संस्करण: 19मई-2008

मायावती शासन के एक साल की उपलब्धि अखिलेश दास का मायावती के आगे आत्मसमर्पण

वीरेन्द्र जैन

बहुजन समाज पार्टी की सुप्र्रीमो मायावती के चरण छूकर तथा उन्हें चाँदी की तलवार व गणेशजी की मूर्ति भेंट करते हुये मनमोहन सिंह सरकार के भूतपूर्व मंत्री और उत्तरप्रदेश से काँग्रेस के महत्वपूर्ण पदों पर रहे नेता अखिलेश दास ने जो कुछ कहा व मायावती द्वारा उन्हें उसी दिन बसपा का महासचिव बना दिये जाने के साथ लखनऊ से लोकसभा का प्रत्याशी घोषित कर दिया जाना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक और काला आध्यय जोड़ता है।
व्यक्तिगत हित में दल से विद्रोह करना कोई नई बात नहीं है ऐसा पहले भी होता रहा है और हरियाणा में तो पूरे के पूरे मंत्रिमंडल ने केन्द्र सरकार के बदलते ही दल बदल लेने का इतिहास रचा था किंतु यह मामला भिन्न है। इसमें न केवल दल ही बदला गया है अपितु उन्हें स्वीकार करने वाले दल ने भी अपने आप को बदला है और अपने इतिहास में पहली बार उसी दिन किसी ऐसे नेता को महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित किया है जिस दिन उसने पार्टी की सदस्यता ली व उसी दिन उसे लखनऊ जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र से एक वर्ष पहले ही लोक सभा का उम्मीदवार भी घोषित कर दिया। इसके साथ ही इस बीच में राज्यसभा के उप चुनाव में उन्हें फिर से भेजने की बातें भी हैं। जिस नवागंतुक के लिए इतना कुछ न्यौछावर कर दिया गया है उसे काँग्रेस छोड़े जुम्मा जुम्मा चार रोज भी नहीं हुये थे और इससे पहले वह बहुजन समाज पार्टी तथा उसके नेताओं को जिन शब्दों में याद करता रहा है उससे लखनऊ के अखबार भरे पड़े हैं जहाँ पर वह मेयर पद सुशोभित कर चुका है। इसी पार्टी के नेताओं ने उस पर 1857 की क्रान्ति का ऐतिहासिक स्थल झन्डेवालाँ पार्क बेचने का आरोप लगाया था।
उत्तरप्रदेश के पुराने काँग्रेसी परिवार और पूर्व मुख्यमंत्री के इस पुत्र ने पार्टी छोड़ते हुये अपनी पूर्व पार्टी के नेताओं को जिन शब्दों में याद किया वह भी आज की राजनीति के लिए बेहद शर्मनाक है। कल तक जिन राहुल गाँधी के वे कसीदे पढते हुये नहीं अघाते थे उनके बारे में एक ही दिन में उनके विचार बदल गये और वे चापलूसों के इशारों पर काम करने वाले नजर आने लगे। काँग्रेस पार्टी छोड़ने का कारण उन्होंने यह बताया कि वहाँ उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिये था अपितु बहुजन समाज पार्टी में उन्हें वह सम्मान मिला। इसका अर्थ हुआ कि वे कांग्रेस पार्टी में सम्मान के लिए गये थे तथा वांछित सम्मान उन्हें मिलता रहे तो कॉग्रेस और भाजपा की नीतियों कार्यक्रमों घोषणाओं और विचार धाराओं में उनके लिए कोई अन्तर नहीं है। यदि सम्मान कुछ अधिक मात्रा में मिले तो वे समाजवादी पार्टी या भाजपा तक में जाने पर गुरेज नहीं करने वाले। सुना गया है कि बसपा में सम्मिलित होने से पहले उन्होंने समाजवादी पार्टी में भी सम्भावनाओं और शर्तों को टटोला था तथा बसपा की शर्तों को अधिक बेहतर पाया था।
अखिलेश दास को तो बसपा में प्रवेश मिल गया, महासचिव का पद मिल गया, लोकसभा का टिकिट मिल गया, राज्यसभा का आश्वासन मिल गया किंतु इससे उस बहुजन समाज पार्टी को क्या मिला जिसके कार्यकर्ता आधा पेट भोजन करके भी अपने समाज के वोटों को थोक में इसलिए बहुजन समाज पार्टी को देते हैं ताकि उन्हें जातिवादी शोषण से मुक्ति पाने का मार्ग मिले। किंतु उनके इन सपनों की सौदागर मायावती उन भोले भाले लोगों के वोटों के सौदे करके उन्हें उन्हीं लोगों को बेच कर मजबूत कर रही हैं जिनसे मुक्ति पाने के लिए वे छटपटा रहे हैं। वे दिन प्रति दिन बहुजन समाज पार्टी के सारे महत्वपूर्ण पद उन लोगों को देती जा रहीं हैं जिनके खिलाफ भावनाएं पैदा करके काँशीराम जी ने बहुजन समाज पार्टी के निर्माण का आधार पैदा किया था। जो लोग भी बहुजन समाज पार्टी में बाहर से आकर महत्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमाते जा रहे हैं वे 'सम्मान' पाने के लिए आये हैं जैसा कि अखिलेश दास ने कहा है ( सम्मान के साथ ऐसे लोग और क्या पाने के लिए आते हैं वह इस समय कहने की परंपरा नहीं है, उसे तो बाद में उस पार्टी के लोग कहते हैं जिसे छोड़ कर कोई दूसरी पार्टी में जाता है जैसा कि उत्तरप्रदेश के काँग्रेसियों ने केन्द्र सरकार से सीबीआई की जाँच की मांग करते हुये कहा है)।
बहुजन समाज पार्टी का गठन भारतीय लोकतंत्र की राजनीति में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था क्योंकि इसकी स्थापना ने भारतीय समाज की विसंगतियों में ही जड़ें जमायी थीं तथा अपना भोजन पानी पाया था। यह स्थापित परंपरा से विद्रोह का रास्ता था भले ही उसमें नक्सलवादी आंदोलन की तरह कई तरह की कमियां रही हों। यह बात बहुत साफ है कि जो सवर्ण लोग बहुजन समाज पार्टी में सम्मिलित हो रहे हैं वे और उनकी जाति के समर्थक पार्टी के समतावादी समाज स्थापित करने के लक्ष्य में भरोसा करके नहीं हो रहे हैं अपितु वे बहुजन समाज पार्टी के नेतृत्व में एकजुट हुये वोटों को खरीद कर सत्ता पाने के लिए आये लोग होते हैं। जो लोग सत्ता पाने की रणनीति के अर्न्तगत मंच पर मायावती के पाँव छू कर पार्टी में आते हैं वे और उनके लोग सत्ता पाकर गाँवों में दलितों पर और अधिक ताकत से दुरव्यव्हार करते हैं। वैसे भी ये लोग पहले दूसरी अन्य अनेक पार्टियों में अवसर तलाश चुके होते हैं तथा सबसे अंत में बहुजन समाज पार्टी से सौदा करते हैं जिससे उनकी सिध्दांतहीनता का पता चलता है। यदि बहुजन समाज पार्टी को छोड़ कर जाने वालों का इतिहास देखें तो पता चलता है कि ऐसे लोग जिस आधार पर आये होते हैं उसी आधार पर बेहतर सौदा हो जाने पर खिसकने में भी देर नहीं लगाते। दूसरा खतरा यह भी है कि इस पार्टी के अपने कैडर में बेचैनी बढ रही है। सत्ता में भागीदारी तो दूर की बात है इनके स्थायी समर्थकों को सत्ता से जुड़े दूसरे लाभ भी नहीं मिल पा रहे। मुलायमसिंह के राज में तो उनकी जाति के लोगों को न केवल पुलिस होमगार्ड आदि में भर्तीयों के अवसर मिले अपितु निर्माण के सरकारी ठेके, खनिजों के ठेके, टेंकर, डम्पर, क्रैशर, आदि हजारों तरह के आर्थिक लाभों में हिस्सेदारियां मिलीं जबकि मायावती के राज में ये सारे लाभ पुन: परंपरागत लोगों ने हथिया लिये। इसलिए बहुजन समाज पार्टी में जल्दी ही कुछ लोग छिटक सकते है।
अखिलेशदास का इतनी धूमधाम और इतनी शर्तों को स्वीकार करते हुये दिया गया प्रवेश बहुजनसमाज पार्टी को अंतत: नुकसान ही पहुँचायेगा जो हमारे लोकतंत्र का तो मजाक उड़ा ही चुका है। कभी बहुजन समाज पार्टी एक आन्दोलन की तरह प्रारंभ हुयी थी तथा उसका लक्ष्य समाज में परिवर्तन लाना था किंतु अब वह यथास्थिति को बनाये रखने वाली पार्टी में बदल चुकी है। उत्तरप्रदेश में अकेली दम पर शासन करते हुये उन्हें एक साल हो रहा है पर एक भी कदम ऐसा नहीं उठाया गया है जो दलितों या बहुजन समाज के तबकों को लाभान्वित करने वाला हो, जबकि इसके उलट आंकड़े बताते हैं कि दलितों पर अत्याचारों में वृध्दि हुयी है। अखिलेश दास द्वारा उन्हें दी गयी भेंट से साफ प्रकट होता है कि अब वे चांदी का दिखावटी हथियार लेकर फोटो खिंचवायेंगीं और गणेशजी की पूजा करेंगीं।
वीरेन्द्र जैन