संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

सिंगरौली : कोयले की खदानों में टीबी का दर्द

? दयाशंकर मिश्र

                धूल और धुएं का टीबी से सीधा संबंध है, वहीं यदि बात कोयले की खदान वाले इलाके की हो तो बात और भी गंभीर हो जाती है। क्योंकि कोयले की खान में काम करने वाले और उस क्षेत्र में निवास करने वाले लोग प्रतिदिन बडी मात्रा में कोयले की धूल और धुएं के शिकार होते हैं। वे जहां खदान में काम करते हुए बड़ी मात्रा में कोयले की धूल श्वांस के साथ फेफड़ों के अंदर लेते हैं।

                 सिंगरौली में कोयले की खदानों में काम करने वाले लोगों और उस क्षेत्र के निवासी के लिए कोयले का दर्द वैसे तो नया नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे यह अस्थमा, टीबी और कैंसर में बदलता जा रहा है, जो सबसे यादा चिंता का कारण है।

                  सिंगरौली के एनसीएल, जयंत जैसे पॉवर प्लांट में बड़ी संख्या में लगे मजदूरों, कर्मचारियों का जीवन हमेशा खतरे में रहता है। लगातार कोयले, धुएं और धूल से घिरे रहने के कारण और नाममात्र के मॉस्क और सुरक्षा सामग्री के काम करने के कारण सेहत पर हमेशा संकट रहता है,वहीं दूसरी ओर मानसिक स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

                सिंगरौली यानी काले हीरे का गढ़। रिलायंस, बिड़ला और डीबी पॉवर समेत यहां 15 से अधिक कंपनियां कोयले के खनन और बिजली निर्माण में सक्रिय हैं। खदानों के कारण यहां पर बड़ी संख्या में पेड़ काटे गए हैं। सामाजिक वानिकी के तहत एक काटे गए पेड के बदले यहां पांच पेड़ लगाने का नियम है, जो केवल कागजों पर ही दिखता है।

                   यही वजह है कि यहां काम करने वाले कर्मचारी, अधिकारी से लेकर स्थानीय नागरिक तक कोयले की धूल के गुबार में डूबे रहते हैं।

                 सिंगरौली में कंपनियों की मनमानी के चलते स्वच्छ हवा किसी सपने जैसी बात है। इसका परिणाम यह होता है कि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है और वे टीबी की गिरफ्त में आ जाते हैं। वहां बड़ी संख्या में लोग टीबी से पीड़ित हो रहे हैं। कंपनियों की ओर धूल से बचने के लिए उपलब्ध करवाए जाने वाले मास्क या तो उन्हें मिल नहीं रहे या जिन्हें मिले भी हैं वे इतनी अच्छी क्वालिटी के नहीं हैं कि वे धूल के गुबार को रोक पाएं।

                   यहां बड़ी संख्या में मजदूरों को श्वांस लेने में परेशानी, खांसी, अस्थमा की शिकायत है। लगातार धूल और धुएं के संपर्क में रहने से व्यक्ति के फेफड़े जर्जर होने लगते हैं और प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है, जो टीबी के बैक्टीरिया को सक्रिय होने का मौका दे देती है, क्योंकि टीबी का बैक्टीरिया हर व्यक्ति के नॉर्मल फ्लोरा में मौजूद रहता है और जैसे ही उसके अनुकूल माहौल मिलता है, वह वृध्दि करना शुरू कर देता है।

                 यही कारण है कि काले हीरे की नगरी में अब टीबी का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। खनिज नीति के लिए लगातार अपनी पीढ़ थपथपाने वाली सरकार को लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

                 हर पल घुटता है दम

                  सिंगरौली भ्रमण के दौरान मैंने पाया कि वहां की सड़कों से गुजरना ही बहुत मुश्किल भरा काम है, क्योंकि सड़कों पर उठने वाली कोयले की धूल के बीच दम घुटने लगता है। ऐसे में वहां के रहवासी कैसे घुट-घुटकर जीते होंगे इसकी कल्पना की सकती है। लोगों का कहना है कि उनमें से कई को टीबी की शिकायत है। मनोज ने बताया कि उसके पिताजी खदान श्रमिक हैं। उन्हें लंबे समय अस्थमा की बीमारी थी। धीरे-धीरे उनका वजन कम होने लगा, भूख कम हो गई, खांसी इतनी बढ़ गई कि बलगम से खून आने लगा। लंबे समय तक इलाज कराया, लेकिन फायदा नहीं हुआ। तब डॉक्टर ने टीबी की जांच कराई, जिसमें उन्हें टीबी होने की पुष्टि हुई। डॉक्टर ने कहा है कि उन्हें कोयले की धूल से बचाना होगा और सफाई पर ध्यान देना होगा तो ही जल्दी रिकवरी हो पाएगी। अब वे टीबी का इलाज ले रहे हैं, लेकिन मजबूरी यह है कि जब तक वे इस क्षेत्र में रहेंगे उनका पीछा कोयले की जहरीली धूल से नहीं छूटेगा। ऐसे में टीबी से निजात मिलना मुश्किल है। इससे आर्थिक समस्या भी खड़ी हो गई है, क्योंकि उनका खदान जाना संभव नहीं है।

                 तंबाकू भी है कारण

                 सिंगरौली में कोयले की धूल से परेशान लोग डिप्रेशन के शिकार भी हो रहे हैं, जिससे वे तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट का उपयोग भी बड़ी मात्रा में कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि उनके फेफड़ों को कोयले की धूल के साथ सिगरेट, बीड़ी के धुएं से भी जूझना पड़ रहा है। वहीं मुंह तंबाकू सेवन से छलनी हो रहा है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि लोग टीबी के साथ-साथ फेफड़े और मुंह के कैंसर के शिकार भी हो रहे हैं। रामस्नेही ने बताया कि उनके पिता कोयला मजदूर हैं, उनको एक साल पहले टीबी हुआ था, लेकिन इस पर दवाओं का कोई खास असर नहीं हो रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही जांच में यह सामने आया है कि उन्हें फेफड़े का कैंसर भी हो गया है। अब उनके लिए न केवल इलाज की बल्कि परिवार पालने की समस्या भी उत्पन्न हो गई है। उनके लिए कोयले का दिया यह दर्द जीवन पर भारी पड़ रहा है।

                   सामाजिक कार्यकर्ता एडी जैकब बताते हैं कि कंपनियों के प्रभाव के कारण पर्यावरण के मानकों के सरेआम उल्लंखन के बाद भी कोई कुछ कहने को तैयार नहीं है। यहां कमा कर रहे एक संगठन की रिपोर्ट के अनुसार खदानों में उत्खनन मशीनों के साथ काम रहे कर्मियों, कोयले की आवाजाही में लगे ड्राइवरों में से हर पांचवां व्यक्ति किसी न किसी तरह की श्वांस संबंधी बीमारी से परेशान है। कंपनियों में संबंधित अधिकारी कहते हैं कि सुरक्षा उपाय किए जाते हैं,लेकिन कर्मचारियों के पास ढंग के मॉस्क तक नहीं हैं।

                
? दयाशंकर मिश्र