संस्करण: 19 अगस्त-2013

मध्यप्रदेश में फैली भ्रष्टाचार की अमरबेल

? महेश बाग़ी

         ध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार को नासूर मानते हैं और उसके खात्मे के लिए कड़ा कानून बनाने का दावा भी करते हैं। इसके अलावा वे अपने ब्लॉग पर भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने का संकल्प भी व्यक्त करते हैं, किंतु उन्हीं की नाक के नीचे भ्रष्ट मंत्री और अधिकारी न सिर्फ मौज मजे कर रहे हैं, बल्कि अपनों को उपकृत करने में भी लगे हैं। लोकायुक्त ने भी इस सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए अपरोक्ष रूप से सरकार को चुनौती भी दी है। इसके बावजूद सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। इस सरकार के दस मंत्री तो लोकायुक्त जांच में फंसे ही हैं और अब इनमें दो और वरिष्ठ मंत्री भी शरीक हो गए हैं। ये हैं संस्कृति-जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा और ऊर्जा-खनिज मंत्री मंत्री राजेंद्र शुक्ल। इन दोनों पर णखनिज ठेकेदारों से रिश्वतखोरी के आरोप हैं और यह मामला लोकायुक्त तथा ईओडब्न्ल्यू तक जा पहुंचा। गौरतलब है कि पिछले दिनों आयकर विभाग ने प्रदेश के दो नामचीन खनिज ठेकेदार और बिल्डर के यहां छापामार कार्रवाई की थी। इसमें एक डायरी बरामद हुई थी, जिसमें विभिन्न लोगों को उपकृत करने का उल्लेख था। प्रसिध्द आंग्ल दैनिक इंडियन एक्सप्रेस ने आयकर विभाग के सूत्रों के हवाले से इस डायरी के अंश प्रकाशित किए हैं, जिनमें उक्त दोनों मंत्रियों को रिश्वत देने का खुलासा हुआ है।

               आयकर विभाग ने यह डायरी मध्यप्रदेश के लोकायुक्त को देकर इसकी जांच करने को कहा। लोकायुक्त ने इस बारे में आयकर विभाग को पत्र लिखकर साक्ष्य की मांग की है। इसके अलावा खनिज-ऊर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ला पर अपने पिता और भाई की कंपनी को करोड़ों का लाभ अवैधानिक तौर से पहुंचाने का भी मामला सामने आया है। जनहित के लिए पुल बनाने की बजाय राजेंद्र शुक्ल के भाई और पिता की कंपनी को 7.28 करोड़ का पैकेज दे दिया गया। कंपनी समयावधि के बाद भी काम करती रही और उस पर कोई पेनाल्टी नहीं लगाई गई। मेसर्स विनोद कुमार शुक्ला कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड से सरकार ने एकमुश्त आधार पर 13.50 करोड़ का करार किया था, जबकि निविदा की प्राक्कलन राशि 6.88 ही थी। खास बात यह है कि पुल बनाने का यह ठेका तय समयावधि से आठ माह बाद पूरा हुआ और ठेके की शर्ताें के विपरीत फाइनल पेमेंट की राशि बढ़ाकर 15.22 करोड़ कर दी गई। आडिट रिपोर्ट में 6.67 करोड़ के अतिरिक्त भुगतान पर आपत्ति जताई गई है। इस मामले का दिलचस्प पहलू यह है कि पुल निर्माण के इस ठेके की चौथी निविदा में मेसर्स एम सिंगला ने यह कार्य 8.85 करोड़ में करने का प्रस्ताव किया था, जिसे स्वीकार नहीं किया गया और मंत्री के परिजनों से यही कार्य 15.22 करोड़ में करवाया गया। शिवराज सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों द्वारा भ्रष्टाचार करने और अपने परिजनों को बेजा लाभ पहुंचाने के ऐसे मामले पहले भी उजागर हो चुके हैं, जिन्हें सरकार ने लोकायुक्त जांच के नाम पर अधर में लटका रखा है।

               इस बीच यह खबर भी प्रकाश में आई कि सरकार लोकायुक्त पीपी नावलेकर को बदलना चाहती है। इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए श्री नावलेकर ने अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि उन्हें नहीं हटाया जा सकता और वे राय के नहीं बल्कि केंद्र के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शिवराज सरकार के दस मंत्रियों और कई विधायकों के भ्रष्टाचार के मामले लोकायुक्त में विचाराधीन हैं। कहने की जरूरत नहीं कि चुनावी साल में 'अपनों' के काले कारनामे प्रकाश में आने के डर से सरकार लोकायुक्त संगठन पर दबाव बनाना चाहती है, ताकि विपक्ष को मुद्दा न मिल सके। इस बीच मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मांग की गई है कि प्रदेश की जांच एजेंसियों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा जाय।

               हाईकोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए गृह विभाग प्रमुख सचिव सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव, डजीपी लोकायुक्त, निदेशक ईओडब्ल्यू और डीजीपी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिकाकर्ता की ओर से दलील भी गई है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए थे कि सीबीआई को पूर्ण स्वयत्तता दी जाए। इसी के साथ जांच एजेंसियों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए भी निर्देश दिए गए थे। इसी को आधार बनाकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। शिवराज सरकार द्वारा अपने भ्रष्ट मंत्रियों और विधायकों के अलावा नौकरशाहों को अभयदान देने के मामले पहले भी प्रकाश में आ चुके हैं। ताजा मामला भोपाल को-ऑपरेटिव बैंक का है जहां सहायक प्रबंधक के रूप में ऐसे अफसर को तैनात किया गया है, जिस पर राजीव गांधी शिक्षा मिशन के एक करोड 25 लाख रुपए के गबन का आरोप पुलिस जांच में प्रमाणित भी हो चुका है। ऐसे भ्रष्ट अफसर कार्रवाई करने की बजाय सरकार उसे प्रमोशन के साथ-साथ मलाईदार पदों से भी नवाज रही है। मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के फलने-फूलने के ये चंद उदाहरण मात्र हैं। यदि सभी मामलों की गंभीरता से जांच की जाए तो इक्का-दुक्का मंत्री-विधायक और अफसरान ही बेदाग साबित होंगे। जाहिर है कि शिव सरकार के राज में भ्रष्टों को खुली छूट दी गई है और वे दोनों हाथों से प्रदेश को खोखला करने में जुटे हैं। यह है शिवराज सिंह के स्वर्णिम मप्र की हकीकत।

   

   ? महेश बाग़ी