कार्यक्रमों में उपलब्धि हासिल करने के लिए भारत की वर्तमान और भावी पीढ़ी के समक्ष कठोर चुनौतियां खड़ी हैं। इन कठोर चुनौतियों का तभी दृढ़तापूर्वक मुकाबला किया जा सकता है जब हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था और राजनीति की परंपरागत संचालन शैलियों और प्रवृत्तियों में बदलाव आयेगा। राजनीति के क्षेत्र में कहीं कहीं आज जिस तरह की संकीर्ण सोच धर्म, संप्रदाय और जातियों के नाम पर उन्माद और प्रवृत्तियों का बोलबाला है उससे निहित स्वार्थ और अराजकता के माहौल पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। बदलते युग की मांग में बुजुर्ग पीढ़ी को कदम से कदम मिलाकर युवाओं की ताकत पर भरोसा कर उन्हें सभी क्षेत्रों में नेतृत्व देना होगा तभी भविष्य की तस्वीर को उज्ज्वल स्वरूप मिल सकेगा। आज देश में युवा वर्ग हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। उसमें राजनीति और प्रशासनिक कार्यशैलियों के परंपरागत ढर्रों के प्रति अविश्वास की भावना आ गई है।

 

 युवा नेता राहुल गांधी देश के युवाओं की ताकत को पहचान रहे हैं। आज यह युवा नेता परंपरागत राजनैतिक और प्रशासनिक कार्यशैली के जरिए समाज में व्याप्त विडंबनाओं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और दूर दराज के आदिवासी अंचलों के लोगों के उत्थान के लिए चल रहे कार्यक्रमों के क्रियान्वयनों के प्रति आशान्वित नज़र नहीं आता। 21वीं सदी के इस बदलते दौर में विज्ञान, तकनीकी और इलेक्ट्रॉनिक के क्षेत्र में आई क्रांति का लाभ उठाकर यह नेता विकास की योजनाओं और जनकल्याण के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में युवाओं को हिस्सेदार बनाने के लिए आतुर है। जिस नये उत्साह, जज्बा और नये तेवर के साथ देश भर में राहुल गांधी दकियानूसी और परंपरागत ढांचे को बदलने के आव्हान से लोगों को जोड़ने का अभियान चला रहे हैं उसका व्यापक समर्थन मिल रहा है। आम जनता, विशेषकर युवाओं द्वारा भारत के चौतरफा विकास के लिए राहुल गांधी के परंपरागत ढर्रे में बदलाव के आव्हान का स्वागत किया जा रहा है। जोश के इस माहौल में राहुल गांधी को इस ओर भी सतर्क रहना होगा कि राजनैतिक क्षेत्र में परंपरागत सोच और लकीर के फकीर जैसे दकियानूसी विचारधारा के राजनेताओं के हथकंडों का वे कहीं भीतर ही भीतर शिकार तो नहीं हो रहे हैं। हालांकि यह स्थिति है किंतु फिर भी इस युवा नेता ने जोखिम उठाते हुए पुराने ढर्रे में बदलाव का एक चुनौतीपूर्ण बीड़ा उठा तो लिए ही है।
 


 

राजेंद्र जोशी