संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

आंध्र प्रदेश सरकार ने

पेश की एक अनूठी मिसाल

? जाहिद खान

                 हमारे मुल्क की संवैधानिक व्यवस्था में नागरिक अधिकार बहुमूल्य हैं। राज्य की कोई भी विधि, अध्यादेश, रूढ़ि या प्रशासनिक आदेश इसमें न तो कोई कमी कर सकते हैं और न ही इन्हें विघटित कर सकते हैं। यानी, कोई भी कानून उस सीमा तक शून्य होगा, जिस सीमा तक वह नागरिकाधिकारों का उल्लंघन करता हो। बावजूद इसके व्यवहार में यदि देखें तो नागरिक समाज में इनकी रक्षा को लेकर जागरूकता का अभाव रहा है। यही वजह है कि मुल्क में आए दिन ऐसे मामले सामने आते रहते हैं,जिनमें नागरिक अधिकारों का जमकर उल्लंघन किया जाता है। और ये उल्लंघन वे एजंसियां करती हैं, जिनकी जिम्मेदारी इनके संरक्षण की है। बहरहाल, हाल ही में आंध्र प्रदेश से एक ऐसा फैसला आया है, जो नागरिक अधिकारों के संरक्षण एवं प्रोत्साहन की दिशा में मुल्क में एक नजीर बन सकता है।

               आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने पिछले दिनों एक अनूठा कदम उठाते हुए उन मुस्लिम नौजवानों से माफी मांगी है,जो मई 2007 में हैदराबाद की मक्का मस्जिद में बम धमाके के बाद पुलिसिया हिंसा और अत्याचार का शिकार हुए थे। सूबाई सरकार ने न सिर्फ इन बेगुनाह नौजवानों से माफी मांगी,बल्कि उन्हें मुआवजा देने का भी फैसला किया। मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने इस घटना में सबसे बुरी तरह प्रभावित 20लोगों को 3-3 लाख और दीगर बाकी लोगों को 20-20हजार रूपए देने का एलान किया है। यही नहीं,पीड़ित लोगों को सरकार अपनी ओर से एक चरित्र प्रमाणपत्र भी देगी,जो उनके बेगुनाह होने का एक अतिरिक्त सबूत होगा। जाहिर है, सरकार के यह कदम जहां नौजवानों के दामन पर लगे आतंकवाद के धब्बों को धोने में मददगार साबित होंगे, वहीं उनके आर्थिक एवं सामाजिक पुनर्वास में भी सहायक बनेंगे।

                बीते एक दशक में मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों में ऐसे अनेक मामले सामने निकलकर आए हैं, जिसमें मुस्लिम नौजवान पुलिस और जांच एजंसियों की ज्यादतियों के शिकार हुए। खास तौर पर आतंकवाद के मामलों में इन्हें जान-बूझकर फंसाया गया। मालेगांव, मक्का मस्जिद, मोडासा, अजमेर दरगाह शरीफ और समझौता एक्सप्रेस आदि बम विस्फोट मामलों में जिन मुस्लिम नौजवानों को पुलिस, एटीएस और दीगर जांच एजंसियों ने गिरफ्तार किया था, बाद में वे बेकसूर निकले। उन पर दहशतगर्दी के लगाए गए सभी इल्जाम अदालत में झूठे साबित हुए। पुलिस, एटीएस और जांच एजंसियों ने जिस झूठ की बुनियाद पर यह केस रचे-बुने थे,वह अदालत में आखिरकार कमजोर निकले। मक्का बम विस्फोट मामले की तरह ही महाराष्ट्र के मालेगांव में साल 2006 और 2008 में हुए बम विस्फोटों के मामले में भी बड़ी तादाद में मुस्लिम नौजवान पुलिसियां हिंसा और पक्षपात के शिकार हुए। इन नौजवानों को जेल में 5 साल से ज्यादा हो गए, लेकिन फिर भी पुलिस अभी तलक इन पर कोई इल्जाम साबित नहीं कर पाई है। हाल ही में अब जाकर इन नौजवानों की जमानत हुई है।

                 गौरतलब है कि मक्का मस्जिद विस्फोट मामले में हैदराबाद पुलिस ने सूबे में 70 मुस्लिम नौजवानों को बम विस्फोट का दोशी बतलाते हुए गिरफ्तार किया था। जेल में उन्हें भयानक यातनाएं दी गईं। ये नौजवान जेल में आगे भी यूं ही सजा काटते, अगर मक्का मस्जिद बम विस्फोट और दीगर बम विस्फोटों की साजिश पर से पर्दा नहीं हटता। जिन बम विस्फोटों के लिए असल में असीमानंद और संघ से जुड़ी मुख्तलिफ तंजीमों के सक्रिय कार्यकर्ता जिम्मेदार थे, उस जुर्म के इल्जाम में हमारी पुलिस और जांच एजंसियों ने मुल्क के अंदर सैकड़ों मुस्लिम नौजवानों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया था। जिसमें हैदराबाद के यह मुस्लिम नौजवान भी शामिल थे। यानी,जो गुनाह उन्होंने किया ही नहीं, वे इसकी सजा जेल में कई साल भुगतते रहे।

                किसी जांच एजंसी या पुलिस द्वारा बेकसूर नागरिकों को दहशतगर्दी के मामले में फंसाने से ज्यादा गंभीर अपराध कोई दूसरा नहीं हो सकता। क्योंकि, महज एक गिरफ्तारी पूरे समाज में उसकी छवि बदलकर रख देती है। यह गिरफ्तारी उसकी इज्जत, पैसा और पेशा गोया कि सब कुछ छीन लेती है। दहशतगर्दी के इल्जाम के चलते उसका पूरा परिवार समाज में जो कुछ सहता-भोगता है, वह अलग। अदालतों और मानवाधिकार संगठनों के तमाम आदेशों और नसीहतों के बाद भी मुल्क में अब तक कभी किसी सरकार ने अपनी यह जिम्मेदारी नहीं समझी, कि उसकी एजंसियों की गलती से जिन लोगों को शारीरिक, मानसिक यंत्रणाएं झेलनी पड़ीं, जेल में रहना पड़ा, माली नुक्सान हुआ, प्रति्ठा पर आंच आई उसकी क्षतिपूर्ति की जाए। उनसे माफी मांगी जाए, उनके साथ जो जुल्म हुआ उसका मुआवजा मिले। इंसाफ का तकाजा तो यह कहता है कि न सिर्फ इन नौजवानों को माफी व मुआवजा मिलना चाहिए, बल्कि जिन अधिकारियों की गलती की वजह से इन नागरिकों को समाज में बेवजह नुकसान उठाना पड़ा,उनकी जबावदेही तय की जाए। बेगुनाह लोगों को झूठे सबूतों की बिना पर फंसाने वालों को भी हर हाल में सजा मिलनी चाहिए। ताकि, आईंदा इस तरह की इंसानियत मुखालिफ कार्यवाही बार-बार अंजाम न लें।

               कुल मिलाकर, आंध्र प्रदेश की किरण रेड्डी सरकार ने गलत मामले में फंसाए बेकसूर लोगों से माफी मांगकर पूरे मुल्क में एक मिसाल कायम की है। जिसका कि सभी को खैरमकदम करना चाहिए। जो कदम आंध्र प्रदे सरकार ने स्वविवेक से उठाया है, वैसा हर जगह और ऐसे हर मामले में हो तब जाकर पीड़ितों को सही इंसाफ मिल सकेगा। अब देखना यह है कि बाकी राज्य सरकारें अपने यहां यह कदम कब उठाती हैं।

 
? जाहिद खान