संस्करण: 19 अगस्त-2013

इशरत के परिवार के साथ ईद

?  सुभाषिनी अली

          कुछ वर्ष पहले आजमगढ़ की एक सभा में, मेरी मुलाकात इशरत जहां की मां, शमीमा से हुई थी। ज्यादा बात करने का मौका तो नहीं मिला, लेकिन उनकी खामोश शालीनता ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इस वर्ष, जब मुझे पता चला कि ईद के मौके पर मैं मुंबई में रहूंगी,तो मैंने उनसे संपर्क किया और पूछा कि क्या मैं उनसे और उनके बच्चों से ईद मिलने उनके घर आ सकती हूं।

                 ईद एक ऐसा त्योहार है जो दुनिया भर में खुशी और उल्लास के साथ मनाया जाता हैं किसी बहुत ही प्रिय व्यक्ति की गैरमौजूदगी इस खुशी के मौके पर कुछ ज्यादा ही मायुसी का सबब बन जाता है। जिस वहशी तरीके से उस मासूम, नवजवान इशरत की जान ली गयी थी, उससे तो इस परिवार के दुख का ठिकाना लगाना मुश्किल है।

               शमीमा ने मेरे आग्रह का स्वागत किया और महाराष्ट्र ऐडवा की अध्यक्ष, सोनिया गिल और मैं मुम्ब्रा ठीक उस वक्त पहुंचे जब ईद की नमाज खत्म हो रही थी। मुम्ब्रा मुम्बई से लगे ठाणे जिले का एक हिस्सा है जो अब मुस्लिम बाहुल बन गया है। यहां हिन्दुस्तान भर से आये मुस्लिम बसे हुए हैं। कई तो सालों पहले अपने घरों को छोड़ने के बाद ही आ गये थे। कई जब हम मुम्ब्रा पहुंचे तो सड़कों पर बूढ़ें, जवानों और बच्चों की भीड़ सड़कों पर उमड़ी हुई थी। कई लोग नमाज के बाद अपने घर लौट रहे थे, कई अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के यहां जा रहे थे और कई तो अपने दोस्तों के साथ घूमते-फिरते मौज ले रहे थे। फुटपाथ दुकानों से पटी पड़ी थी। कहीं बिरयानी, तो कहीं चाट, कहीं कबाब तो कही सेवई, कहीं खिलौने तो कहीं गुब्बारे ! बच्चे तो अपने नये कपड़ों, फैन्सी जूतों और अल्हरटप काले चश्मों में खासे रंग-बिरंगे लग रहे थे।

               हमको वह फ्लैट, जहां शमीमा अपने बच्चों के साथ पिछले कुछ महीनों से रह रही है, आसानी से मिल गया। उनको अपना पुराना, बोसीदा घर छोड़ना पड़ा था क्योंकि वह बहुत ज्यादा जाना पहचाना हो गया था और बिल्कुल ही असुरक्षित था। जब से अहमदाबाद के सीबीआई कोर्ट ने एन्काउन्टर केस की सुनवाई शुरू कर दी और खास तौर से जब सीबीआई ने गुजरात के कई पुलिस अधिकारियों (जो पहले से ही सोहराबुद्दीन एन्काउन्टर केस में जेल में बन्द हैं) के खिलाफ चार्जशीट दर्ज कर दी, तब से शमीमा और उनके समर्थ अपने आपको काफी असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। उनका कहना था कि वह पुलिसवाले हैं। और एक बार, जब शमीमा अहमदाबाद से लौट रही थी, तो उसकी गाड़ी पर गोली चली। शमीमा को अपने परिवार के साथ अपना घर छोड़कर एक समर्थक के फ्लैट में शरण लेना पड़ा है।

                 शमीमा का मुस्कुराता चेहरा फ्लैट के दरवाजे के भीतर हमारा इन्तजार कर रहा था। उसने हमें ईद की मुबारकबाद देते हुए गले से लगाया। उसके पीछे खड़ी बेटी, मसर्रत, ने भी इसी तरह हमारा स्वागत किया। दूसरी दो बेटियां थोड़ा सा झेंप रही थी लेकिन बहुत जल्दी, उनका चुलबुलापन लौट आया। भाई अनवर जो घर के मर्द होने और अपने इस मार खाये परिवार के अकेले कमेरे व्यक्ति होने के एहसास से भरपूर मालूम देते हैं, भी हम लोगों के आने से काफी खुश थे।

               बहुत जल्द हम लोग लज़ीज शीरकोर्मा खा रहे थे और बहुत सारे चहकती आवाजों को सुन रहे थे।

              शमीमा और उनके स्वर्गीय पति पटना के थे। इशरत की मौत के बाद, मसर्रत अपनी एक बहन के साथ अपनी नानी के घर पढ़ने चली गयी थी। तब से वह वही पढ़ रहे है। लेकिन, तमाम मुम्बई की लड़कियों की तरह, उन्हें पटना गांव लगता है। मसर्रत का तर्क मजबूत है। वह कहती है कि उनके जैसे गरीब परिवार के बच्चों के लिये मुम्बई में काम ढूंढना ज्यादा आसान है।

               घर में नौकरी करने वाला अकेला अनवर है-वह अपनी पढ़ाई छोड़कर एक काल सेन्टर में काम करता है। लेकिन सभी घर चलाने में हाथ बंटाते हैं। शमीमा और उसकी बेटिया सिलाई का काम करती है। उन्होंने गर्व के साथ हमें बताया कि ईद के अपने नये कपड़े उन्होंने खुद सिये थे।

                काम की चर्चा इशरत की यादों की बाढ़ अपने साथ लाती है। काम की तलाश ही तो उसकी मौत का कारण बना था। अपनी पढ़ाई और घर के खर्च चलाने के लिये ही तो उसने 'जावेद अंकल' के लिये काम करना शुरू किया था। दो महीने बाद, उसका गोलियों से छिदा शरीर, जावेद और दो अन्य लोगों के शवों के पास अहमदाबाद के बाहर एक सड़क पर पड़ा मिला था। बगल में वह ए.के.47 था जिसे उसका बताया गया। लेकिन उसपर उसकी अंगुलियों का कोई निशान नहीं था।

               शमीमा उस एक आंसू को पोंछते हुए जिसे वह रोक नहीं पायी है, बताती है कि मेरी बेटी सिर्फ 2 महीने की तनख्वाह कमा पायी थी। सारा पैसा उसने मेरे हाथ में दिया। कॉलेज के अगले साल की फीस उसने जमा की और कहा कि जब कॉलेज खुलेगा तो वह नौकरी छोड़कर फिर अपनी पढ़ाई में लग जायगी और मोहल्ले के बच्चों को टयूशन देना शुरू कर देगी। यह तो वह सालों से कर रही थी।

               मसर्रत की पढ़ाई जल्द खत्म हो जायेगी। उसके बाद, शायद उसकी शादी हो जायेगी। लेकिन वह काम जरूर करेगी। छोटी लड़कियां भी पढ़ने और फिर काम करने का सपना देख रही है। तीनों लड़कियां सामान्य और खुश जिन्दगी बिताने और कम से कम कुछ सपनों को पूरा करने पर तुली हुई हैं। अनवर अपनी उम्र के लिये ज्यादा खामोश है। उसे अपनी जिम्मेदारियों के बोझ का एहसास तो हैं लेकिन किसी प्रकार का असंतोष नहीं। शमीमा इस परिवार का खामोश और स्थिर केन्द्र है। उसने अपनी बेटी की क्रूर हत्या के समूचे प्रभाव को अपने अन्दर समा लिया है। चारदीवारी के अन्दर रहने वाली एक मामूली औरत से वह पुलिस की पूछताछ, न्याय की सर्द गलियारों के अनगिनत और अन्तहीन चक्कर, पड़ोसियों की शक और शत्रुता पूर्ण निगाहे, मीडिया के चुभने वाले पेचीदा सवाल को झेलने का सामर्थ रखने वाली महिला बन गयी है। इस लम्बे सफर के दौरान, उसने अपनी निहित शालीनता नहीं खोई है। अपनी बेटी के निर्दोष होने का उसका विश्वास पत्थर की तरह अटूट है। उसके मासूम चेहरे से आतंकवादी होने का काला कलंक मिटाने का उसका संकल्प, भी अटूट है। इसी विश्वास और संकल्प ने उसे वह अकल्पनीय हिम्मत दी है जिसके सहारे उसने उन बाधाओं को लांघा है जिनको लांघना वास्तव में असंभव था।

              आज ऐसा लगता है कि न्याय उसके पकड़ के करीब है लेकिन वह जानती है कि वह अब भी उसके हाथ से निकल सकती है। जो भी हो, उसे पता है कि देश भर में लाखों लोग आज उसकी बेटी को बेकसूर मानते हैं। इस जानकारी ने उसके अंदर यह उम्मीद पैदा कर दी है कि उसके बेटे और बेटिया उन छोटे लेकिन रंगीन सपनों को साकार करेंगे जो उस मासूम इशरत के हृदय में इतनी क्रूरता के साथ मौत के घाट उतार दिये गये थे। हम लोग शमीमा के घर से बिदा होते है, खुशी के साथ बिदा होते हैं क्योंकि इस निहत्थे, लड़ने वाले छोटे से गिरोह की खुशियों में शरीक होने का हमें मौका मिला, आदर के साथ क्योंकि इस छोटे से निहत्थे गिरोह ने अपने उस दुश्मन के सामने सर झुकाने से इंकार किया है जिसकी ताकत और क्रूरता को वह अच्छी तरह से जानते पहचानते हैं।

   
? सुभाषिनी अली