संस्करण: 19मई-2008

गंभीर खाद्य संकट में ट्रांसजेनिक फसलों की उपयोगिता
डॉ. सुनील शर्मा

दुनिया भर में खाद्य वस्तुओं की कीमतें आसमान पर हैं। विकसित राष्ट्रों द्वारा मक्का जैसी खाद्यान्न फसलों का जैव ईंधन के रूप में बढ़ते उपयोग तथा मौसम की बेरूखी से सारी दुनिया में खाद्यान्न के भंडारों में जबरदस्त कमी आई है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसे संगटन खाद्यान्न के संकट और गहराने की आशंका व्यक्त कर रहे हैं। हमारा देश भी इस वैश्विक संकट की वजह से बढ़ती मँहगाई से परेशान है। गरीब और मजदूर वर्ग महँगाई की वजह से भारी कुपोषण की ओर बढ़ रहा है। हालांकि वर्तमान में हमारे देश में खाद्यान्न संकट नहीं है परंतु भविष्य में देश को किसी खाद्यान्न संकट से बचना है तो कृषि उत्पादन की वर्तमान दर जो कि 2.6 फीसदी है को 4.5 फीसदी तक ले जाना बेहद जरूरी है। इस संदर्भ में भारत के कृषि अनुसंधान परिषद के महासचिव डॉ. मंगला राय का कहना है कि भूमि की उर्वरकता कम होने, ग्लोबल वार्मिंग तथा घटते जल संसाधानों तथा बढ़ती मांग में सामंजस्य बनाये रखने के लिए कृषि क्षेत्र में अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। तथा खाद्यान्न की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए जेनेटिकली मोडिफाइड (जी.एम) फसलों की जरूरत है। आज जब सारी दुनिया के पर्यावरण्विद् और कृषि वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इन जेनिटकली मोडिफाईड फसलों का विरोध कर रहा है। इन्हें पर्यावरण और मानवता विरोधी मान रहा है। ऐंसे में भारतीय कृषि अनुसंधान के सर्वोच्च अधिकारी का यह विचार मनन करने योग्य हो सकता है परंतु आज से लगभग 15 साल पहले विकसित किये गए इन जी.एम. बीजों को अब तक दुनिया के सिर्फ 22 देशों ने अपने यहां खेती में उपयोग करने की अनुमति दी है तथा दुनिया भर की कुल खेती की मात्र 1.5 फीसदी पर ही इन बीजों के जरिए खेती होती है। विश्व के अनेक देशों में इन बीजों के परीक्षण और खेती में उपयोग पर प्रतिबंधा भी लगाया है। इन विरोधाभासों के बीच इस बात में कोई शक नहीं है कि इन बीजों से कृषि उत्पादन में ना सिर्फ वृध्दि होगी वरन् कृषि को नुकसान पहृँचाने वाले हानिकारक कीटों से मुक्ति मिलेगी। वर्तमान में कुछ अंतर्राष्ट्रीय बीज कंपनियां तथा विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित पराजीवी प्रजातियों का व्यवसायिक स्तर पर बीज उत्पादन तथा वितरण किया जा रहा है। इनमें से कुछ प्रमुख प्रजातियां जैसे कॉलजीन कंपनी द्वारा विकसित कीट प्रतिरोधी कपास, एस्ग्रो कंपनी द्वारा विकसित विषाणु रोग प्रतिरोधी कद्दू तथा मॉनसेंटो द्वारा विकसित कीट प्रतिरोधी मक्का तथा कपास आदि हैं। हमारे देश में भी देश की लगभग 34 सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं में सब्जियों और अनाजों के बीज को जैविक रूप से संशोधित करने का काम चल रहा है, जिन सब्जियों और अनाजों के बीजों को इस काम में शामिल किया है उनमें फूलगोभी, पत्तागोभी, आलू, टमाटर, बैंगन, मक्का और भिंडी शामिल हैं। जी.एम. क्रांति के जरिए कई फसलों में अब ऐंसी पराजीवी प्रजातियां विकसित कर दी गई है जो अच्छी पैदावार देने के साथ-साथ कुछ विशेष जैविक-अजैविक आपदाओं के लिए प्रतिरोधी भी हैं, जैसे कीट एवं रोग, लवण, पाला, सूखा इत्यादि। अब टमाटर की ऐंसी पराजैवी प्रजाति विकसित कर ली गई है जिसके फल धीरे-धीरे पकते हैं और इस प्रकार उनको एक जगह से दूसरी जगह से सही सलामत आसानी से पहुँचाया जा सकता है। इसके अलावा कुछ ऐंसी भी ट्रांसजैनिक प्रजातियां हें जिनमें खरपतवारों के नाश के लिए प्रयोग होने वाली दवाओं के प्रति प्रतिरोधाक क्षमता होती है।
वास्तव में ट्रांसजैनिक फसलें दूसरी हरितक्रांति लाने में पूरी तरह सक्षम हैं। परंतु विगत कुछ वर्षों में पराजीनी फसलों के बड़े पैमाने पर अपनाये जाने के कारण इन फसलों से होने वाले संभावित अनुवांशिक प्रदूषण् ओंर मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभावों ने भविष्य में इनके अपनाये जाने पर कई प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं जैसे इन पौधो में विद्यमान प्रतिरोधी बी.टी.जीन दूसरे लाभदायक नानटाग्रेट कीटों को भी नहीं मार देंगे, इन पौधों में मौजूद तृणनाशी प्रतिरोधाता वाले पौधो के परागकण हवा द्वारा उड़ कर दूसरे सामान्य बिना प्रतिरोधाता वाले पौ धो  पर जाने पर आक्रामक, स्थायी और अधिक शक्तिशाली खरपतवार पैदा नहीं करेंगे। इन पराजीनी पौधों के वायरस स्त्रोत से प्राप्त डी.एन.ए. खंड विभिन्न रोगो के पैथोजेनिक वॉयरस के डी.एन.ए. खंड से संकरण कर कोई और अधिक आक्रामक वॉयरस नहीं पैदा करेंगे जो आगे के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दें इत्यादि। ये आशंकायें अकारण नहीं0 हैं, क्योंकि ट्रांसजीनी पौधों में व्याप्त अधिकतर जीव वॉयरस तथा वैक्टीरिया से प्राप्त किये गये होते हें जिनमें से कुछ तो रोग पैदा करने वाले भी हैं। हमारे देश में जिन सब्जियों और अनाजो के बीजों में वेक्टीरिया के जो जीन डाले जा रहे हैं उनकी मदद से इनके पौधों में खुद व खुद ऐंसे कीट नाशक पैदा होगे जो कीटाणुओं को नष्ट कर देंगे। इस प्रकार के बीज विकसित होने के बाद किसानों को इन फसलों के लिए कीटनाशक का इस्तेमाल नही  करना होगा परंतु गैर सरकारी संगठन कोलिशन फॉर जी.एम. फ्री इंडिया का कहना है कि जो बीज पौधों के अंदर कीटनाशक पैदा कर सकता है उससे उत्पन्न चीजों को खाने से इंसान के शरीर में भी कीटनाशक पैदा हो सकता हैं। इस संगठन का कहना है कि इन बीजों के परीक्षण चूहों पर किए गये हैं। परीक्षण में पाया गया है कि उनमें से कई चुहों की किडनी विकसित नहीं हो पाई है तथा कई विकलांग पैदा हुए हैं। इसके अलावा बी.टी.जीन युक्त फसलों के कारण जैव विविधाता को भारी खतरा है क्योंकि कोई विशेष प्रकार का वॉयरस पैदा होकर किसी विशिष्ट जीव प्रजाति को नष्ट कर सकता है। ज्यादातर ट्रांसजैनिक फसलों में ट्रेटर या टर्मिनेटर जीन होते हैं। जिसकी वजह से इन फसलों से प्राप्त बीज पुन: फसल उगाने के काम में नहीं लाये जा सकते। इस तरह किसानों को हर साल नई फसल के नये बीज खरीदने पड़ेंगे और फसल की उत्पादन लागत में भारी वृध्दि होगी। विभिन्न कंपनियों द्वारा उत्पादित जी.एम. बीज. किसी विशिष्ट उर्वरक और कीटनाशक को ही स्वीकार करते हें। इस तरह जी.एम. फसले कृषि उत्पादन में एकाधिकारवाद को बढ़ावा देंगीं। जी.एम. फसलों के समर्थक इनके सुरक्षित होने के संबंधा में कितना ही ढ़िढोरा ही क्यों ना पीटें परंतु दीर्घकालिक रूप से इनके परिणाम अच्छे नहीं होगें। हमें अपनी खाद्य आपूर्ति जी.एम फसलों के सहारे सुनिश्चित करने का रास्ता नहीं तलाशना चाहिए क्योंकि यह मूलत: प्रकृति विरोधी कार्य है और प्रकृति का विरोधा सुरक्षा नहीं वरन् विनाश का आमंत्रण होता है।
डॉ. सुनील शर्मा