संस्करण: 19अक्टूबर -2009

 

आपका पेट है या कब्रिस्तान
 

 

 डॉ.महेश परिमल
 

अपने और अपने परिवार वालों के स्वास्थ्य के प्रति बहुत ही संवेदनशील हैं। बच्चे को जरा सी छींक आई नहीं कि हम दौड़े चले जाते हैं डॉक्टर के पास। कितनी अच्छी बात है। पर यही परिवार जब किसी गंदे नाले के पास कभी पानी-पूरी, कभी चाऊमिन, कभी चाट, कभी भेल, कभी इडली-सांभर खाता रहता है, तो कोई नहीं सोचता है कि ये चीजें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। बाजू में बजबजाती गंदगी और सामने सुस्वादु नाश्ता, भला कैसे खाते होंगे लोग? लेकिन ऐसा हर शहर में हो रहा है। कहीं कोई पावंदी नहीं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत पहले ही सड़क किनारे ठेलों पर बिकने वाली खाद्य सामग्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। है किसी में दम, जो बंद करा सके, ठेलों पर बिकने वाली मिलावटी खाद्य सामग्री पर? सात्विक भोजन से दूर होकर हमने अपने पेट को कब्रिस्तान बनाकर रख दिया है।

दूध में पानी मिलाया जाता है, यह तो सभी जानते हैं, पर उसमें और क्या-क्या मिलाया जाता है, यह बहुत कम लोग जानते हैं। उस दिन हमारी कॉलोनी में रोज की तरह एक दूधवाला आया। दूध देते समय कुछ दूध नीचे जमीन पर गिर गया। दूध वाले ने उस स्थान को पानी से धो दिया और चला गया। आपको आश्चर्य होगा कि उस स्थान पर कई दिनों तक दूध का दाग बना रहा। इस दौरान कई बार बारिश हुई, तेज धूप भी निकली, लेकिन वह दाग जस का तस रहा। सोचो आखिर उस दूध में ऐसा क्या होगा, जिसका दाग कई दिनों तक नहीं निकला। इन दिनों मिलावट का बहुत जोर है। कुछ दिनों पहले ही छतीसगढ़, गुजरात और राजस्थान में नकली मावा का जखीरा पकड़ा गया। इसके पहले भी नकली खाद्य पदार्थों की बरामदगी हुई थी। त्योहारों का मौसम एक बार फिर हमारे सामने है, ऐसे में यदि खाद्य पदार्थों में मिलावट की ओर धयान नहीं दिया गया, तो यह मामला निश्चित रूप से कई मौतों का कारण बनेगा।
 

वास्तव में हमारे देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों के खिलाफ किसी प्रकार के कड़े दंड का प्रावधान नहीं है। जो सजा है, वह मामूली है। जिसे जुर्माने के रूप में तुरंत ही भुगतान कर दिया जाता है। बस इसके बाद फिर वही, ढाक के तीन पात। हाल ही में विभिन्न राज्यों में मारे गए छापों के दौरान जो बातें सामने आईं, वह चौंकाने वाली है। पूछताछ में मिलावटखोरों से पता चला कि दूध में वे यूरिया, कॉस्टिक सोडा, व्हाइटनर और हाइड्रोजन पैराक्साइड मिलाते थे। सोचो, किस तरह से लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा था। इसके पहले भी छापों में कई मिलावटखोरों की गिरतारी हुई है, लेकिन आज तक किसी को कड़ी सजा हुई हो, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। ऐसा नहीं है कि मिलावटखोरों के लिए हमारे देश में कोई कानून नहीं है। सन् 1954 में एक कानून तैयार किया गया था, जिसे एडल्टरेशन एक्ट के नाम से जाना जाता है। इसमें होता यह है कि यदि किसी मिलावटखोर को इस कानून के तहत गिरफ्तार किया जाता है, तो इसका फैसला आने में करीब 15 वर्ष लग जाते हैं। भला बताओ, ऐसा कानून किस काम का? यदि किसी मिलावटखोर ने अपनी सजा के खिलाफ ऊपरी अदालत में मुकदमा कर दिया, तो फिर और लग गए, 5 से 10 वर्ष! इस बीच खाद्य अधिकारी मिलावटखोर के साथ तालमेल बिठा लेते हैं और व्यापारी बच जाता है, साथ ही अधिकारियों की जेब गर्म हो जाती है।
 

हमारे देश में मिलावट का धंधा खुलेआम होता है। साप्ताहिक हाट बाजारों में जो मसाले बिकते हैं, उन्हें देखकर ही लगता है कि ये मिलावटी है, पर उन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती। आखिर ऐसा क्या कारण् है कि लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती। क्या इन पर हत्या का मामला नहीं चलाया जा सकता? अभी कुछ माह पहले आगरा में एक छापे के दौरान शुध्द घी के नाम पर जानवरों की चर्बी से बने घी की जब्ती हुई। कथित रूप से यह शुध्द घी टनों में था। पूरा कारखाना सील कर दिया गया, पर किसी की गिरतारी नहीं हुई। आखिर ऐसे कैसे हो गया? पुलिस लाख कहती रहे कि आरोपी भागने में सफल रहे। पर सभी जानते हैं कि आरोपियों को भगाने में पुलिस सफल रही। अभी अगस्त में ही मध्यप्रदेश सरकार के इतिहास में पहली बार ग्वालियर के पाँच मिलावटखोर व्यापारियों पर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत कार्रवाई की गई। अब इस मामले में कब सबूत मिलेंगे, कब फैसला होगा, कब इन मिलावटखोरों को सजा होगी, कोई नहीं कह सकता। कभी किसी ने इस बात पर चिंतन किया है कि आखिर क्या कारण है कि व्यापारियों के खिलाफ जब भी किसी कड़े कानून की बात आती है, तो हमारे नेता उसका विरोध करने लगते हैं। इसकी वजह साफ है कि यही व्यापारी ही तो हैं, जो इन नेताओं की पार्टियों में लाखों का चंदा देते हैं। चुनाव की आर्थिक व्यवस्था में इन व्यापारियों का बहुत बड़ा हाथ होता है, इसीलिए व्यापारी बेखौफ होकर जमाखोरी, मिलावटखोरी करते हैं। कोई इनका बाल भी बाँका नहीं कर सकता। इनके सर से नेताओं का हाथ हट जाए, फिर देखो, यह किस तरह से फडफड़ाते हैं? पर क्या ऐसा संभव है?
 

   अब आपको एक आश्चर्यजनक सच्चाई से अवगत कराता हूँ। अधिकांश लोगों शायद मालूम ही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने सड़क किनारे ठेलों पर बेचे जाने वाले खाद्य पदार्थों पर कब का प्रतिबंध लगा दिया है, पर हमारे शहरों को देखकर लगता है कि क्या सुप्रीमकोर्ट के आदेश का सख्ती से पालन किया जा रहा है? सुप्रीम कोर्ट के ऐसे कई जनहित आदेश हैं, जिसकी सरे आम धाज्जियाँ उड़ रहीं हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन नहीं हो रहा है, तो यह तय है कि उस शहर में पुलिस विभाग, यातायात विभाग, नजूल विभाग आदि विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों की जेबें गर्म हो रहीं हैं।

 ऐसी बात नहीं है कि इस मामले में केवल सरकार ही दोषी है। हमें ही पता नहीं होता कि किसी गंदे नाले के किनारे खड़े ठेले से कई स्वादों से भरपूर सामग्री बिकती रहती है, हम अपने परिवार के सदस्यों को वहाँ ले जाकर मजे से पानी पूरी, चाट, भेल आदि खिलाते हैं। बाद में उस खाद्य सामग्री के स्वाद की चर्चा करते हुए घर लौटते हैं। कभी हमने यह जानने की कोशिश की कि पानी पूरी देने वाले के हाथ साफ हैं या नहीं, खाद्य सामग्री में मिलाए जाने वाले मसाले अच्छी गुणवत्ता के हैं, चाट के लिए जिस आलू का इस्तेमाल किया गया है, वह कहीं सड़ा हुआ तो नहीं है? ऐसी कई बातों पर ध्यान देने के लिए हमारे पास समय नहीं है। हम इन ठेलों की चीजें खाते हैं, अपना और अपने परिवार वालों का स्वास्थ्य बिगाड़ते हैं और सरकार को कोसते हैं। कहीं न कहीं इन मिलावटखोरों को हम ही संरक्षण दे रहे हैं। पुलिस या अन्य विभाग क्या कर लेंगे, जब हम ही अचर-कचर चीजें खाने के लिए उतावले हों? खाए जाओ, खाए जाओ, अपना स्वास्थ्य बिगाड़ते जाओ
 

डॉ. महेश परिमल