संस्करण: 19 अगस्त-2013

मोदी बनाम मुलायम और मुसलमान

? सुनील अमर

          गामी लोकसभा चुनाव में भाजपा नेता नरेन्द्र मोदी अगर प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहते हैं तो उन्हें केन्द्र में आने से रोकने के लिए उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता किसको समर्थन दे सकते हैं? समाजवादी पार्टी को या यूपीए की हेड कॉग्रेस को? यह एक ऐसा सवाल है कि जिसका उत्तर देश की आगामी राजनीति की दिशा तय करेगा और सपा प्रमुख मुलायम सिंह का भी। सभी जानते हैं कि समाजवादी पार्टी मुसलमानों की खैरखाह दिखने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ती और उत्तर प्रदेश में अपने गठन के समय से ही सपा मुसलमानों का समर्थन पाती रही है। भाजपा ने जिस तरह अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी नेपथ्य में ढ़केलते हुए उनके सिर पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ला बैठाया है वह देश के राजनीतिक दलों के लिए अभूतपूर्व है लेकिन इस घटना की मुसलमानों में प्रतिक्रिया है और वे चुपचाप भाजपा के आगामी कदमों का इंतजार कर रहे हैं। श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रचार समिति का अध्यक्ष बनते ही अपने सबसे विश्वस्त और गुजरात के मुसलमानों के उत्पीड़न के लिए ख्यात राज्य के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बना दिया है और वे बीते दिनों अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद/श्री रामजन्मभूमि जाकर वहाँ अपनी मंशा प्रकट कर आये हैं।

                भाजपा ने इस बार फिर खुलकर हिन्दूकार्ड खेलने का मन बना लिया है और उसे पता है कि इसके बिना उसका त्राण नहीं। वर्ष 1999 में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन के गठन के बाद से ही उत्तर प्रदेश से उसका सफाया होना शुरु हो गया जो आज तक जारी है। इस क्रम में उसके सबसे पुराने सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड से उसका 17 साल पुराना सम्बन्ध टूट चुका है और तृणमूल कॉग्रेस ने साफ-साफ कह दिया है कि वह मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ नहीं रह सकती। राजग के और भी कई दल भाजपा के इस अवतार के साथ नहीं रह पाएंगें और कायदे से देखा जाय तो राजग का अस्तित्व ही समाप्तप्राय हो गया है क्योंकि उसके साथ अब सिर्फ अकालीदल और शिवसेना जैसे दो सहयोगी ही बचे हैं। सुश्री जयललिता अभी कह रही है कि वे भाजपा के साथ हैं लेकिन उनका अतीत उन्हें विश्वसनीय नहीं बनाता। वे वहीं रहेंगी जहॉ उनके धुर प्रतिद्वंदी करुणानिधि नहीं रहेंगें।

                उत्तर प्रदेश की हालत यह है कि अपने जन्म के समय से ही भाजपा और सपा ने अपना लाइन ऑफ एक्शन तय कर रखा है। भाजपा मुसलमानों की मुखालफत कर कट्टर हिन्दुओें को प्रभावित करना चाहती है तो सपा मुसलमानों के साथ खुलकर खड़ी हो जाती है। बीच में जब भाजपा ने राजग के सहयोगी दलों के ऑखें तरेरने पर अपने साम्प्रदायिक लक्ष्य अयोधया, समान नागरिक संहिता और धारा 370 को एक दशक तक ठंढ़े बस्ते में डाल दिया था तो उत्तर प्रदेश के मुसलमान भी सिर्फ सपा के ही भरोसे नहीं रह गये थे और उन्होंने थोड़ा बहुत बसपा, पीस पार्टी और कॉग्रेस से भी लगाव दिखाया। भाजपा के इस नये तेवर के साथ चुनाव अगर उत्तर प्रदेश में हो रहे होते तो सपा की चाँदी हो सकती थी क्योंकि तब उत्तर प्रदेश में मुलायम से बड़ा मुसलमानों का और कोई सियासती रहनुमा हो ही नहीं सकता था लेकिन दिक्कत यह है चुनाव लोकसभा के होने वाले हैं और समाजवादी पार्टी का विस्तार उत्तर प्रदेश के अलावा और कहीं हैं नहीं। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने चुनाव पूर्व तीसरा मोर्चा बनाने की काफी कसरत की लेकिन ये बेल परवान चढ़ नहीं नहीं रही है। इसी क्रम में उन्होंने अपने पुत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कॉग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी से मुलाकात करने भी भेजा था और समाजवादी पार्टी का सम्मेलन भी कोलकाता में किया था। असल में अपनी कई जाती और पारिवारिक दुश्वारियों को लेकर केन्द्र सरकार से दबे रहने वाले मुलायम सिंह अतीत में कई बार अपनी बातों से पलट चुके हैं इसलिए उनकी बातों को अब वामपंथी दल भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं जबकि अभी तक वामपंथी ही उनके स्वाभाविक साथी थे।

                पिछले कुछ चुनावों से ये देखने में आ रहा है कि केन्द्र में भाजपा या कॉग्रेस को बिल्कुल अलग कर सरकार बनाने का खेल नहीं हो सकता। इसी के साथ संप्रग के दोनों कार्यकाल में सरकार को लगातार समर्थन देने के बावजूद समाजवादी पार्टी जनहित या देश हित के किसी भी मुद्दे पर कोई दबाव बना पाने में अस्मर्थ रही है। आगामी लोकसभा चुनाव में मुसलमान अपना वोट देने से पहले यह जरुर सोचना चाहेंगें कि केन्द्र में उनकी समस्याओं को लेकर कौन जूझ सकता है या उन्हें लाभ किस से मिल सकता है। जहॉ तक समाजवादी पार्टी की बात है तो वह उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के लिए काम कर रही है। मुसलमानों को साधाने और रिझाने के लिए सपा नेतृत्व कहाँ तक जा सकता है इसे इस बात से समझा जा सकता है कि गत दिनों हुए मंत्रिमंडल विस्तार में सपा प्रमुख दिल्ली स्थित जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्ला बुखारी के दामाद जो कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव हार गए थे, को मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहा लेकिन पहले से ही नाराज चल रहे इमाम ने मना कर दिया। विधानसभा चुनाव में सपा ने वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर रंगनाथ मिश्र व सच्चर कमेटी की संस्तुतियों को लागू कराने के लिए केन्द्र सरकार पर दबाव बनाएगी लेकिन सपा ऐसा कर नहीं सकी है। एक वादा उसने जेल में बन्द बेकसूर मुसलमानों को रिहा कर देने का किया था लेकिन उसके इस प्रयास पर बीते माह अदालत ने पानी फेर दिया है।

                    उत्तर प्रदेश में मुसलमान 18 प्रतिशत से ज्यादा हैं और प्रदेश में डेढ़ दर्जन जिले ऐसे हैं जहाँ इनकी आबादी 20 प्रतिशत से अधिक है। यही कारण है कि प्रत्येक राजनीतिक दल इन्हें लुभाने की कोशिश करता रहता है। सपा को इस बार उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव में किए गए वादों और उनको पूरा करने की कोशिशों के चलते मुस्लिम मतों का लाभ उसे लोकसभा चुनावों में मिलेगा लेकिन अब उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के समक्ष वोट देते समय लक्ष्य यह होगा कि कैसे मोदी को दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होने से रोका जाय और यही सोच देश भर के मुसलमानों की होगी। जब तक कोई असरदार तीसरा मोर्चा नहीं बनता तब तक मोदी को रोकने की उम्मीद सिर्फ काँग्रेस से ही की जा सकती है। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में तो मोदी या भाजपा को रोकने में सक्षम कही जा सकती है लेकिन यही काम वह केन्द्र में नहीं कर सकती। उसकी राह में पीस पार्टी जैसे वोट-कटवा भी रोडा हैं जो मुस्लिम मतों में अवश्य सेंधा लगाएंगी। ऐसे में कॉग्रेस मुस्लिम मतों का लाभ ले सकती है बशर्ते वह पिछले चुनावों में मुसलमानों से किए गए अपने वादों को अमली जामा पहनाने की शुरुआत करे। इन वादों में बहुप्रतीक्षित रंगनाथ मिश्र आयोग तथा सच्चर कमेटी की सिफारिशों का त्वरित क्रियान्वयन है। चुनाव आने तक अगर राजनीतिक जोड़-तोड़ में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन न हुआ तो केन्द्र के लिए काँग्रेस मुसलमानों की पसंद हो सकती है। श्री नरेन्द्र मोदी भाजपा के पक्ष में कथित हिन्दू मतदाताओं को लामबंद कर पाते हैं या नहीं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन यह तो तय है कि उनका प्रधानमंत्री पद का दावेदार होना कई अन्य वर्गों को जरुर लामबंद कर देगा।

? सुनील अमर