संस्करण: 19 अगस्त-2013

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपराधीकरण

दलित लेखक कंवल भारती पर लगे कब वापस होंगे ?

? सुभाष गाताड़े

        नागरिक अवज्ञा हमारी समस्या नहीं है। हमारी समस्या है नागरिक आज्ञाकारिता/हुक्मबरदारी। हमारी समस्या है दुनिया भर के तमाम लोगों द्वारा अपनी सरकारों के नेताओं के निर्देशों पर किया गया अमल,उनके आदेशों पर किए गए युध्द और इसी आज्ञाकारिता के कारण मारे गए करोड़ो लोग। हमारी समस्या है कि गरीबी,भूखमरी, युध्द और बर्बरता के समक्ष आज्ञाकारी बने दुनिया भर के लोग। हमारी समस्या है कि आज जबकि दुनियाभर के कारागार मामूली चोरों से भरे हैं और जबकि बड़े चोर मुल्क को चला रहे हैं और लूट रहे हैं,फिर भी लोग आज्ञाकारी बने हुए हैं।

             - हावर्ड जिन (प्रख्यात अमेरिकी लेखक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता)

         अपनी बेबाक कलम के लिए हिन्दी जगत में अपनी अलग पहचान बनाए चर्चित दलित लेखक एवं कई पुस्तकों के रचयिता जनाब कंवल भारती ने शायद सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक रात पहले फेसबुक पर उन्होंने राज्य में सरगर्म एक मसले पर की गयी टिप्पणी के चलते रातों रात उनके खिलाफ दो समुदायों में वैमनस्य बढ़ाने जैसी खतरनाक धाराओं के साथ मुकदमा दर्ज हो जाएगा और अलसुबह उन्हें पुलिस के जवान अपने घर से एक दुर्दान्त अपराधी की तरह उठा ले जाएंगे, यहां तक कि उन्हें घर के कपड़े बदलने का भी अवसर नहीं दिया जाएगा।

               इसे गनीमत समझा जाएगा कि जिस जज के सामने जनाब भारती को हाजिर किया गया उसकी सूझबूझ के चलते उन्हें तत्काल जमानत मिल गयी जिसने फेसबुक पर की गयी टिप्पणी को लेकर दर्ज मुकदमे पर ही सवाल उठा दिया। मुमकिन है कि इस गिरफ्तारी को लेकर जो व्यापक जनाक्रोश पैदा हुआ उसके दबाव ने भी अपना काम किया हो। याद रहे कि बालू माफिया द्वारा किए जा रहे अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सूर्खियों में आयी दुर्गा शक्ति नागपाल नामक एसडीएम को निलम्बित करने के मामले के फिलवक्त फजीहत झेल रही अखिलेश यादव के नेतृत्ववाली अखिलेश यादव की सरकार ने सुश्री नागपाल को कादलपुर नामक गांव में निर्माधीन अवैध मस्जिद की दीवार कथित तौर पर बिना उचित कार्रवाई के गिरा कर साम्प्रदायिक वैमनस्य वाला कदम उठाने के नाम पर निलम्बित किया गया था। इस मसले पर न केवल आई ए एस लॉबी ने अखिलेश सरकार का विरोध किया बल्कि जनता के अन्दर भी जबरदस्त विरोध खड़ा हुआ। जनाब भारती की टिप्पणी इसी मसले पर थी, जिसमें उन्होंने कुछ अन्य घटनाओं का जिक्र कर बताया था कि किस तरह उनके गृहजिले में अल्पसंख्यकों के दो शिक्षासंस्थान रातोरात तबाह कर दिए गए, संचालकों को जेल में भेजा गया, मगर कहीं चूं तक नहीं हुई, न किसी का निलम्बन हुआ, न किसी की बर्खास्तगी हुई।

               मालूम हो कि फेसबुक पर की गयी टिप्पणी को लेकर खतरनाक धाराओं में गिरफ्तारी का यह पहला मौका नहीं है। पिछले ही साल शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद, दो लड़कियों द्वारा अपने फेसबुक पर की गयी टिप्पणी को लेकर उन्हें किस तरह पुलिस ने उठा लिया था या एअर इंडिया के दो कर्मचारी नेताओं को प्रबन्धन के मनमाने रवैये के खिलाफ इसी तरह सोशल नेटवर्क पर लिखने के लिए कितने दिन जेल की सलाखों के पीछे गुजारने पड़े थे, इस घटना से सभी वाकीफ है। बंगाल में प्रोफेसर अम्बिकेश महापात्रा एवं उनके सहयोगी को मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी को लेकर शेअर किए किसी कार्टून के चलते भी इसी तरह प्रताडित होना पड़ा था।

               अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब आंध्र प्रदेश के पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज की अध्यक्ष एवं जानीमानी नागरिक अधिकार कर्मी जया विन्धयाला को इसी तरह पुलिस ने हैद्राबाद स्थित अपने घर से गिरफ्तार किया था और उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66(ए) और भारतीय दण्ड विधान की धारा 120 (बी) के अन्तर्गत जेल में डाला गया था। जया का 'अपराध' बताया गया कि उन्होंने चिराला के विधायक आमंची कृष्ण मोहन और उनके 'संरक्षक' कहे जाने वाले तमिलनाडु के गवर्नर के रोसैया के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी डाली थी। किस तरह मुद्रित सामग्री एवं फेसबुक पर प्रकाशित सामग्री में सरकारें भी खुल्लमखुल्ला भेदभाव करती है, यह इस बात से भी पता चलता है कि जब सुश्री जया ने इस द्वयी के खिलाफ 'साक्षी' नामक अख़बार में सामग्री प्रकाशित की, तब उन्हें महज मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड़ा था। इण्टरनेट के जमाने में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक तरह से दो तरीके से अर्थापन न केवल भेदभावपूर्ण है और बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करता है। स्पष्ट है कि मुंबई की लड़कियों की गिरफ्तारी के खिलाफ उठे जनाक्रोश के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने जो सवाल उठाए थे,उनका किसी भी किस्म का असर विधायिका या कार्यपालिका पर नहीं दिखता। उन दिनों ही यह मांग उठी थी कि आई टी अधिनियम 66 (ए) को संशोधित किया जाए ताकि वह आइन्दा किसी निरपराध को प्रताडित करने का जरिया न बने, मगर बात धारी की धारी रह गयी। संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने जो आश्वासन दिया था कि आई टी अधिनियम का दुरूपयोग नहीं होने नहीं दिया जाएगा, उस पर अभी भी अमल होता नहीं दिखता। आईटी अधिनियम को उचित ठहराते हुए यह कहा गया था कि वह ब्रिटेन के धारा 127(1)(ए)पर आधारित है, मगर उपरोक्त कानून को देखें तो उसे मुक्त समाज के नियम, समग्र सन्दर्भ और अन्य सम्बधित कारको को शामिल करते हुए परिभाषित किया गया है, वही बात भारत के कानून में नहीं दिखती। ( देखें, 'द हिन्दू' मई 15, 2013)

               पिछले दिनों कंवल भारती प्रसंग पर दिल्ली के प्रेस क्लब में उपस्थित पत्रकारों, लेखक संगठनों के प्रतिनिधियों,सांस्कृतिक कर्मियों की भीड़ बता रही थी कि अभिव्यक्ति पर बन्दिशें लगाने की इस घटना से लोग कितने क्षुब्ध हैं। सभी ने एक सुर से उन पर लगे मुकदमों को वापस लेने की मांग की। सभा में आए एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने यह भी बताया कि जो धाराएं जनाब भारती पर लगायी गयी है,वह उन पर लागू नहीं होती ; इसमें न केवल वैमनस्य बढ़ाने का इरादा प्रमाणित करना होता है (153ए)और ऐसे लेखन से बढ़े साम्प्रदायिक तनाव को भी प्रमाणित करना होता है। उन्होंने यह भी बताया था कि किसी भी व्यक्ति को अपने घर के कपड़े में उठा ले जाना, पुलिस के खिलाफ प्रतिमुकदमे की वजह बनता है। इतना ही नहीं घर पर छापा डाल कर कम्प्युटर आदि जब्त करने के मसले पर भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

               सोशल नेटवर्क के प्रभाव का आए दिन गुणगान करनेवाले लोगों को इस दूसरे पहलू से भी सचेत रहना होगा कि किस तरह बदहवास हो चली हुकूमतें मामूली प्रतिरोध या असहमति के स्वर को भी बरदाश्त करने की स्थिति में नहीं होती। असहमति या प्रतिरोधा का अपराधीकरण अब विश्वव्यापी हो चला है।

              लन्दन से प्रकाशित 'गार्डियन' नामक अख़बार में पिछले दिनों मार्क वेले नामक चर्चित फोटोग्राफर ने लिखा था कि किस तरह आतंकवाद विरोधी कानून की धारा 44 के अन्तर्गत किसी फोटोग्राफर को भी सम्भावित आतंकवादी के तौर पर गिरतार किया जा सकता है। इस बात को रेखांकित करते हुए उन्होंने रेखांकित किया था कि सार्वजनिक स्थान पर फोटोग्राफी करना भी अब कितना जोखिम भरा काम हो गया है।

              इस अन्यायपूर्ण धारा का विरोध करने के लिए उन्होंने एक नायाब रास्ता भी चुना था। अपने लेख में उन्होंने आवाहन किया कि 23 जनवरी को वह दिन में ठीक 12 बजे लन्दन के ट्राफलगार चौराहे पर सैकड़ों अन्य फोटोग्राफर्स के साथ इकट्ठा होंगे ताकि सार्वजनिक स्थान पर फोटो खींचने के अपने जनतांत्रिक अधिकार पर अमल किया जा सके।

              'ए एम ए फोटोग्राफर नाट ए टेररिस्ट ! मास पिक्चर टेकिंग इवेन्ट' (मैं फोटोग्राफर हूं आतंकवादी नहीं ! सार्वजनिक स्थान पर फोटोग्राफी) शीर्षक उस अभियान में सैकड़ों लोग अपने कैमरों के साथ एकत्रिात हुए और उन्होंने विगत एक दशक से चली आ रही आतंकवादविरोधी कानून की धारा के खिलाफ अपने अनूठे सत्याग्रह को अंजाम दिया।

? सुभाष गाताड़े