संस्करण: 19  दिसम्बर- 2011

मानवाधिकारों की रक्षा में असफल रहा है

म. प्र. मानवाधिकार आयोग

? एल.एस.हरदेनिया

                 मधयप्रदेश मानवाधिकार आयोग प्रदेश के निवासियों के मानवाधिकारों की रक्षा में पूरी तरह असफल रहा है। एक जन सुनवाई के दौरान अनेक लोगों ने आयोग की असफलता के अनेक उदारहण पेश किए।

               जनसुनवाई का आयोजन दिल्ली स्थित ह्यूमन राईट्स ला नेटवर्क द्वारा किया गया था। सुनवाई के लिए एक जूरी पेनल बनाया गया था जिसमें आर.डी.शुक्ल, पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश एवं पूर्व अधयक्ष म.प्र. मानव अधिकार आयोग, आर.सी.चंदेल, अवकाश प्राप्त जिला जज, सुभाषचन्द्र त्रिपाठी, पूर्व महानिदेशक म.प्र.पुलिस, एल.एस.हरदेनिया, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक एवं भोपाल स्थित ला यूनीवरसिटी की प्रोफेसर डॉ. राका आर्य थे। जूरी की सहायता के लिए विशेषज्ञों का एक पैनल भी बनाया गया था जिसमें शामिल थे डॉ. जितेन्द्र गुप्ता, फादर आनंद मुटंगल, डॉ. गोपालराव आवटे एवं डॉ. आनंद सिंह राजे।  

               जनसुनवाई का आयोजन दिनांक 11 दिसंबर को भोपाल में किया गया था। दिन भर चली जनसुनवाई में अनेक लोगों ने आयोग के साथ हुए कटु अनुभव सुनाये। जनसुनवाई के दौरान एक भी ऐसा व्यक्ति पेश नहीं हुआ जिसने आयोग द्वारा किये गए कार्य की प्रशंसा की हो या जिसने यह बताया होगा कि आयोग द्वारा ही गई कार्यवाही से वह संतुष्ट हैं। जनसुनवाई में अनुसूचित जाति, एवं अनुसूचित जनजाति के सदस्य, महिलाये एवं अन्य पीड़ित शामिल हुए। सभी को मानवाधिकार आयोग से शिकायत थी। मानवाधिकार आयोग को जब कोई शिकायत प्राप्त होती है वह अक्सर मामले को जांच के लिए जिला प्रशासन और विशेष कर जिला पुलिस के पास भेज देता है। आम तौर पर जिला पुलिस शिकायत को बेबुनियाद और झूठी बताकर वापिस भेज देती है। सभी मेम्बरान-ए-जूरी की राय थी कि आयोग को अपनी ही एजेन्सी से जांच कराना चाहिए। पीड़ितों का कहना था कि बहुसंख्यक शिकायतें प्रशासन और विशेषकर पुलिस के विरूध्द होती हैं। इस तरह आप पुलिस से कैसे यह अपेक्षा कर सकते हैं कि वह उनके विरूध्द की गई शिकायत को सही बताएगी। यह शिकायत भी की गई कि आयोग कम ही अवसरों पर शिकायतकर्ता की बात सुनने के लिए सुनवाई करता है और यदि करता भी है तो बंद कमरों में।

               भोपाल की जनसुनवाई में अपना बयान देते हुए अनेक पीड़ितों ने बताया कि प्राय: पुलिस उनके द्वारा की गई एफ आई आर को पंजीबध्द नहीं करती है। जब इस बात की शिकायत आयोग से की जाती है तो आयोग उसी जिले की पुलिस को ऐसी शिकायतों की जांच के लिए भेज देते हैं।

               पुलिस के अलावा सरकारी अस्पतालों के विरूध्द अनेक लोगों ने शिकायतें की। जैसे भोपाल निवासी इन्द्रपाल सिंह राजपूत ने बताया कि उनकी बच्ची का जन्म सात महीने की गर्भावस्था में ही हो गया। वह काफी कमजोर थी। अत: उसको भोपाल के कमला नेहरू अस्पताल में भर्ती करया गया। पंरतु इलाज के दौरान लैंम्प से इसका चेहरा जला दिया गया। पूरी जांच के बावजूद घटना की गंभीरता के अनुरूप दोषियों को दंडित नहीं किया गया। एक अन्य मामले में पुलिस ने पीड़ित की तरफ से एक पत्र पेश कर दिया जिसमें यह लिखा था कि वह अपनी शिकायत वापस ले रहे हैं। उसने जनसुनवाई के दौरान बताया कि उसने शिकायत वापिस नहीं ली और पत्र में उसके हस्ताक्षर उसके नहीं है। इस झूठे दस्तावेज के आधार पर मानव अधिकार आयोग ने मामले को समाप्त कर दिया। विदिशा जिले के एक मामले में हत्या के प्रयास को आत्महत्या के प्रयास में बदल दिया गया। सुनवाई में पीड़ित की मां जमनाबाई ने बताया कि कुछ रंजिश को लेकर उसके बेटे पर पेट्रोल डालकर उसे जला दिया गया। इस मामले की शिकायत आयोग में की गई। आयोग ने विदिशा जिले के पुलिस अधीक्षक को मामले की जांच करने को कहा। पुलिस अधीक्षक ने जांच के बाद उसे आत्महत्या के प्रयास का मामला बता दिया। आयोग ने पुलिस अधीक्षक की रिपोर्ट सही मानते हुए आगे जांच नहीं की। आयोग को चाहिए था कि वह फोरनेसिक मेडीकल विशेषज्ञ से मामले की जांच करवाता,  यह पता लगाने के लिए कि मामला हत्या के प्रयास का था या आत्महत्या के प्रयास का। परंतु आयोग ने इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया और पूरी तौर से पुलिस पर भरोसा किया।

               छतरपुर जिले के निवासी भागीरथ अहिरवार पर उसके गांव के दंबगों ने ज्यादती की। उसका सिर मुंडवा दिया और उसके मुॅह को काला किया गया। जब उसने इस घटना के विरूध्द कार्यवाही की तो उसे इन लोगों ने बुरी तरह मारा। परंतु मार-पीट की इस घटना की रिपोर्ट पुलिस ने नहीं लिखी। इस पर भागीरथ, जो हरिजन है ने आयोग से शिकायत की। परंतु आयोग ने उसकी किसी प्रकार की सहायता नहीं की।

               शिवपुरी आकाशवाणी केन्द्र की एक महिला कर्मचारी को, जो इंजीनियर के पद पर पदस्थ है, उन्हीं के कार्यालय का एक कर्मचारी अनेक प्रकार से परेशान करता है। इस महिला ने हर स्तर पर शिकायत की। उसने मानव अधिकार आयोग से भी शिकायत की पर आयोग उसे राहत नहीं दिला सका।

               आयोग की असफलताओं की सूची में एक मामला उस समय जुड़ गया जब वह एक दृष्टिहीन बालिका को भी न्याय नहीं दिला सका। यह दृष्टिहीन बालिका दमोह के कमला नेहरू गर्ल्स कालेज में पढ़ती थी। दृष्टिहीन होने के नाते नियमों के अनुसार परीक्षा में उसे अतिरिक्त 20मिनट दिया जाना चाहिए और उसे एक लिखने वाला भी उपलब्ध कराना चाहिए। परंतु कॉलेज ने उसे दोनों सुविधाये नहीं दी। इसकी शिकायत उसने सब जगह की परंतु उसे कहीं से राहत नहीं मिली  उसने अंतत: आयोग से भी शिकायत की। उसके पिता ने सुनवाई के दौरान बताया कि आयोग ने अभी तक सहायता नहीं की। वैसे वह अपने प्रयासों से अच्छे नंबरों से पास हो गई। परंतु यदि उसे अतिरिक्त बीस मिनट मिलते तो वह और बेहतर नंबरों से उत्तीर्ण होती। देवास निवासी 21वर्षीय रज़िया इमरान की डाक्टरों की लापरवाही से मौत हो गई। रज़िया को प्रसव हेतु इंदौर एम. वाय. अस्पताल में भर्ती किया गया था। प्रसव के उपरांत उसके शरीर से रक्सस्राव होने लगा जो रूक नहीं रहा था।  इमरान के परिजनों को पता लगा कि एक विशेष इंजेक्शन देने से खून का बहना बंद हो सकता है। उन्होंने नर्सों से उस इंजेक्शन को लगाने का अनुरोध किया परंतु नर्सों ने पैसों की मांग की। रिश्तेदारों ने कहा कि हमारे पास अभी पैसे नहीं है आप इंजेक्शन लगा दें हम सुबह पैसे दे देंगे। पर नर्सें नहीं मानीं। जब स्थिति बिगड़ गई तो नर्सों ने डाक्टर को बुलाया। पर डाक्टर भी नहीं आई। इस बीच रज़िया की मौत हो गई। अभी तक इस अपराध के लिए जिम्मेदार डाक्टरों और नर्सों को किसी भी प्रकार का दंड नहीं दिया गया है। जूरी के सदस्यों को कलेक्टर की वह रिपोर्ट पढ़ने से आश्चर्य हुआ जिसमें यह कहा गया है कि रज़िया को एक नहीं दो बच्चे हुये है जबकि परिवार वालों को एक ही बच्चा सौंपा गया है। शिकायत को लेकर परिवार वाले 12 जुलाई 2009 को प्रधानमंत्री से भी मिले परंतु कहीं से न्याय नहीं मिला।

               एक किसान द्वारा तीन लाख रूपये ज्यादा का कर्ज नहीं चुका पाने के कारण आत्महत्या कर ली गई थी। किसान का नाम भगत सिंह मेवाड़ा था। वह सीहोर जिले के बड़बेली गांव, का रहने वाला था। भगत सिंह की विधवा प्रेमबाई ने अपनी दु:खद गाथा पेनल आफ जूरी को बताई। एक और प्रसूता फरजाना के साथ किये गये दुर्व्यवहार और डाक्टर द्वारा रिश्वत की मांग का मामला भी जनसुनवाई में शामिल था। जब फरजाना के रिश्तेदारो ने  ब्लाक मेडीकल आफीसर से रिश्वत मांगने की शिकायत की तो बीडीओ ने कहा काम करवाना हो तो रिश्वत तो देनी ही पड़ेगी। परंतु अंतत: तहसीलदार ने बात की और उनके हस्तक्षेप से आपरेशन बाद के टांके लगाये गए।

               ऐसे अनेक मामले सुनवाई के दौरान आये जिन्हें सुनकर यह लगा कि व्यवस्था कितनी असंवेदनशील हो गई है जिसमें मृत्यु शैय्या पर लेटे रोगियों से भी रिश्वत की मांग की जाती है।

? एल.एस.हरदेनिया