संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

निर्माण कार्यों में लगे कामगारों के हितों की अनदेखी

राज्यों को सुप्रीम कोर्ट की लताड़

? राजेन्द्र जोशी

               भवन निर्माण और विभिन्न निर्माण कार्यों में लगे कामगारों के हितों के संरक्षण के प्रति अनदेखी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में विभिन्न राज्यों को लताड़ लगाई है। सुप्रीम कोर्ट में एक अशासकीय संगठन (एन.जी.ओ.) और राष्ट्रीय अभियान समिति ने इन कामगारों के हितों के संरक्षण के लिए बने कानून का पालन कराने का अनुरोध किया था। उल्लेखनीय है कि निर्माण कार्यों में लगे कामगारों के हितों के संरक्षण के लिए एक कानून 'रेगुलेशन आफ एम्पलायमेंट एंड कंडीशन्स आफ सर्विस' एक्ट 1996 बना हुआ है। राज्यों द्वारा इस कानून की अनदेखी प्रकाश में आने पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को निर्देश दिए थे कि इस कानून का सख्ती से पालन किया जाय, किंतु सरकारों द्वारा इस निर्देश का पालन नहीं किए जाने पर कोर्ट ने कड़ा रूख अख्तियार किय है। उच्चतम कोर्ट ने अपने निर्देश में राज्यों को लताड़ लगाते हुए कहा है कि क़ानून को लागू कराने में ढिलाई बरतने वाले संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना पर 'कंटेप्ट ऑफ कोर्ट' क्यों न चलाया जाय।

               अनेक मामलों में यह हो रहा है कि कानून तो बन जाते हैं किंतु उनके पालन करने में सरकारी एजेंसियों द्वारा अक्सर अनदेखी की जाती है। इस अधिनियम के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। कोर्ट ने पूर्व में जिन राज्यों में इस अधिनियम का पालन नहीं हो रहा था उनके प्रति कड़ा रूख अपनाया है। ये राज्य हैं-उत्तरप्रदेश,जम्मू-कश्मीर असम और कुछ अन्य राज्य। ये राज्य इस अधिनियम का पालन करने में असफल माने गये। शिकायतकर्ता एन.जी.ओ. ने महाराष्ट्र, गोवा, नागालैंड और चंडीगढ़ में भी अधिनियम के प्रति अनदेखी की शिकायत की है।

               कामगारों के हित के लिए बने इस अधिनियम के तहत राज्यों में सरकारों को रजिस्टरिंग आफीसर्स नियुक्त करने की व्यवस्था है। साथ ही प्रत्येक नियोजक को अपने संस्थान का रजिस्ट्रेशन भी कराना है। किंतु इस दिशा में अधिनियम के बिन्दुओं का पालन नहीं किया जा रहा है। नियोजकों द्वारा कामगारों की सेवाशर्तें भी निर्धारित करने में रूचि नहीं दिखाई दे रही है। परिणाम स्वरूप कामगारों की अपनी मेहनत का उचित मूल्यांकन नहीं हो पाता है। उन्हें समुचित पगार मिलने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। भवन निर्माण के कार्यों में लगे कामगारों के लिए इस अधिनियम में व्यवस्था है कि इन्हें समुचित मेहताना मिल सके इस दृष्टि से राज्यों को निर्देशित किया गया है कि वे अपने यहां स्टेट वेल्फेयर बोर्ड बनायें ताकि भवन निर्माण में लगे कामगारों के हितों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके। इस बोर्ड में एक चेयरमेन होगा जिसे केन्द्र सरकार नामजद करेगी। जिनकी संख्या 15 से अधिक नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने राज्यों में इस बोर्ड के गठन नहीं होने पर भी नाराजी व्यक्त की है। कोर्ट का मानना है कि बोर्ड न बन पाने से विभिन्न निर्माण कार्यों के मजदूरों के हितों पर कुठाराघात हो रहा है। कोर्ट की ध्यान में यह बात भी लाई गई है कि जिन राज्यों में बोर्ड का गठन भी यदि हुआ है तो वह केन्द्र द्वारा निर्धारित मापदण्डों के आधार पर नहीं है।

               मैदानी तौर पर निर्माण कार्यों के मजदूरों के प्रति अनदेखी हो रही है। भवन निर्माण या अन्य निर्माणों में मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका होते हुए भी उनके प्रति नियोजकों का नजरिया बदलने की जरूरत है। यह जरूरत इस अधिनियम के सख्ती से पालन कराने पर ही पूरी हो सकती है। देश में जगह-जगह निर्माण कार्यों की श्रृंखलाऐं चल रही है। भवन निर्माण के साथ ही सड़क निर्माण,बांध निर्माण और अन्य निर्माण कार्यों में प्रतिदिन लाखों मजदूर मजदूरी करते हुए अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। अधिकतर निर्माण कार्यों को ठेकेदारों के माध्यम से कराया जाता है। ठेकेदार लोग ही मजदूरों की पगार का अपने हित के अनुसार निर्धारण करता है और इससे असहाय और मजबूर कामगारों का रात दिन शोषण हो रहा है। कतिपय निर्माण कार्य सरकारी मस्टर रोल के माधयमों से चल रहे हैं किंतु मस्टर रोल व्यवस्था में भी इतनी अधिक खामिया पाई जाती है कि मजदूरों को अपनी मेहनत का उचित प्रतिफल नहीं मिल पा रहा है।

               राज्य सरकारें भी अपने अपने राज्यों में विभिन्न निर्माण कार्यों के लिए केन्द्र से सदैव याचना करती रहती है। सरकारें निर्माण के लिए केन्द्र से धन तो प्राप्त कर लेती हैं किंतु मजदूरों के हितों का ध्यान भी नहीं रखती हैं। मजदूरों के हितों के लिए हालांकि कानून भी बना हुआ है किंतु सरकारें इस कानून को लागू कराने में जरा भी रूचि नहीं दिखा रही हैं। यदि सरकारें अपने अपने राज्यों में मजदूरों के हित में स्टेट वेल्फेयर बोर्ड निर्धारित प्रक्रिया के तहत गठित कर लेती हैं तो निश्चित ही मजदूरों के हितों का संरक्षण हो सकेगा।

                सुप्रीम कोर्ट की इस लताड़ का कि कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना के लिए क्यों न संबंधित अधिकारियों के खिलाफ 'कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट'  चलाया जाय, का क्या असर पड़ता है, यह देखना है। राज्य सरकारों का अब यह दायित्व है कि वे अपने स्वयं के नियोजन में चलने वाले कार्यों में लगे मजदूरों और अपने राज्यों के अशासकीय नियोजकों के मजदूरों के हितों के प्रति अनदेखी नहीं करे।

? राजेन्द्र जोशी