संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

महिला कर्मचारियों की एक अहम जीत

? अंजलि सिन्हा

               उड़ान के दौरान महिला क्रू मेम्बर के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ दशकों से जारी संघर्ष में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। महिलाओं के एक छोटेसे समूह ने हासिल की यह छोटीसी जीत जो सुपरवाइजर पद से सम्बधित है, महिलाओं के विभिन्न स्तरों पर जारी भेदभाव के खिलाफ एक अहम जीत है। ज्ञात हो कि एअर इण्डिया के विमान के अन्दर काम करनेवाले महिलाओं ने अपने लिए बराबर के ओहदे की मांग की थी। यहां उडान के दौरान काम करनेवाली महिलाओं को सुपरवाइजर का पोस्ट नहीं मिलता था। सुपरवाइजर सिर्फ पुरुष ही हो सकता था जबकि सारी जिम्मेदारियां वे बराबर की निभाती थी। वरिष्ठ महिला कर्मचारी भी जिन पुरुष कर्मचारियों को प्रशिक्षण देती थी वे उनके सुपरवाइजर बन सकते थे किन्तु महिला होने के नाते उन्हें यह कार्यभार नही सौंपा जा सकता था।

                सुप्रीम कोर्ट ने बीते 17 नवम्बर को अपने एक फैसले में कहा कि इस भेदभाव का कोई आधार नहीं है तथा महिलाएं इस ओहदे की हकदार हैं। इस प्रतिरोध में विंशेष बात यह देखने वाली है कि आम तौर पर लड़ाई मैनेजमेण्ट से लड़नी पड़ती है लेकिन यहां मैनेजमेण्ट यानि एअर इण्डिया ने 2005में अपनी नीति में बदलाव करते हुए सुपरवाइजर का दर्जा सिर्फ पुरूषों तक सीमित रखने के अपने मध्ययुगीन किस्म के नियम को समाप्त कर इस पद पर महिलाओं की नियुक्ति को भी सुगम बनाया था। प्रबन्धन के इस निर्णय को पुरुष सुपरवाइजरों ने चुनौती दी थी। कोर्ट में अपील दायर की गयी थी कि वे महिला सुपरवाइजरों के मातहत काम नहीं कर सकते हैं।

               वर्ष 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एअर इण्डिया के इस फैसले को सही ठहराया था तब अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट गए थे। एअर इण्डिया में न सिर्फ इस स्तर पर बल्कि विभिन्न स्तरों पर महिला कर्मचारियों को जेण्डर भेदभाव का सामना करना पड़ता है तथा इसके खिलाफ संघर्ष भी चलते रहे हैं। जैसे कि रिटायरमेण्ट की उम्र महिला, पुरुष के अलग-अलग होती है। यदि महिला कर्मचारी अपनी नियुक्ति के चार साल बाद के भीतर गर्भवती हो गयी तो उसे नौकरी छोड़नी पड़ती थी या उसका वजन मानक से अधिक नहीं होना चाहिए जैसी शर्त थी। ध्यान रहे कि मानक वजन से अधिक वजन की स्त्रियों को तत्काल प्रभाव से विमान की सेवा से हटा कर एयरपोर्ट की अन्य जमीनी सेवाओं में तैनात किया जाता था। इन सारे भेदभावों का आधार कहीं भी यह नही था कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाने में कमतर या अक्षम थी बल्कि वजह उसका औरत होना था।

               अगर हम दूसरे क्षेत्र के कामकाजी महिलाओं के संघर्षों के तरफ ध्यान दें तो वहां भी यहीं साधारण सी मांग है कि कार्यस्थलों पर उन्हें बराबर का अवसर और जिम्मेदारियां सौंपी जाय। सिर्फ औरत होने के नाते योग्यता और क्षमता पर प्रश्न खड़ा करने का तुक क्या है ? आखिर सेना में स्थायी कमिशन मांग यही तो रही है कि उनकी नौकरी के दस साल पूरे होने पर उन्हें अनिवार्यत:रिटायर कर दिया जाता था जबकि पुरुषों को नौकरी में बने रहने का विकल्प था। कानूनन कोर्ट ने महिलाओं को यह अवसर देने के पक्ष में फैसला सुनाया है किन्तु अभी यह फैसला फौज के सिर्फ उसी विभाग पर लागू है जिसके महिला कर्मचारियों ने कोर्ट में चुनौती दी थी। फौज में अभी विभिन्न स्तरों पर गैरबराबरी कायम है। समझनेवाली बात है कि महिलाएं आखिर कौन सी बड़ी सत्ता की या सुपरकर्मचारी बन जाने की मांग कर रही हैं। वे यही तो माँग रही हैं कि उन्हें सिर्फ औरत होने के नाते बराबरी से वंचित न किया जाय। कभी कहा जाता है कि औरत है इसलिए रात में काम न करो तो कभी अघोषित रूप से नियुक्ति या पदोन्नति के रास्ते बन्द किए जाते है। 

               इतने बन्धानों या अवरोधों वाले समाज में जब तुलनात्मक रूप से छोटे हिस्से की लड़ाई में कानूनी जीत हो या मैनेजमेण्ट या सरकार मांग मान ले या एअर इण्डिया जैसे खुद ही नीति बनाकर कम से कम कुछ गैरबराबरियों को ही समाप्त किया जाय तो वह शेष कामकाजी महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर भी बराबरी मांग करने का हौसला भी देता है। अभी तो पता नहीं कितने स्तरों ,मोर्चों और क्षेत्रों में गैरबराबरी कितने रूपों में कायम रखी गयी है इसका पूरे समाज को पता भी नहीं है। जबजब कोई विरोध करता है या मुकद्दमा कोर्ट कचहरी में जाता है तब कई बातों का पता भी लगता है।

               जैसे कानून पढ़ने या कानूनी पेशा में रहनेवालों को छोड़ दे तो कहां किसे पता था कि कानून की भाषा में महिलाओं के लिए 'रखैल' शब्द अभी भी इस्तेमाल होता है। यदि वकील तथा सॉलिसिटर जनरल यह मुद्दा नहीं उठाती तो हम इस आधार पर भाषागत भेदभाव से अवगत भी नहीं होते।

                बराबर काम का बराबर वेतन औरत का हक है और इसे लागू नहीं करना किसी भी सरकार या निजी कम्पनी या कोई भी नौकरी पेशा हो तो नियोक्ता की तरफ से इसे अपराध माना जाना चाहिए। यद्यपि श्रम कानून के अन्तर्गत बराबरी का नियम होता है लेकिन हर जगह जेण्डर भेद के लिए रास्ते निकाल लिए जाते हैं। दर असल ऐसे हालात तैयार करना भी सरकार और नियोक्ता की जिम्मेवारी बनती है जिसमें महिलायें बराबर का काम कर भी सके और उन्हें बराबर की सारी सुविधाएं मिले। ज्ञात हो की हमारे संविधान का अनुच्छेद 15 यह व्यवस्था देता है कि भारत का हर एक नागरिक लैंगिक तथा जातीय भेदभाव से मुक्त जीवन का अधिकारी है। अर्थात् ऐसे भेदभाव करना कानूनी अपराध माना जायेगा। लेकिन यहां की महिलाएं नागरिक होते हुए भी आसानी से और धडल्ले से आर्थिक शोषण की शिकार होती आयी हैं। असंगठित क्षेत्र में यह भेदभाव अधिक देखने को मिलता है। आज भी कुशल श्रमिक के रूप में महिलाएं कुल श्रमशक्ति में बराबर का हिस्सेदार नहीं बन पायी है। श्रम मन्त्रालय की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक सन 2001 की जनगणना के अनुसार महिला श्रमिकों की संख्या 12 करोड़ 72 लाख है जो उनकी कुल संख्या 49 करोड़ 60 लाख का चौथा ( 25.60 प्रतिशत) हिस्सा ही हुआ। इनमें भी अधिकांशत: ग्रामीण क्षेत्र में है और उनका प्रतिशत ऊपर दी हुई कुल महिला श्रमिकों की संख्या का तीन हिस्से से भी ज्यादा (87प्रतिशत) कृषिसम्बन्धी  रोजगार में हैं। रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्र के रोजगार में तीन हिस्से भी ज्यादा(80 प्रतिशत) महिला श्रमिक घरेलू उद्योग , लघु व्यवसाय सेवा तथा भवननिर्माण में लगी हैं। कहा गया है कि सरकार ने महिला श्रमिकों के काम की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा उनकी स्थिति बेहतर बनाने के लिये कई कानून बनाये है लेकिन व्यवहार में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। देश में महाराष्ट्र, आन्धा्रप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश को छोड़कर, जहाँ क्रमश: महिला श्रमिकों की संख्या 11.90, 10.34 और तथा 10.07 है बाकी अधिकतर राज्यों में कुल श्रमिकों की तुलना में महिला श्रमिक एक फीसदी से भी कम है।

                दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह विचार भी व्यक्त किया कि उसे समझ नहीं आता कि आखिर 1997 में एअर इण्डिया ने किस आधार पर जहाज के अन्दर उड़ान के दौरान महिला सुपरवाइजर के पोस्ट से इन्कार किया है। ऐसे कितने ही अवसरों और कार्यों के लिए जबजब महिलाविरोधी नीतियां बनती होंगी तो आखिर क्या क्या कारण गिनाए जाते होंगे यही न कि फलां काम उनके लिए नहीं है या वे यह नहीं कर पायेगी लेकिन मौका मिले तभी तो पता चल पायेगा कि क्यों नहीं कर पायेंगी। दरअसल आज भी यह एक बड़ा मुद्दा है कि सार्वजनिक दायरा तथा हर प्रकार के कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए पूर्ण बराबरी कैसे कायम हो। इस दिशा में गैरबराबरी के खिलाफ महिलाओं के द्वारा किया गया छोटामोटा संघर्ष भी बदलाव का बयार लाता है। इसलिए जरूरत है सबसे पहले नाइन्साफी को पहचानने तथा इस धारणा को पुराना करने का कि बराबर का काम हमारा हक है और औरत होने के नाते इससे वंचित नही किया जा सकता है।

                
? अंजलि सिन्हा