संस्करण: 19मई-2008

आसान नहीं : महिला-आरक्षण की राह
 डॉ. गीता गुप्त

बारह वर्षों के अन्तराल के बाद राजनीति में महिला-आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर उभर आया है। पहली बार सितम्बर 1996 में देवेगौड़ा सरकार के विधिमंत्री रमाकान्त खलप ने महिला आरक्षण विधोयक को पेश किया था परन्तु सरकार में सम्मिलित अन्य दलों के विरोधास्वरूप इसे पारित नहीं करवाया जा सका। फिर सन् 1997 में गुजराल सरकार ने इसे बजट सत्र के अन्तिम दिन लोकसभा में पेश किया तो शरद यादव के नेतृत्व में जनता दल के सदस्यों ने भी उत्पात मचाया। सन् 1998 और 1999 में एनडीए सरकार ने भी इसे दो बार पेश किया किन्तु उसे भी कड़े विरोधा का सामना करना पड़ा और फिर यह विधोयक काल के गाल में समा गया।
अब यूपीए सरकार द्वारा पुन: पहल की गयी है। 5 मई 2008 की रात हुई आपात्-बैठक में केन्द्रीय मंत्रीमण्डल ने इस विधोयक को अपनी स्वीकृति दी और 6 मई को इसे इसके मूल स्वरूप में ही राज्यसभा में अनेक विरोधा-व्यवधानों के बावजूद पेश कर दिया गया। राज्यसभा के अन्तिम कार्यदिवस पर प्रस्तुत इस विधोयक पर कोई चर्चा या बहस नहीं हो सकी। वस्तुत: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: को मानने वाले भारत में जिस नाटकीय परिदृश्य में इस विधोयक की प्रस्तुति हुई, वह दु:खद ही नहीं-शर्मनाक भी है। अत्यधिक तनावपूर्ण माहौल और हंगामे के बीच महिला नेत्रियों की सुरक्षित घेरेबन्दी में इसे पेश किया जा सका।
हालांकि काँग्रेस के अलावा भारतीय जनता पार्टी व वाम दल भी इस विधोयक की प्रस्तुति का समर्थन कर रहे थे पर समाजवादी सांसद अबू आसिम आज़मी ने विधिमंत्री हंसराज भारद्वाज के हाथ से जिस तरह विधोयक की प्रति छीनने का प्रयास किया और उनकी पार्टी तथा जनता दल यूनाइटेड के सदस्यों द्वारा विरोधा स्वरूप विधोयक की प्रतीकात्मक प्रतियाँ फाड़कर सदन में फेंकी गयीं और ताण्डव किया गया, उससे स्पष्ट है कि राजनेताओं में नैतिकता, वैचारिक शक्ति और आचरण की शुचिता का घोर अभाव है। समाजवादी सांसद के आपत्तिजनक व्यवहार के मद्देनज़र काँग्रेस की जयन्ती नटराजन ने उनके विरुध्द विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है।
उल्लेखनीय है कि महिला सशक्तिकरण को ध्यान  में रखते हुए तैयार किये गये आरक्षण के मसौदे के अनुसार संसद व राज्यों की विधानसभा में महिलाओं के लिए तैंतीस प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएँगी। पंचायती राज में यह आरक्षण पचास प्रतिशत है। अब केन्द्र सरकार का यह दायित्व है कि वह इस बहुप्रतीक्षित महिला-आरक्षण विधायक को पारित करवाये।
आश्चर्यजनक बात यह है कि जिस मुद्दे पर काँग्रेस, भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टी तक कथित रूप से एकमत हैं, उसके  विधोयक की प्रस्तुति के लाले पड़े हैं। तो क्या विभिन्न दलों का यह समर्थन छलावा मात्र है ?
दरअसल इस  विधोयक का विवादास्पद पहलू है-आरक्षण के भीतर जातिगत आधार पर एक और आरक्षण की माँग। यह भी विडम्बना है कि यूपीए सरकार के रेलमंत्री लालू यादव और महिला बाल विकास राज्यमंत्री रेणुका चौधारी भी इस माँग के समर्थकों में शामिल हैं। शरद यादव, लालू यादव, बहुजन समाजवादी पार्टी की मायावती, समाजवादी पार्टी के अबू आसिम आज़मी आदि नेताओं ने स्पष्ट कहा है कि महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने की स्थिति में अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से व्यवस्था हो अन्यथा इस विधोयक का प्रबल विरोध किया जाएगा।
वस्तुत: इस विधोयक के विरोधियों में अधिकतर दलित या पिछड़ी ज़ाति के नेता शामिल हैं, जिन्हें यह काल्पनिक भय है कि आरक्षण लागू होने पर उसका लाभ सिर्फ़ उच्च वर्ग की महिलाओं को मिलेगा और कमज़ोर वर्ग की महिलाएँ उपेक्षित रह जाएँगी। जबकि ज़मीनी हकीक़त यह है कि कमज़ोर वर्ग की महिलाएँ जातिगत आरक्षण के बिना भी अपने वर्ग के राजनेताओं को जनाधार के बल पर मात दे सकती हैं। मायावती इसका साक्षात् उदाहरण हैं। दरअसल विरोधियों को भय इस बात का है कि यदि यह विधोयक लागू हो गया तो संसद और विधानसभा का हर तीसरा सांसद और विधायक अपनी कुर्सी खो देगा। इसलिए वे ऐसी अनुचित माँग कर रहे हैं, जिसका पूरा होना सम्भव नहीं है। बहरहाल, उन्होंने ऐसा उपाय ढँढ़ा है कि साँप मर जाये और लाठी भी न टूटे। एक ओर विधोयक का समर्थन कर दिया और दूसरी ओर, उसे पारित न होने देने का रास्ता भी निकाल लिया।
पुरुषों की नीयत की बात छोड़ भी दें, पर रेणुका चौधारी और मायावती बहिनजी के रवैये का क्या अर्थ निकाला जाये ? यदि वे सचमुच आरक्षण की पक्षधार होंती तो पहले इसे येन-केन-प्रकारेण पारित करवाने में दिलचस्पी दिखातीं, न कि शुरू में ही अडंग़े लगातीं। इससे तो लगता है कि वे भी विधोयक के समर्थन का ढोंग कर रही हैं। अन्यथा संशोधान-परिमार्जन तो बाद में भी सम्भव है, जैसाकि प्रधाानमंत्री जी ने स्वयं कहा है कि मंत्रालय की स्थायी समिति सुझावों पर ग़ौर करेगी।
आशा है कि इस विधोयक के लागू होने से संसद व विधानसभाओं में लैंगिक समानता आएगी और महिला सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त होगा। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के सफल प्रदर्शन से यह उम्मीद जागती है कि राजनीति में भी अवसर मिलने पर वे महत्वपूर्ण योगदान करेंगी, जिससे देश के विकास में तेज़ी आएगी। राजनीतिक वातावरण में शुचिता, शालीनता और ईमानदारी का समावेश होगा। भ्रष्टाचार, अपराधाकरण और अनैतिकता में लिप्त राजनीति त्राण पा सकेगी।
महिलाओं के लिए जाति के आधार पर पृथक आरक्षण की वकालत करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि राजनीति क्या कोई नौकरी है, जिसमें जातिगत आरक्षण का अनिवार्य प्रावधान हो ? और यह भी कि साठ वर्षों से शिक्षा, छात्रवृत्ति, नौकरी-सबमें आरक्षण का सुख भोग रही ये जातियाँ अद्यपर्यन्त समुन्नत न हो सकीं तो इसमें किसका दोष है ? जातिगत आरक्षण ने ही समाज में विषमता के बीज बोये हैं, वर्ग-भेद की गहरी खाई खोदी है और योग्यता को हतोत्साहित, कुण्ठित व पलायन के लिए बाधय किया है। राजनेता इस सच को झुठला नहीं सकते, पर वे व्यक्तिगत स्वार्थ सिध्दि हेतु राष्ट्रहित को ताक पर रखकर 'कुर्सी' की राजनीति कर रहे हैं।
धयान रहे कि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी योग्यता के बल पर ही सफलता के झण्डे गाड़े हैं, पर दुर्भाग्य से राजनीति में योग्यता की दरक़ार नहीं है। यहाँ निरक्षर व्यक्ति भी सांसद बन सकता है। गुण्डे, लफंगे, डाकू, हत्यारे-सभी राजनेता और भारत के भाग्यविधााता बन सकते हैं क्योंकि इस देश में अब राजनीति एक पेशा है जिसमें कोई अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता-कोई सुनिश्चित मानदण्ड नहीं है, जिसके आधाार पर देश की अगुआई करने वाला व्यक्ति चुना जाए।
वस्तुत: आज इस बात की नितान्त आवश्यकता है कि संविधान में संशोधान कर राजनेताओं के लिए भी आयु-सीमा, शिक्षा व अन्य सुनिश्चित अर्हताएँ अनिवार्य घोषित की जाएँ। उनको मिलने वाले वेतन-भत्ते, सुविधाओं और उनके निहायत ग़ैरज़िम्मेदाराना आचरण को देखते हुए भी यह बेहद ज़रूरी है।
अब जबकि जाति-आधारित महिला-आरक्षण की माँग बलवती हो रही है, सरकार को ईमानदारीपूर्वक स्वीकारना होगा कि सिर्फ़ आरक्षण से बात नहीं बनेगी। 33 या 50: आरक्षण के साथ योग्यता का मणिकांचन संयोग अनिवार्य होगा तभी महिला व देश-दोनों सशक्त होंगे। अशिक्षित महिला रबर स्टैम्प की तरह ही होगी। अभी अनपढ़ पार्षद के पिता-पति या भाई पार्षद बने बैठे हैं, निरक्षर सरपंच के पति सरपंची कर रहे हैं; संसद व विधान सभाओं में भी यही हश्र होगा। यह तो तय है कि राजनीति में सिर्फ़ महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी मात्र से देश का कल्याण नहीं होगा अपितु जब यह एक तिहाई भागीदारी योग्य, सुशिक्षित, सजग और राष्ट्रवादी महिलाओं की होगी तभी सकारात्मक परिणाम आएँगे। बहरहाल, महिला-आरक्षण विधोयक का भविष्य अधार में है; जो भी हो, पर किसी अनुचित परम्परा की नींव नहीं डाली जानी चाहिए।
डॉ. गीता गुप्त