संस्करण: 19मई-2008

पाकिस्तान फिर दो राहे पर
महेश बाग़ी

पाकिस्तान में लोकतंत्र एक बार फिर ख़तरे में दिखाई पड़ रहा है। डेढ़ माह पहले जब आसिफ़ अली ज़रदारी और नवाज़ शरीफ ने हाथ मिला कर साझा सरकार बनाई थी, तभी यह सवाल उठ खड़ा हुआ था कि यह गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकेगा, लेकिन इतनी जल्दी इनके रिश्ते दरकने की उम्मीद किसी को नहीं थी। बर्खास्त जजों की बहाली के मुद्दे पर आसिफ़ अली ज़रदारी पर वादा ख़िलाफी का आरोप लगाते हुए नवाज़ शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग के सभी नौ मंत्रियों ने सरकार से बाहर होने का फैसला किया है। इससे यूसुफ रज़ा सरकार की इस टकराहट में मुशर्रफ मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं और पाकिस्तानी अवाम को यह डर सता रहा है कि उन्हें फिर से तानाशाही का सामना न करना पड़े। वास्तविकता यह है कि जहाँ नवाज़ शरीफ़ मुशर्रफ़ से दो-दो हाथ करने को उतावले हुए जा रहे हैं, वहीं ज़रदारी ख़ामोश हैं, क्योंकि वे मुशर्रफ़ के अहसान तले दबे हुए हैं। इसलिए मुशर्रफ़ की पनाह में उन्हें सुकून महसूस हो रहा है। दरअसल भ्रष्टाचार के मामलों में जब ज़रदारी जेल की सलाखों के पीछे घुटन महसूस कर रहे थे, तब उन्हें आज़ाद कर मुशर्रफ़ ने ही उन्हें खुली हवा मुहैया कराई थी। जब बेनज़ीर भुट्टों पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थीं, तब उनके पति ज़रदारी ने दोनों हाथों से देश को लूट कर अपनी तिज़ोरियां भरी थीं। इसका पर्दाफाश होने के बाद उनके लिए जेल ही एकमात्र रास्ता था और अगर इन घोटालों के मामलों में ईमानदारी से न्याय किया जाता तो जरदारी को सारी जिंदगी जेल में ही काटना पड़ती।
जब बेनज़ीर भुट्टों की स्वदेश वापसी हुई थी, तभी यह शक किया जा रहा था कि यह मुशर्रफ की मेहरबानी से ही संभव हुआ है। लेकिन नवाज़ शरीफ़ की किस्मत उस वक्त चमक गई, जब बेनज़ीर की हत्या हो गई और उन्हें सत्ता पाने का रास्ता साफ़ नज़र आने लगा। वैसे भी ज़रदारी में न इतनी कूव्वत है और न ही वे इतने लोकप्रिय हैं कि अपने बूते पर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को सत्ता में ला पाते। इसीलिए उन्होंने पार्टी संविधान में संशोधन कर अपने नाबालिग़ बेटे को पार्टी अधयक्ष बनाया। आम चुनावों में न नवाज़ शरीफ कोई कमाल दिखा सके और न ही जरदारी। दोनों पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर सकीं तथा मज़बूरी में उन्हें गठबंधान का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। बेनज़ीर के लिए नवाज़ शरीफ तथा परवेज मुशर्रफ में कोई फर्क नहीं था, लेकिन ज़रदारी को मज़बूरी में ही सहीं, नवाज शरीफ के साथ खड़ा होना पड़ा। साझा सरकार बनाते समय यह वादा किया गया था कि नवंबर 2007 में आपातकाल लगाने को अवैधा बताने वाले जिन 60 जजों को मुशर्रफ ने बर्खास्त कर दिया था, उन्हें साझा सरकार एक महीने में बहाल कर देगी। लेकिन सरकार उन्हें नज़रबंदी से मुक्ति देने तक ही सीमित रही और बहाली का मामला ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की गई।
बखरस्त जजों की बहाली के मुद्दे पर नवाज़ शरीफ ने नया पैतरा आज़माया। उन्होंने बर्खास्त जजों की जगह मुशर्रफ़ द्वारा नियुक्त कठपुतली जजों को भी हटाने की मांग उठा दी। याद रहे कि इन्हीं जजों ने मुशर्रफ के इशारे पर ज़रदारी तथा बेनज़ीर पर चल रहे भ्रष्टाचार के मुकदमों को माफ़ करने के औचित्य को सही ठहराया था। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में ज़रदारी मुशर्रफ के साथ खड़े होने को मज़बूर है और उनकी इसी मज़बूरी का फ़ायदा उठा कर नवाज़ शरीफ साझा सरकार पर दबाव बना रहे हैं। पाकिस्तान में आपातकाल लगाने का विरोध करने वाले जजों की बर्खास्तगी और वकीलों के आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिलता देख कर ही तानाशाह शासक मुशर्रफ़ को चुनाव का रास्ता अपनाने को मज़बूर होना पड़ा था। चुनाव में भी यही मुद्दा प्रमुखता से उभरा, लेकिन दुर्भाग्य से दोनों प्रमुख दल बहुमत का जादुई आंकड़ा हासिल नहीं कर सके। साझा सरकार बनाते समय जरदारी को यह भरोसा था कि नवाज़ शरीफ़ इस सरकार को उनके हिसाब से चलने देंगे और अनावश्यक दबाव नहीं बनाएंगे। इस सोच के पीछे ज़रदारी यह मान कर चल रहे थे कि चूंकि पंजाब प्रांत में शरीफ की मुस्लिम लीग की सरकार उनकी पार्टी के समर्थन पर टिकी हुई है, इसलिए केन्द्र सरकार को शरीफ कोई हानि नहीं पहुंचाएंगे। संभवत: नवाज़ शरीफ़ भी इससे वाकिफ़ थे कि भविष्य में उन्हें पंजाब प्रांत की सरकार को समर्थन के नाम पर ब्लैकमेल किया जा सकता है। इसीलिए उन्होंने साझा सरकार को बाहर से मुद्दों पर आधारित समर्थन देने का मार्ग चुना था। इसीलिए उन्होंने अपनी पार्टी के सभी नौ मंत्रियों को वापस बुला कर साझा सरकार पर दबाव बनाया है।
अब नवाज़ शरीफ़ यह चाह रहे हैं कि बर्खास्त जजों की बहाली के साथ ही मुशर्रफ द्वारा नियुक्त जजों को बाहर का रास्ता दिखाया जाए, लेकिन जरदारी को मुशर्रफ़ का इशारा है कि उनके द्वारा नियुक्त जजों को कायम रखते हुए बर्खास्त जजों की बहाली की जाए। इसका अर्थ यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट में सत्रह की जगह सत्ताइस जज बना दिए जाएं। इसके बल पर मुशर्रफ सुप्रीम कोर्ट को भी अपने कब्जे में रखना चाहते हैं। ऐसा कर मुशर्रफ़ राष्ट्रपति पद पर अपने कब्ज़े को लंबे समय तक रखने की जुगाड़ में हैं। अगर ऐसा नहीं हुआ तो नवाज़ शरीफ और जजों का अगला निशाना मुशर्रफ़ हो सकते हैं तथा उन्हें राष्ट्रपति पद गंवाने के साथ-साथ अन्य कई मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इसी कारण डरे-सहमे मुशर्रफ़ जरदारी पर दबाव बना रहे हैं ताकि वे नवाज़ शरीफ के घेरे में न जा सकें।
इस सारी खींचतान में लोकतंत्र एक बार फिर खतरे में पड़ता दिखाई देता है। पाकिस्तान अवाम को लंबे अरसे बाद तानाशाही शासन से मुक्ति मिली थी और लोकतंत्र की बयार बहने लगी थी, लेकिन अब इस लोकतांत्रिक वटवृक्ष की जड़ों में मठा डाला जाने लगा है। जहाँ तक पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मुस्लिम लीग का प्रश्न है तो दोनों के राजनीतिक हित एक दूसरे से जुदा हैं। जब राष्ट्रपति शासन में तानाशाही चरम पर थी, तब ये दोनों पार्टियां अपने वजूद को तलाश करती फिर रही थी। अब जबकि लोकतंत्र की स्थापना के बाद तानाशाही का आलम कम हुआ है तो दोनों दलों की महत्वाकांक्षाएं सिर उठाने लगी हैं। ऐसा करते समय नवाज़ शरीफ़ तथा आसिफ़ ज़रदारी यह भूल गए हैं कि पाकिस्तानी अवाम, जो इस वक्त खुद को ठगा महसूस कर रहा है, को फिर से मौका मिला तो दोनों दलों का सूपड़ा भी साफ़ कर सकती है। इसे पाकिस्तान का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि वहाँ की अवाम ने हमेशा लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था प्रदर्शित की है, किंतु इसके कर्णधार अपनी महत्वाकांक्षाओं की खातिर लोकतंत्र का ही गला दबाने से नहीं चूके। शायद इसी कारण पाकिस्तानी अवाम तानाशाही में जीने को मज़बूरी नहीं समझने लगी है। मौजूदा दौर में यदि नवाज शरीफ 'एकला चालो' की नीति पर आगे बढ़ते हैं तो आसिफ़ अली ज़रदारी को अपने कब्जे में करना मुशर्रफ़ के लिए बहुत आसान हो जाएगा और मुशर्रफ़ यही चाहते भी हैं, ताकि सत्ता पर उनकी पकड़ बनी रहे।
महेश बाग़ी