संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

जयपुर, मालेगांव, मक्का मस्जिद बेगुनाहों को 'आतंकवादी' साबित करने की इन कोशिशों पर लगाम कब लगेगा?

? सुभाष गाताड़े

               राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, अपनी ताजपोशी की तीसरी सालगिरह के मौके पर अपनी एक पुरानी तकरीर को याद नहीं करना चाहेंगे। ढाई साल पहले दिल्ली में आन्तरिक सुरक्षा पर आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में जनाब गहलोत ने यह दावा किया था कि मई 13 2008 को जयपुर में हुए बम धमाके, जिसमें 69 लोग मारे गए थे, का मामला हल हो चुका है। उनके मुताबिक उसके लिए दिल्ली एवं राजस्थान के चन्द रैडिकल युवा तथा 'सिमी' अर्थात स्टुडेण्टस इस्लामिक मूवमेण्ट आफ इण्डिया, के चन्द सदस्य जिम्मेदार थे। जांच को ठीक अंजाम तक पहुंचाने के लिए उन्होंने राजस्थान की आतंकवाद विरोधी दस्ते को शाबाशी भी दी थी।

                पिछले दिनों एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने इस मामले में गिरतार 14 अभियुक्तों में से 11 को बाइज्जत बरी कर दिया और बताया कि इन अभियुक्तों का न 'सिमी' से कोई नाता रहा है और न ही वे विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी पैदा करने में मुब्तिला थे, आतंकी घटनाओं में शामिल होने की बात तो दूर रही।

               जयपुर में आयोजित एक प्रेस सम्मेलन में पिछले दिनों बाइज्जत रिहा इन लोगों में से कुछ - आज़म गजधर, सोहैल मोदी आदि ने - जब इस तीन साल के अन्तराल में उन्हें जिन यातनाओं को झेलना पड़ा, जिस तरह पुलिस, जेल के स्टाफ एवं वहां भरती खतरनाक अपराधियों के हाथों उन्हें यातनाएं झेलनी पड़ी, उनके परिवारों को लगभग सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा, इसका जब विवरण पेश किया तो शायद ही कोई अपनी आंखों को नम होने से बचा पाया।  उनकी पीड़ा इस बात से थी कि किस तरह राज्य में हुकूमत बदलने के बावजूद उनकी हालत में या उनके मामले में कोई फर्क नहीं पड़ा। जनाब अशोक गहलोत से माफी की मांग करते हुए उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि उन्हें नाहक फंसाने के लिए सुश्री वसुन्धरा राजे, तत्कालीन गृहमंत्री गुलाब चन्द कटारिया तथा उनके प्रिय पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए।

               याद रहे मई 2008 में जब जयपुर में उपरोक्त बम धमाका हुआ तब वहां वसुन्धरा राजे की अगुआईवाली भाजपा की सरकार कार्यरत थी, जिसके गृहमंत्री संघ के कार्यकर्ता रहे गुलाबचन्द कटारिया थे। यह बात सनद है कि इन बम धमाकों की आड़ में भाजपा की सरकार ने न केवल इन तमाम बेगुनाहों को अपने घरों से उठवाया था, जो अपने समुदाय में पढ़े लिखे एवं जागरूक के तौर पर जाने जाते थे, बल्कि सूबे में मौजूद बांगलाभाषी मुसलमानों के खिलाफ भी एक जबरदस्त मुहिम शुरू की ताकि इस समुदाय को अधिक दबाव में लाया जा सके। वह सिलसिला तभी रूका जब मानवाधिकार संगठनों एवं जनपक्षीय पार्टियों ने आवाज बुलन्द की।

               इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि जिन दिनों जयपुर धमाके में फर्जी आरोपों के तहत जेल में ठूंसे गए लोगों को रिहा किया गया, उन्हीं दिनों आंध्र प्रदेश सरकार ने यह तय किया कि वह मक्का मस्जिद बम धमाके में गलत ढंग से फंसाये गए अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को 75 लाख रूपए का मुआवजा देगी। मालूम हो कि 2007 में हिन्दुत्व आतंकियों द्वारा अंजाम दिए गए मक्का मस्जिद बम धामाके में अल्पसंख्यक समुदाय के 70 युवकों को जगह जगह से उठवाया गया था, उन्हें यातनाएं दी गयी थीं, बिना मुकदमा दर्ज किए गैरकानूनी हिरासत में रखा गया था, बाद में अदालत ने इन सभी को बाइज्जत रिहा करने का आदेश दिया था। आंध्र प्रदेश माइनॉरिटीज कमीशन जिसने इस मामले की जांच की थी, उसने इन गैरकानूनी बन्दियों के लिए पुलिस को काफी लताड़ा था। इन युवकों को मुआवजा देने की मांग लम्बे समय से उठी थी जिसे पिछले दिनों किरण कुमार रेड्डी सरकार ने पूरा किया था। इनमें से 20 युवक जिन्हें एक साल से अधिक वक्त तक जेल में गुजारना पड़ा था उन्हें प्रति व्यक्ति तीन लाख रूपए मिलेंगे और बाकियों को बीस हजार से 50 हजार तक की राशि मिलेगी।

               यह अलग बात है कि वे सभी युवा जिन्हें आज भी निरपराध साबित होने के बावजूद सामान्य जिन्दगी शुरूआत करने में मुश्किलें आ रही हैं और जिन पर आज भी 'आतंकी' का धब्बा समाज की निगाह में लगा है, वे मानते हैं कि जब तक हमारी जिन्दगी में जहर घोलनेवाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हमारे लिए वास्तविक मुआवजा होगी ताकि आइन्दा किसी बेगुनाह को हमारी तरह जिल्लत की जिन्दगी गुजारनी न पड़े। यूनानी डॉक्टर इब्राहिम अली जुनैद जिन्हें पांच माह जेल में बीताने पड़े थे, कहते हैं कि दोषी पुलिस अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलम्बित किया जाए और उन पर मुकदमा चले। जिन्दगी के टूटे तार नए सिरे से जोड़ने में लोगों के सामने कैसी मुश्किलें आ रही हैं इसे हम स्नातक डिग्री हासिल किए मसूद अहमद के उदाहरण से समझ सकते हैं। पहले वह हैद्राबाद के पॉश इलाके की एक कपड़े के स्टोर में मैनेजर के पद पर 15 हजार रूपए प्रति माह कमाता था और आज उसे डेढ हजार रूपए कमाना भी मुश्किल हो रहा है। कोई नौकरी देने के तैयार नहीं है इसलिए उसे आम्लेट-अण्डा बेचने की रेहड़ी लगानी पड़ी है।

               इन्हीं दिनों दिल्ली की एक अदालत ने मुजफरनगर के निवासी अब्दुर रहमान को पुलिसिया जांच की खामियों को उजागर करते हुए रिहा किया(29 नवम्बर 2011, इण्डियन एक्स्प्रेस) जिसे शहर में आतंकी हमलों को अंजाम देने की साजिश रचने के आरोप में जेल में वर्ष 2008 में डाला गया था। पुलिस का दावा था कि 21 मई 2008 को अब्दुर रहमान को पुलिस ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से तब गिरफ्तार किया जब उसके सूत्रों ने बताया कि वह शहर पहुंच रहा है। पुलिस की मुताबिक उसकी निशानदेही पर  उसने तीन किलो आरडीएक्स, विस्फोट एवं टाईमर्स भी बरामद किए थे। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश जनाब पवन कुमार जैन ने पुलिस की कहानी में कई झोल देखे। न केवल पुलिस ने उसे मिली गुप्त जानकारी का रेकार्ड नहीं रखा था, तथा वह यह भी साबित नहीं कर पायी कि विस्फोटक जब जमीन में गाड़े गए थे, उन दिनों अब्दुर रहमान दिल्ली में ही था।

               चाहे जयपुर की घटना हो, हैद्राबाद का किस्सा हो, मालेगांव के बम धमाके में 2006 में गिरफ्तार बेगुनाहों का किस्सा हो या मुजफरनगर के अब्दुर रहमान का मामला हो, क्या इन सभी घटनाओं को 'व्यक्तिगत हादसे' मान कर भूला जा सकता है या उस पैटर्न की तलाश की जा सकती है जो इन घटनाओं के जरिए उजागर होता है। इन निरपराधों का यह किस्सा इसी कड़वी हकीकत को उजागर करता है कि इस मुल्क की कानून अमल करनेवाली मशीनरी में दिक्कतें कहां कहां पर हैं और किस तरह राज्य की एजेंसियों ने अपना यह ढर्रा बना लिया है कि यातना देकर मामलों का हल करो। मामले की जटिलता इस वजह से बढ़ जाती है कि आतंकवाद से निपटने के नाम पर राज्य एजेंसियां साम्पद्रायिक ढंग से सोचती एवं काम करती हैं। क्या पुलिस अधिकारियों एवं जांच एजेंसियों को असीमित अधिकार देकर तथा उनसे पारदर्शिता, जवाबदेही की मांग न करते हुए साधारण नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की कभी रक्षा की जा सकती है ? निश्चित ही नहीं। अब वक्त आ गया है कि ऐसे कदम उठाने का ताकि पुलिस खानापूर्ती के लिए लोगों के साथ मनमानी न करे।

                गौरतलब है कि जयपुर बम धमाके में अदालती कार्रवाई में आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) द्वारा पेश किए गए 48 में से अधिकतर गवाहों ने अपने बयानों को वापस लेते हुए कहा कि किस तरह एटीएस के लोगों ने तथा पुलिस अधिकारियों ने उन पर दबाव डाला था तथा गवाह बनने के लिए मजबूर किया था। इसे संयोग कहा जा सकता है कि तीन साल बिना जमानत के जेल में पड़े इन लोगों से उन अधिकारियों की भी मुलाकात हुई थी जो दारा सिंह के फर्जी मुठभेड काण्ड में जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाये गए हैं। इन्स्पेक्टर जनरल आफ पुलिस एक पोचुस्वामी, जो उन दिनों राज्य के स्पेशल आपरेशन्स ग्रुप के प्रमुख थे, उन्हें इस साल की शुरूआत में गिरफ्तार किया गया था।

               कोटा के नजाकत कुरेशी जो रिहा होनेवालों में से एक हैं, बताते हैं कि जब उन्होंने पोचुस्वामी से पूछा कि 'अब सलाखों के पीछे कैसे लग रहा है, तब वह मौन रहे थे।

 
? सुभाष गाताड़े