संस्करण: 19 अगस्त-2013

राजनीति है या नौटंकी

?  राजेन्द्र जोशी

          नाटक कम्पनी के कलाकारों को जब नाटक ही करना है तो उनको कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि वे कब, कहां किस मंच पर कौनसा नाटक खेल रहे हैं और उन्हें किस तरह के रोल में किस तरह का मेकअप करना चाहिए या किस तरह से उनकी कास्टयूम होना चाहिए। एक मान्यता यह भी है कि यह दुनिया एक रंगमंच है जिसपर प्रत्येक व्यक्ति एक कलाकार के रूप में अपनी भूमिका अदा करता चला आ रहा है। प्रत्येक कलाकार उसे मिले अभिनय के अनुरूप सजता-संवरता है, मेकअप करता है और पात्र के चरित्र के मुताबिक अपने हावभाव पेश करता है और उसी की तरह की वेशभूषा में रंगमंच पर उपस्थित होकर अपनी अदाकारी को अंजाम देता है।

               सबसे सफल और सर्वाधिक लोकप्रिय वही कलाकार हो सकता है जो नाटक के कथानक और उसके डायलॉग्स के मुताबिक अपने आपको ढालने की चतुराई दिखा पाता है। अभिनय के कई प्रकार और कई स्तर होते हैं जिसमें व्यक्ति अपनी कलाकारी के प्रदर्शनों के अवसर की तलाश में रहता है। वैसे इस आधुनिकता और टेक्नालॉजी के दौर में नाटक यानि कि अभिनय के तरीकों में काफी कुछ बदलाव आ गया है। नाटक की जो परम्परागत और सांस्कृतिक पहचान समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चली आ रही थी उस पहचान को आज के अभिनयकर्ताओं ने एक नया मोड़ दे दिया है। यह एक सांस्कृतिक विशेषता थी कि हमारे यहां धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक क्षेत्र की कहानियों को नाटक मंडलियां मंचित करती रहती थी। रामायण, महाभारत एवं अन्य पौराणिक ग्रंथों के आख्यानों के कथानक पर नाटक लिखे जाते थे जिन्हें व्यक्ति अपनी कला के प्रदर्शन से अभिनीत करते थे। कथानक के पात्रों के मुताबिक व्यक्ति अपने आर्ट को ढाल लेता था। रामलीला के मंच पर बाबूलाल दर्जी भगवान राम की भूमिका में उतरता था तो लोग उसके हावभाव, वेशभूषा, और बोलचाल में राम की झलक का एहसास करते हुए उसे सम्मान देते थे। टेलरिंग का व्यवसाय करने वाला बाबूलाल तभी तक एक आदर्श स्वरूप के रूप में दिखता था जब तक वह तीन घंटे की रामलीला में राम के भेष में होता था। मंच से उतरने के बाद वह फिर गली मुहल्ले का बाबूभाई बन जाता था और सेठजी के आदमी अपना कर्जा वसूल करने उसके दरवाजे पर पहुंच कर उसे जलील करते रहते।

               मेलों में, विशेष पर्वों-उत्सवों पर विशेषकर दशहरा-दीवाली के बीच होने वाली रामलीलाओं, कृष्णलीलाओं, ऐतिहासिक ड्रामों और सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ लिखी गई कहानियों के बहुत नाटक हुआ करते थे। अब नाटकों के मंच का स्थान राजनीति द्वारा अतिक्रमित कर लिया गया है। अब मंचों पर नाटक खेले जा रहे हैं किंतु वे रामलीला कृष्णलीला या ऐतिहासिक ड्रामों के रूप में नहीं बल्कि दर्शकों की तालियां पिटवाकर अपने पक्ष से जनता को जोड़ने के लिए ही खेले जा रहे हैं। अब नाटक के नाम पर ढोंग होने लगे हैं।

                अब जो मंच तैयार होते हैं उनमें पर्दें का उठना और गिरना नहीं होता बल्कि एकदम खुला मंच होता है जिसमें नामी गिरामी कलाकार अवतरित होकर अपनी भूमिका से दर्शकों के दिलों को जीतने का पांसा फेंकता रहता है। शहरों, कस्बों और गांवों में जब लीलालओं के नहीं भाषणों के मंच सजते हैं तो पूर्व से ही माहौल गर्म बना दिया जाता है कि फला तिथि को एक किसी विशेष नाटक मंडली (राजनैतिक दल) के फलां-फलां कलाकार अपनी नाटकीय कला का प्रदर्शन करेंगे। स्वाभाविक है नाटक मंडली और उसकी कथनी के नाम से तथा कलाकार-विशेष की शोहरतों के ढींढोरों से प्रभावित होकर दर्शक दीर्घा खचाखच भर जाती है।

              ऐसे मंचों पर उतरने वाले कलाकार बड़े ही घाघ होते हैं जिनके नाटय प्रदर्शन में ढोंगकला का बखूबी प्रदर्शन होता है। इनकी संपूर्ण कला और पैतरेबाजी में नकलीपन साफ-साफ उभरकर आ जाता है। परंतु पता नहीं ये किस मिट्टी के बने होते हैं कि ये अपनी नकली बादशाहत के नशे में हमेशा ही डूबे रहते हैं। अपने अभिनय के प्रदर्शन के दौरान ये कब किस तरह के कास्टयूम  धारण कर लेंगे ये व्यापक प्रचार पाने की भूख के वशीभूत ऐसे राजनैतिक कलाबाजों को कतिपय निहित स्वार्थी दर्शक सदैव ही घेरे हुए मिल जायेंगे क्योंकि उन्हें भी तो ऐन-केन-प्रकारेण अपने उल्लुओं को सीधा करना पड़ता है।

                'यह पब्लिक है-सब जानती है' की तर्ज पर समाज प्रगति कर रहा है और नाटय प्रदर्शनों के नाम पर ढोंग प्रदर्शनों का भरपूर इंज्वाय कर रही है। पब्लिक को इसमें कोई रूचि नहीं कि किस अभिनेता को कब, क्या और कैसी ड्रेस पहनना चाहिए। यह तो अपनी छवि को सुर्खियों में बनाये रखने का अभिनेता का अपना शगल है। अभिनेता स्वयं निर्णय यदि नहीं कर पाता तो उसके संगी-साथी और उसके एडवाइजर उसे सलाह देते रहते हैं कि कह, कहां किस अवसर पर उसे अपना माथा ढंकना है और कब उसे माथा खुला रखने का नाटक करना है। दोनों स्थितियों में अभिनेता के एक्शन पर जोरदार तालियां तो पिटना ही है। चाहे वह सिर ढंक ले या फिर ढंकने से इंकार कर दे!

 

? राजेन्द्र जोशी