संस्करण: 19मई-2008

पड़ौसी देशों से अच्छे संबंध हमारे विकास व सुरक्षा के लिये आवश्यक हैं
एल.एस.हरदेनिया

 

भारत के चतुर्दिक विकास तथा सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि उसके पड़ोसी देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था न सिर्फ कायम रहे वरन् दिन प्रतिदिन उसकी जड़ें मजबूत हों। भारत की इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। यह भागीदारी कैसे संभव है और उसके लिए क्या किया जा सकता है, इस पर विचार करने के लिए पिछले दिनों एक संवाद आयोजित किया गया था।
संवाद में सर्वप्रथम भारत के पड़ोसी देशों में जो घटनाएं हुई हैं उन पर चर्चा हुई। फिर इस बात की चर्चा हुई कि उन घटनाओं से भारत के इन देशों से संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इस संदर्भ में पाकिस्तान एवं नेपाल में संपन्न चुनावों और उनके नतीजों पर चर्चा हुई। सभी की राय थी कि पाकिस्तान की जनता के संयुक्त प्रयासों से वहां सैनिक तानाशाही का अंत हुआ है। इस प्रक्रिया में वहां की राजनीतिक पार्टियों ने महत्वपुर्न भूमिका अदा की है। पाकिस्तान के तानाशाह जनरल मुशर्रफ के हौंसले इतने बढ़ गए थे कि उन्होंने न केवल वहां के मुख्य न्यायाधीश को बर्खास्त किया वरन् बर्खास्तगी के बाद उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया था। मुख्य न्यायाधीश को बर्खास्त किया वरन् बर्खास्तगी के बाद उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया था। मुख्य न्यायाधीश की गिरफ्तारी के बाद पाकिस्तान में जबरदस्त आक्रोश उत्पन्न हुआ। उसके बाद बेनजीर भुट्टों की हत्या कर दी गई थी। हत्या के बाद पाकिस्तान में चुनाव हुए। चुनाव में पाकिस्तान की जनता ने तानाशाह मुशर्रफ को शिकस्त दी और दो पार्टियों की मिली जुली सरकार बनी।
इस समय पाकिस्तान का राजनीतिक वातावरण बदला हुआ है। पूर्व में राजनैतिक पार्टियों में भारत के विरुध्द विषवमन करने की प्रतियोगिता रहती थी। अब वैसी स्थिति नहीं है। वह दिन दूर नहीं जब पाकिस्तान की पार्टियां अपने चुनावी घोषणा पत्र में भारत से दोस्ती का नारा देकर चुनाव जीतने का प्रयास करेंगी। इस समय पाकिस्तान में कश्मीर के मुद्दे को भी उतना महत्व नहीं दिया जा रहा है। कश्मीर का सवाल अब बेक सीट पर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान के आम लोग भारत से व भारत की जनता से दोस्ती करने के इच्छुक हैं। यही वह बुनियाद है जिससे दोनों देशों की दोस्ती एक मज़बूत पाये पर खड़ी रह सकती है। पाकिस्तान की जनता भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था, यहां हो रहे विकास और यहां की राजनीतिक स्थिरता के प्रशंसक हैं और दिल से चाहते हैं कि ऐसी व्यवस्था वहां भी स्थापित हो। पाकिस्तान में जितनी नदियां हैं उनमें से अनेक का उद्गम कश्मीर से है इसलिए पाकिस्तान की जनता को हमेशा इस बात की शंका रहती है कि कहीं भारत इन नदियों का पानी उन्हें देना बंद न कर दे। यह भी बताया गया कि अभी तक पाकिस्तान, आमीं अल्लाह व अमरीका पर निर्भर रहता था लगता है अब इस निर्भरता के दिन लद गए हैं।
जहां तक नेपाल का सवाल है वहां जो कुछ हुआ है वह अद्भुत है। दुनिया के इतिहास में पहली बार किसी क्रांतिकारी संगठन ने सफलता पाने के बाद बुलेट (हथियार) को त्यागकर बैलेट (प्रजातंत्र) अपनाया है। यह जादुई करिश्मा नेपाल में हुआ है। नेपाल में माओवादियों ने चुनाव में भारी सफलता हासिल की है। चुनावों के कुछ समय पहले वहाँ के राजतंत्र के खिलाफ वे सशस्त्र क्रांतिकारी कर रहे थे। माओवादियों का एक ही नारा था ''नेपाल के राजतंत्र को समाप्त करो।'' अपने सतत् कठिन संघर्ष से उन्होने यह मंजिल हासिल कर ली है। परिश्रम, त्याग, आदर्शों और उसूलों के प्रति उनकी प्रतिबध्दता प्रशंसनीय है। पिछले दस सालों में आम जनता के बीच, गरीबों, शोषितों के बीच रहकर उन्होंने राजतंत्र के विरुध्द वातावरण बनाया। इस प्रक्रिया में उनने भारी कष्ट उठाए। परंतु उनने अपने पक्के इरादों को नहीं त्यागा। यही कारण है कि उनका राजतंत्र को जड़ मूल से उखाड़ने का सपना पूरा हो रहा है। माओवादी व उनके सर्वमान्य नेता प्रचंड भारत के साथ प्रगाढ़ मैत्री चाहते हैं। प्रचंड जानते हैं कि नेपाल अनेक मामलों में भारत पर पूरी तरह से निर्भर है। परंतु वे चाहते हैं कि इस निर्भरता के चलते भारत, नेपाल के साथ बिग ब्रदर जैसा व्यवहार न करे। इसलिए प्रचंड व माओवादी यह चाहते हैं कि 1950 में हस्ताक्षरित भारत-नेपाल संधि के प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए। जहां तक नेपाल का सवाल है, वह भारत व चीन के बीच में संतुलन बनाना चाहेगा। इस संदर्भ में भारत को किसी भी प्रकार की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए।
यह भारत व नेपाल दोनों के हित में है कि 1950 की संधि पर फिर से विचार हो। सभी ने यह स्वीकार किया कि यदि माओवादी राजतंत्र की समाप्ति के साथ नेपाल को विकास के रास्ते पर ले जाने में सफल होते हैं तो वे दुनिया के इतिहास में एक नया पृष्ठ जोड़ सकेंगे। संवाद में नेपाल के एक प्रवक्ता ने कहा कि माओवादी पश्चिमी बंगाल में हुए भूमि सुधार और केरल के शिक्षामण्डल से काफी प्रभावित हैं। प्रचंड ने स्वयं इन दोनों राज्यों में जाने की इच्छा प्रगट की है। माओवादी बार बार इस बात को दुहरा रहे हैं कि वे हर हालत में भारत से अपने संबंधा मधुर बनाए रखना चाहते हैं। संवाद के दौरान यह बात भी कही गई कि यदि माओवादी नेपाल में सफल हुए तो उससे भारत के नक्सलवादी भी प्रभावित होंगे। यदि ऐसा होता है तो इस बात की प्रबल संभावना निर्मित होगी कि नक्स्लवादी बंदूक छोड़कर देश की प्रजातांत्रिक मुख्यधारा में शामिल हो जाएंगे।
संवाद के दौरान इस बात की शंका प्रगट की गई कि अमरीका का भरसक प्रयास होगा कि नेपाल के माओवादियों के शासन को न सिर्फ अस्थिर किया जाए वरन् यदि संभव हो तो उन्हें उखाड़ फेककर पुन: राजतंत्र की बहाली की जाए। इस मामले में भारत को सावधानी बरतनी होगी।
एल.एस.हरदेनिया