संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

पिछड़ा वर्ग और बसपा की सोच

? सुनील अमर

                पिछले महीन बसपा ने राजधानी लखनऊ में दलित-पिछड़ा वर्ग सम्मेलन किया और भारी भीड़ इकट्ठी की। बसपा की रैलियों में भीड़ होती ही है। अगले सप्ताह वह क्षत्रिय और मुस्लिम रैली करने जा रही है। शुरुआत, बसपा ने ब्राह्मण रैली से की थी। प्रदेश में विधानसभा के चुनाव नजदीक हैं,और ऐसे अवसर पर प्रत्येक राजनीतिक दल ऐसी जातिगत रैलियॉ या रथ यात्रा सरीखे अन्य प्रदर्शन करता ही है, सो बसपा की रैलियॉ कोई अपवाद नहीं है, लेकिन यह जरुर देखा जाना चाहिए कि बसपा के इस जाति प्रेम की झलक क्या उसके संगठन और प्रशासनिक फैसलों में भी दिखती है या यह महज चुनावी स्टंट ही होता है। स्व. कांशीराम ने दो संस्थाओं की स्थापना की थी- बहुजन समाज पार्टी तथा इसकी मातृ संस्था बामसेफ यानी बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी-शेडयूल्ड एम्पलाइज फेडरेशन। दोनों के नामकरण व घोषित उद्देश्यों में पिछड़ा वर्ग शामिल था लेकिन यह वहीं तक सीमित रहा,हकीकत में बदल नहीं पाया। जागरुक पाठकों को याद होगा कि वर्ष 1993 उत्तर प्रदेश ही नहीं देश के इतिहास में भी ऐसा परिवर्तनकारी वर्ष था जिसमें पहली बार न सिर्फ दो बहुसंख्यक जातियों-दलित और पिछड़ा का गठबन्धन हुआ बल्कि इस गठबन्धन ने जमी जमायी कॉग्रेस तथा सवर्णवादी भाजपा को भी सत्ता से बाहर कर दिया। मुलायम सिंह यादव और कांशीराम की जोड़ी ने सत्ता परिवर्तन की कथा लिख दी और तमाम राजनीतिक प्रेक्षक हैरान रह गये थे। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे लेकिन मायावती की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाऐं इतनी जबर्दस्त थीं कि यह गठबन्धन चल नहीं पाया और स्टेट गेस्ट हाउस कांड जैसी कई अप्रिय घटनाओं के साथ टूट गया। इसके ऐन बाद मायावती के ही शब्दों में 'मनुवादी भाजपा' के साथ बसपा ने जोड़ी बनाकर सत्ता सुख हासिल तो कर लिया लेकिन वहीं से दलित-पिछड़ा के उस सशक्त अध्याय को बंद भी कर दिया जो अगर चलता तो देश की राजनीतिक तस्वीर ही बदल सकती थी।

                 मायावती जब भाजपा के सहयोग से पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तो उसके पहले तक उनके परम् विश्वस्तों में राम लखन वर्मा और जंगबहादुर पटेल ही थे। पिछड़ी जाति के इन दोनों नेताओं मे से तब जंगबहादुर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष व रामलखन विधानसभा में बसपा विधायक दल के नेता थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने ऐसी परिस्थितियॉ पैदा कर दीं कि इन दोनों का बसपा में रहना मुश्किल हो गया। सभी जानते हैं कि बाद के दिनों में कांशीराम मायावती का विरोध नहीं कर पाते थे। सत्ता प्राप्ति की मायावती की अदम्य ललक ने उनसे बार-बार उस भाजपा से गठजोड़ कराया जिसे वे हमेशा बुरा-भला कहती आयी थीं लेकिन  उन मुलायम सिंह को वे आज तक माफ नहीं कर पाईं जिनकी पार्टी सपा से उनका गठजोड़ न सिर्फ बसपा के घोषित उद्देश्यों का स्वाभाविक पोषक होता बल्कि जो भारतीय राजनीति के इतिहास में क्रांति का सूत्रधार बन सकता था। यह जरुर हो सकता था कि मुख्यमंत्री बनने की माया-मुलायम की लालसायें आपस में टकरातीं लेकिन वह तो (मायावती के) भाजपा के साथ रहने पर भी हुआ ही।

               बसपा का बाद का कार्यकाल भी पिछड़ों के लिए अछूता ही रहा। बसपा प्रमुख चौथी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने के बावजूद यह साफ-साफ बता नहीं सकतीं कि उन्होंने पिछड़ों के लिए अब तक क्या किया। शायद यही वजह रही होगी कि गत माह लखनऊ में आयोजित बसपा की दलित-पिछड़ा रैली में अपने सवा घंटे के भाषण में मायावती ने एक घंटे से अधिक का समय सिर्फ कॉग्रेस को कोसने में लगाया। रैली में दलितों के बारे में कुछ न बोलना तो समझ में आता है कि वे बसपा के स्वाभाविक वोट बैंक हैं लेकिन पिछड़ों को तो मुख्यमंत्री मायावती ने विशेषरुप से रैली में बुलाया था। असल में बसपा प्रमुख अपनी इस थ्योरी से अभी तक मुक्त नहीं हो पायी हैं कि पिछड़ों की दो प्रमुख जातियों-यादव और कुर्मी में से यादव सपा के साथ तो कुर्मी भाजपा के साथ है। बसपा अपने संरचनात्मक सिध्दान्तों को जहाँ से ग्रहण करती है, उन डॉ. भीमराव आम्बेडकर के मन, वचन और कर्म में भी पिछड़ों के प्रति कोई कल्याणकारी भावना थी ही नहीं। वे संविधान की प्रारुप निर्मात्री सभा के सदस्य थे और इस नाते उन्होंने संविधान लागू होने के समय से ही अनुच्छेद 335 के तहत दलितों को आरक्षण दिला दिया किन्तु पिछड़ों को उन्होंने अनुच्छेद 340 के भरोसे लावारिस छोड़ दिया। आम्बेडकर चाहते तो उसी वक्त पिछड़ों का भी कल्याण हो सकता था। वो तो संविधान लागू होने के 40 साल बाद स्व. वी. पी. सिंह ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया जिससे पिछड़ों को आरक्षण का लाभ मिला। इस वी.पी. मंडल आयोग का गठन जनता पार्टी की सरकार में 1979 में किया गया था। इसी आयोग ने देश की कुल आबादी में पिछड़ों को 52 प्रतिशत बताया था।

                 बसपा प्रमुख जब पिछड़ों की रहनुमाई की बातें करती हैं तो वे झूठ बोलकर उन्हें बरगलाती हैं। आबादी के लिहाज से दलितों से दोगुनी आबादी वाले पिछड़ों को दलितों जितना भी आरक्षण अभी तक नहीं मिल पाया है। आम्बेडकर तो साफ-साफ कहते थे कि मैं सिर्फ दलित जातियों के हितों की रक्षा के बारे में सोचता व करता हॅू। दलितों को आरक्षित करने का पहला प्रयास प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु जी ने किया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत 1953में काका कालेलकर आयोग गठित किया जिसने पिछड़ों को आरक्षण देने की संस्तुति की लेकिन इस आयोग की संस्तुतियॉ लागू नहीं की गईं।

               बसपा उत्तर प्रदेश में चौथी बार सत्तारुढ़ हुई है और पहली बार बिना बैसाखी के है। इस बार पूरे हनक के साथ यह अपना कार्यकाल भी पूरा कर रही है। प्रदेश के विपक्षी दलों से लेकर केन्द्र की काँग्रेसनीत संप्रग सरकार से भी इसे जरा भी खतरा या धमकी तक कभी नहीं मिली। अपनी रीतियों-नीतियों को यह सरकार बहुत बार गैर-लोकतांत्रिक तरीके से भी पूरी कर रही है फिर भी पिछड़ों के लिए कुछ नहीं किया। एक स्वामी प्रसाद मौर्य को अगर छोड़ दिया जाय तो मुख्यमंत्री मायावती के आभामंडल में पिछड़ों के नाम पर और कौन है? यह कितने हैरत की बात है कि बसपा प्रमुख ब्राह्मणों-क्षत्रियों को तो अपना वोटबैंक मान सकती हैं लेकिन अपने स्वाभाविक मित्र पिछड़ों को कत्तई नहीं। अनुमान लगाइये कि अगर पिछड़े और दलित एकजुट हो जॉय तो देश की राजनीतिक तस्वीर कैसी होगी? और अगर ऐसा नहीं होने पा रहा है तो क्या यह नहीं लगता कि अंततोगत्वा मायावती भी सवर्ण हिताें को ही संरक्षित कर रही हैं? मुख्यमंत्री मायावती के आभामंडल को देखिए उसमें सवर्ण (और विशेषकर ब्राह्मण) ही दिखाई पड़ेंगें। यही लोग उनके नीति निर्धारक भी हैं। ऐसे में बसपा प्रमुख चाहे पिछड़ों के प्रति चुनावी प्रेम दिखाऐं या मुसलमानों के प्रति, सत्ता में आने के बाद वे फिर वही सब करेंगीं जो बीते साढ़े चार वर्षों में उन्होंने कर दिखाया है। किसी भी रैली में जाने या चुनावी घोषणा के झांसे में आने से पहले पिछड़ों को यह विचार जरुर कर लेना चाहिए। मुसलमानों को तो विशेषरुप से क्योंकि आज भी भाजपा ही बसपा की स्वाभाविक सहयोगी पार्टी है जो नये सिरे से अयोध्या मुद्दे को गर्म करने की घोषणा इन दिनों लगातार कर रही है।

? सुनील अमर