संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

डरबन में भारत की चहुॅओर जीत

? डॉ. सुनील शर्मा

                जलवायु परिवर्तन की समस्या को लेकर डरबन में आयोजित सम्मेलन की समाप्ति के बाद हम गर्व महसूस कर सकते है क्योंकि दुनिया ने हमारे  प्रतिनिधि मंडल की बात स्वीकार  कार्बन की गर्मी से तपती धरती को राहत दिलाने के लिए आगे कदम बढ़ाया है। हम सभी जानते है कि कार्बन उत्सर्जन विकास की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है लेकिन इसके कारण बढ़ते वैश्विक ताप और जलवायु में आ रहे परिवर्तन से जल में समाने तैयार धरती का अस्तित्व ही खतरें में हैं। इसके बाद भी कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार विकसित राष्ट्र इसमें कटौती की बात स्वीकार करने की बजाए विकासशील देशों पर ही इसका आरोप मढ़ते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि इससे पहले 1997 में जापान के क्योटो शहर में जलवायु परिवर्तन पर हुए सम्मेलन में भी विकसित देशों को प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार मानते हुए उन पर निश्चित मात्रा में कार्बन उत्सर्जन घटाने की बंदिश लगाई थी, धनी देशों ने इस पर अमल करने का वायदा भी किया था मगर इसका पालन करने की बजाए विकासशील देशों पर ही इसकी जिम्मेदारी तय करने की जुगत में भिड़ गए।यही बात वो डरबन में भी मनवाना चाहते थे और क्योटो करार से मुक्ति की राह देख रहे थे।लेकिन हमारी पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन और उनके सहयोगियों द्वारा रखे अकाटय तर्कों के चलते विकसित देशों की लॉंबिंग काम नहीं आई और उन्हें हमारी बात को मजबूरन स्वीकार करना ही पड़ा जिससे क्योटो प्रोटोकाल को दूसरा जीवन मिल गया।

               उल्लेखनीय है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर क्योटो प्राटोकाल ही एकमात्र कानूनी संधि है और डरबन में क्योटो प्रोटोकाल पर हुए समझौते के अनूसार कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मामले में सभी देश एक ही कानूनी व्यवस्था में आ जाएॅगें। उल्लेखनीय है कि मुद्दे को मंजिल तक पहुॅचाने में पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन के विकसित देशों के किसी भी दबाव से झुकने से इंकार और कड़ा बयान कि-भारत के धमकियों से नहीं डराया जा सकता है काफी महत्तवपूर्ण रहा है। भारत क्योटो प्राटोकाल के विस्तार के साथ ग्रीन क्लाइमेट कोष पर भी सकारात्मक कार्रवाई की मॉग कर रहा था जो कि भारतीय पक्ष की दमदारी के चलते स्वीकृत किया गया और यह फण्ड 2012 तक अस्तित्व में आएगा। 

                 चूॅकि डरबन समझौते ने भारत को प्रतिष्ठा दिलवाई है इससे हमारे देश को कूटनीतिक तथा आर्थिक दोनों मुद्दों पर फायदा होगा। अब क्योटो प्रोटोकाल का विस्तार तय है,जिससे क्लीन डेवलपमेंट मैकैनिज्म (सीडीएम) का भी विस्तार होगा क्योंकि क्योटोप्रोटोकाल के तहत कार्बन क्रेडिट के व्यापार को अनुमति दी गई है।और इस विस्तार से उन कम्पनियों को विशेष फायदा होगा जिन्होनें पर्यावरण हितैषी परियोजनाएॅ स्थापित की हैं।क्योंकि सीडीएम के तहत ही कोई कम्पनी कार्बन क्रेडिट की खरीद और बिक्री कर सकती है। इस व्यापार में जहॉ तक हमारे देश की बात है तो नवंबर 2011 तक हमारे देश में सीडीएम अनुमोदित 2,123 परियोजनाएॅ थी जिनमें से 738 परियोजनाएॅ यूनाइटेड फ्रेमवर्क कन्वेंशन आन क्लाइमेट चेंज के साथ पंजीकृत है।सीडीएम के तहत कार्बन क्रेडिट का कारोगार करने वाली उत्सर्जन इकाइयों को क्योटो प्राटोकाल के तहत क्लीन डेवलपमेंट मैकैनिज्म एक्जिक्यूटिव बोर्ड सीईआर(कार्बन उत्सर्जन कटौती प्रमाणपत्र) जारी करता है,जिसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इंटरकांटिनेंटल एक्सचेंज (आईसीई) में कीमतें तय होती हैं।भारत के पास वर्तमान में 20 फीसदी सीईआर है जो कि चीन के बाद दूसरा है।हालॉकि कार्बन ट्रेडिंग के व्यापार में इंटरकांटिनेंटल एक्सचेंज में कल सीईआर प्रमाणपत्र की कीमतें गिरी हैं क्योंकि अभी भी वर्ष 2012 के बाद क्योटो प्रोटोकाल को लेकर कुछ अनिश्चितताएॅ हैं जिससे इसकी कीमतें प्रभावित हुई है।यूरोपीय बाजार में संकट भी इसके दामों में गिरावट का कारण है।हालॉकि यूरोपाय संकट के हल और वर्ष 2012 के बाद क्योटो प्रोटोकाल की मजबूती के बाद इसकी कीमतें बढ़नी तय हैं जिसका फायदा भारतीय कंपनियों को मिलेगा।

               ग्रीन क्लाइमेट कोष की स्थापना के बाद जरूरतमंद देशों को उत्सर्जन में कमी के बदले भुगतान का प्रावधान है जिसका फायदा विकासशील देशों को होगा।इसके साथ ही क्लीन डेवलपमेंट तकनीक हस्तांतरण के प्रावधान को 2012 से पूरी तरह लागू करने के प्रावधान से भी विकसित देशों को फायदा होगा क्योंकि अब विकसित इन देशों को सस्ती और पर्यावरण हितैषीतकनीक देने के लिए बाध्य होगें। कुल मिलाकर डरबन समझौते दुनिया के लिए एक महत्तवपूर्ण उपलब्धि है जिसमें भारतीय पक्ष की दमदारी के चलतेसारी दुनिया को कार्बन उत्सर्जन के मामले में समान जिम्मेदारी स्वीकार  करना पड़ी। जिससे सारी दुनिया जलवायु परिवर्तन का संकट कम होने की उम्मीद कर सकती है।

                
? डॉ. सुनील शर्मा