संस्करण: 19मई-2008

22 मई-अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर विशेष
''जैव विविधता का संरक्षण एवं आर्थिक विकास''
स्वाति शर्मा

भारत जैव विविधाता की दृष्टि से एक समृध्द देश है। विश्व में पाई जाने वाली कुल 15 लाख जैव विविधाताओं में से 40 प्रतिशत भारत में मिलती हैं। अभी तक भारत में कुल 75,000 तरह के जंतु तथा 45,000 तरह की वनस्पतियाँ पहचानी जा चुकी हैं। ये वनस्पतियाँ आर्थिक दृष्टि से बहुत उपयोगी हैं, हमारे जीवन का आधार हैं। ये हमारे भोजन का प्रमुख अंश हैं। वनस्पतियाँ वातावरण की जहरीली गैस कार्बन डाइ ऑक्साइड का अवशोषण् कर ऑक्सीजन प्रदान करती हैं, जिसे हम साँस के रूप में ग्रहण करते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एक सामान्य वृक्ष अपने औसत जीवनकाल में हमें 20 से 40 लाख रु. तक का लाभ पहुँचाता है। ईंधान, चारा, रबड़, गोंद, लाख, इमारती लकड़ी, फल-फूल, कंद-मूल तथा जड़ी-बूटियाँ सब वनों की ही देन है। विभिन्न प्रकार के लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए कच्चा माल वनों से ही प्राप्त होता है। इससे ग्रामीणों को रोजगार की प्राप्ति होती है। भारत के लगभग 1 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वनों पर आश्रित हैं। जंगलों में निवास करने वाली आदिम जातियाँ अपनी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति वनों से ही करती हैं। वनों से प्राप्त जड़ी-बूटियों के निर्यात से देश को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। भारत में भी औषधीय पौधों का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है।
भारतीय वन राजस्व प्राप्ति के प्रमुख स्रोत हैं। इनसे केन्द्र व राज्य सरकारों को 500 करोड़ से भी अधिक का राजस्व मिलता है। वनों के जैव भार से वनों का मूल्य निधर्रित होता है। एक मधयम आकार के वृक्ष से 50 वर्षों में लगभग 50 टन जैव भार मिलता है। इससे लगभग 15.75 लाख रु. की पर्यावरणीय सेवाएँ प्राप्त होती हैं। यदि वनों के सारे काष्ठ को बेच दिया जाए तो 5,60,000 करोड़ रु. प्राप्त होंगे। वन राष्ट्रीय आय में 3 प्रतिशत का योगदान करते हैं। वनों के अप्रत्यक्ष लाभ भी हैं। वन वर्षा लाने में सहायक हैं, भूक्षरण रोकते हैं, प्रदूषण दूर करते हैं, जीव जंतुओं के आश्रय स्थल हैं, बाढ़ नियंत्रण करते हैं, पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखते हैं। मानसूनी वर्षा वनों पर ही निर्भर है, जिससे फसलोत्पादन प्रभावित होता है।
वनस्पतियों के समान जंतु भी देश की आर्थिक समृध्दि के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। पक्षुओं से गोबल प्राप्त होता है, जिससे कंपोस्ट खाद बनाई जाती है। इसके प्रयोग से फसलोत्पादन में वृध्दि होती है। हड्डियाँ, खाल, सींग, हाथी-दाँत-ये सब जंतुओं से ही प्राप्त होते हैं। इन पर आधारित उद्योगों से काफ़ी लोगों का जीविकोपार्जन होता है। रेशम कीट पालन, मत्स्य पालन, मुर्गीपालन, सुअर व मधुमक्खी पालन ये सब ग्रामीण भारतीयों के मुख्य व्यवसाय व उनकी आमदनी के प्रमुख स्रोत हैं। वन्य प्राणियों के शारीरिक अवशेषों की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में काफ़ी मांग है। वन्य प्राणियों के शारीरिक अवशेषों की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में काफ़ी माँग है जिसके व्यापार से काफ़ी मुद्रा अर्जित की जाती है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आज तक जैव संसाधानों का खूब विनाश हुआ है। बड़े-बड़े बाँधों के निर्माण तथा उद्योगों की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए। देश की बढ़ती आबादी के लिए भोजन व आवास की समस्या हल करने के लिए बड़ी मात्रा में वनों का सफाया किया गया। यही नहीं, चारागाह के रूप में वन क्षेत्रों का अनियंत्रित तरीके से उपयोग किया गया। वन्य प्राणियों के शारीरिक अवशेष इकट्ठा करने के लिए उनका अवैधा शिकार किया जा रहा है। इसके अलावा बहुत बड़ी वन भूमि कृषि कार्य हेतु उपयोग की गई है। इससे भी पेड़-पौधो, जीव-जंतु नष्ट हुए। अनुमानत: मानवीय हस्तक्षेप के कारण प्रतिवर्ष 1 लाख 70 हजार वर्ग किमी. वन क्षेत्र कम हो रहा है। जैव विविधाता विलोप के बारे में वैज्ञानिकों की धारणा है कि यदि किसी आवास स्थल का क्षेत्र 90 प्रतिशत कम कर दिया जाए तो वहाँ की लगभग 50 प्रतिशत प्रजातियाँ मर जाती हैं। भारत में इस समय स्तनपायी वन्य जीवों की 81 प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में है।
जंतु तथा वनस्पतियाँ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखती हैं। ओजोन परत में छिद्र, ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण ताप वृध्दि, अम्ल वर्षा, भू क्षरण, जलस्तर में कमी, वर्षा में कमी, बाढ़, सूखा, प्रदूषण, मरूस्थलीकरण जैसी समस्याएँ जैव विविधाता के विनाश का ही परिणाम हैं। जब किसी स्थान विशेष में वन काटे जाते हैं तो उसका दुष्प्रभाव दूर-दराज के इलाकों पर भी पड़ता है क्योंकि भू-रसायन चक्रों द्वारा सभी क्षेत्र आपस में जुड़े हुए हैं। भारत के 80 प्रतिशत लोग आज भी गाँवों में रहते हैं जिनकी आमदनी के स्रोत प्राकृतिक संसाधान ही हैं। प्राकृतिक संसाधानों के छिनने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जाती है, जिसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस समय देश के कुल भू-क्षेत्र के 11 प्रतिशत पर ही वन हैं, जबकि 33 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित होना चाहिए। जैव विविधाता के विनाश का दुष्परिणाम सीधे कृषि पर पड़ता है। वनस्पति आवरण हटने से प्रतिवर्ष 6 करोड़ टन उपजाऊ मिट्टी का क्षरण हो जाता है, जलवायु प्रभावित होती है, वनस्पतियों पर आश्रित जानवर कम होने लगते हैं। फसलें प्रभावित होती है, वनस्पतियों पर आश्रित जानवर कम होने लगते हैं। फसलें रोगी हो जाती हैं। जल प्रदूषण् के कारण मछलियाँ मरने लगती हैं, जिससे उन लोगों के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो जाता है जिनका मुख्य व्यवसाय मत्स्य पालन है। चूँकि जैव विविता की दृष्टि से भारत एक धनी देश है, इसीलिए देश के आर्थिक विकास की दृष्टि से जैव विविधाता को नष्ट होने से बचाया जाना चाहिए, उनकी सुरक्षा की जानी चाहिए तथा उसे संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। हमारी जिन जड़ी-बूटियों की विदेशों में मांग है, उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन कर अपनी आवश्यकता पूर्ति के साथ-साथ निर्यात भी किया जा सकता है। ये औषधीय पौधो भी देश की आर्थिक समृध्दि का बड़ा स्रोत हैं।
वनों का विनाश आज चिंताजनक दौर में पहुंच गया है। इसे रोकने के शीघ्र प्रयास नहीं किए गए तो वनोत्पादों पर निर्भर व्यवसाय दयनीय हालत में पहुँच जाएंगे, फसलोपज प्रभावित होगी तथा जानवरों की संख्या दिनों दिन घटेगी। हम सभी का दायित्व है कि जैव विविधाता को नष्ट होने से बचाएँ, उसका अधिकाधिक संरक्षण करें तथा वैज्ञानिकों कार् कत्तव्य है कि वे नई तकनीकों के बल पर उपलब्धा जैव संसाधानों के अधिकतम उपयोग को बढ़ावा दें ताकि देश की आर्थिक प्रगति हो, देश समृध्द बने।

स्वाति शर्मा