संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

सरकार ने डाले : न्यायाधीशों की ज़बान पर ताले

? डॉ. गीता गुप्त

               पिछले दो-तीन वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की टिप्पणियों से सरकार कई बार आहुत हुई है। आहत सरकार ने अन्तत: ज्यूडिशियल (स्टैण्डर्ड एण्ड अकाउण्टबिलिटी) बिल 2010 में एक महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़कर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर लगाम लगाने की तैयारी कर ही ली है। संसदीय समिति ने 30अगस्त को न्यायाधीशों के विरुध्द ओछी शिकायतों के मुद्दे पर अपनी रपट प्रस्तुत करते हुए सिफ़ारिश की थी कि उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालयों के कार्यरत न्यायाधीश जटिल मुद्दों, राजनीतिक मसलों, लम्बित मामलों और न्यायालयों में किसी संवैधानिक संस्था या कार्यालय के विषय में सरेआम या जनता के बीच अपनी राय व्यक्त न करें। ऐसे कृत्य को क़ानून का उल्लंघन माना जाए।

               संसदीय समिति ने अनुशंसा की थी कि विधेयक की धारा 3 की उपधारा 2(एफ) का विस्तार कर उसमें स्पष्ट उल्लेख किया जाए कि जजों को खुली अदालत में मामलों की सुनवाई करते समय अनावश्यक टिप्पणी करने से बचना चाहिए। वस्तुत:उपधारा को विस्तार के बाद इस तरह पढ़ा जाए कि कोई भी न्यायाधीश राजनीतिक मसलों और न्यायालय में लम्बित प्रकरणों पर सार्वजनिक बहस में शामिल नहीं होगा और न ही खुले में अपनी राय व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होगा। साथ ही सुनवाई के दौरान न्यायालय में संवैधानिक संस्थाओं,विभागों और व्यक्तियों पर न्यायाधीशों की अवांछित टिप्पणियों पर भी अंकुश लगाएगा। ऐसा न करना कानून का उल्लंघन माना जाएगा जिसके लिए बेशक 5 वर्ष तक की प्रस्तावित कैद और पांच लाख के अर्थदण्ड को घटाकर तीन साल की सख्त कैद और एक लाख जुर्माने का प्रावधान किया जा सकता है।

                 बहरहाल 13 दिसम्बर 2011 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में न्यायिक मानक एवं जवाबदेही बिल को मंजूरी दे दी गई। संसद में इस विधोयक के स्वीकृत होते ही न्यायाधीशों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विराम लग जाएगा। इससे निश्चय ही सरकार को राहत मिलेगी। अब तक न्यायाधीशों की टिप्पणी से कई बार सरकार की किरकिरी हो चुकी है। जैसे-राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार की याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस ए.के. गांगुली और जी.एस. संघवी की पीठ ने कहा था कि 'देश में बहुत भ्रष्टाचार है और हम अपनी आंखे मूंदकर नहीं बैठ सकते।' सरकारी गोदामों में सड़ रहे अनाज के मामले पर संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था-'अनाज ख़राब हो, इससे बेहतर है कि सरकार इसे ग़रीबों में मुफ्त बांट दे।' सरकार ने जब कई दिनों तक कोई कार्रवाई नहीं की, उल्टे कृष्टि मंत्री ने कहा कि 'वह कोर्ट की सलाह थी, आदेश नहीं, जिसे मानने के लिए सरकार बाध्य हो।' इस पर जस्टिस दलवीर भण्डारी और दीपक वर्मा की पीठ ने तीख़े लहज़े में जतलाया कि 'वह सलाह नहीं, आदेश था।'

                 इसी तरह 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था कि 'ए.राजा अब तक मंत्री पद पर क्यों है ?' गुजरात दंगों के मामले में भी वरिष्ठ जांच अधिकारियों शिवानंद झा और गीता जौहरी को हटाने के अदालती फ़ैसले पर पुनर्विचार के अनुरोध को ठुकराकर उच्चतम न्यायालय की पीठ ने अपना आक्रोश व्यक्त किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक रेलवे डॉक्टर की सेवाएं समाप्त करने पर सरकार को फटकारते हुए कहा था कि 'यह कार्रवाई कोर्ट मार्शल जैसी है, जहां सामने वाले को नोटिस दिए बिना कोई कार्रवाई कर दी जाती है। '

                  भले ही न्यायाधीशों की टिप्पणियों से यह देश जागा हो परन्तु अब वे जनता के बीच कोई टिप्पणी नहीं कर पाएंगे। उनके विरूध्द भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से संबंध्द नेशनल ओवरसाइट कमेटी एवं कम्पलेण्ट स्क्रूटनी पैनल में सांसदों को शामिल करने का सुझाव बेशक सरकार ने अमान्य कर दिया है परंतु ऐसी जांच कैमरे के सामने की जाएगी और जांच का ढांचा तीन स्तरीय होगा। पांच सदस्यीय ओवरसाइट कमेटी में कोई भी व्यक्ति किसी न्यायाधीश के विरूध्द शिकायत कर सकता है। जजों पर होने वाली कार्रवाई गोपनीय होगी। दोषी जजों को कमेटी चेतावनी भी दे सकती है अथवा राष्ट्रपति से उन्हें हटाने की सिफ़ारिश कर सकती है। जजों को परिजनों सहित अपनी सम्पत्ति की जानकारी वेबसाइट पर उजागर करनी होगी। उनके व्यवहार पर भी नज़र रखी जाएगी। उनकी नियुक्ति-प्रक्रिया में भी सरकारी हस्तक्षेप बढ़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में 305 से अधिक न्यायाधीशों के विरूध्द विभागीय जांच चल रही है।

                 निस्संदेह, न्यायाधीशों का लक्ष्य सरकार को देशहित में क़दम उठाने हेतु प्रेरित करना ही रहा होगा। लेकिन सरकार को यह नहीं भाया। अब तक ऐसे विधेयक को मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दे दी है, जो न्यायाधीशों की ज़बान पर ताले जड़ देगी। चूंकि सरकार के पास बहुमत है इसलिए इस विधेयक को संसद की स्वीकृति मिलने में कोई कठिनाई नहीं होगी। राजनेताओं के कड़वे-तीखे बोल और असंयमित आचरण पर लगाम लगाने अथवा उनपर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की मंशा सरकार ने कभी व्यक्त नहीं की। परन्तु न्याय की कुर्सी पर बैठने वालों की न्यायसंगत टिप्पणियों ने उसे इतना उद्वेलित कर दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को लोकतंत्र के लिए चुनौती मानकर उसे बाधित करने के विधिसम्मत उपाय ढूंढ लिए गए। अब देखना है कि न्यायाधीशों की जमात सरकार के इस क़दम पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करती है ?

                
? डॉ. गीता गुप्त