संस्करण: 19 अगस्त-2013

ऐसा क्या कह दिया था कि रजा मुराद पर क्यों भड़के भाजपा के नेता

? एल.एस.हरदेनिया

                गता है अब भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के सदस्य सपने में भी नरेन्द्र मोदी की आलोचना सहन नहीं कर पाते हैं। ईद के दिन जानेमाने अभिनेता रजामुराद जो भोपाल के रहने वाले हैं, भोपाल की ईदगाह पर ईद की बधाईयां देने पहुंचे थे। ईद मिलन के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को किसी ने टोपी पहना दी और चौहान ने सहजता से उस टोपी को पहन लिया। उसी दरम्यान रजा मुराद ने यह कह डाला कि टोपी पहनने से धर्म नहीं बदलता, उनने यह भी कहा कि किसी को भी किसी की टोपी पहनने से इंकार नहीं करना चाहिए। विशेषकर उच्च पद पर बैठे लोगों को, क्योंकि उनकी जिम्मेदारी सभी को साथ ले चलने की है। पता नहीं जब रजा मुराद ने यह हल्की फुल्की टिप्पणी की तो उनके दिमाग में नरेन्द्र मोदी का नाम था या नहीं। यह स्पष्ट है कि उन्होंने नरेन्द्र मोदी का नाम नहीं लिया था। उनका इतना कहना था कि भाजपा के अनेक लोग भड़क उठे और तरह तरह की घटिया दर्जे की टिप्पणी रजा मुराद के बारे में कीं। टिप्पणी करने वालों में मध्यप्रदेश की भूतपूर्व मुख्यमंत्री साधवी उमा भारती भी शामिल हैं। उमा भारती ने अपने ट्वीट में लिखा कि शिवराज के बगल में खड़े सी-ग्रेड के एक्टर रजा मुराद ने मोदी की निन्दा की है। यह कैसे हो गया। ईद पर इतनी घटिया सियासत कैसे? ईद के दिन उमा भारती नागपुर में थीं। परन्तु उन्होंने तुरत-फुरत अपनी प्रतिक्रिया प्रगट कर दी। उन्होंने यह भी कह डाला कि सी-ग्रेड के एक्टर ने नरेन्द्र मोदी की बुराई की है। भारतीय जनता पार्टी की अधिकृत प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने भी घटिया दर्जे की टिप्पणी कर दी। उन्होंने मुराद को नामुराद कह दिया। मीनाक्षी ने कहा कि रजा मुराद फिल्मों में खलनायकी की भूमिका निभाते हैं परन्तु वे वास्तविक जिंदगी में भी वैसी बातें कर रहे हैं। उनका नाम मुराद है लेकिन वे नामुराद की तरह बातें कर रहे हैं। उन्हें मुरादाबाद के दंगे याद नहीं हैं। इस देश में कई दंगे हुए हैं, पर वे उसे नहीं देख सकते।

               इनके अलावा अनेक छोटे-बडे नेताओं ने आक्रोश भरी टिप्पणी की। आखिर इस तरह की प्रतिक्रिया क्यों हुई, उसकी एक पृष्ठभूमि है। कुछ दिनों पहले गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने एक सद्भावना मिशन चलाया था। इस मिशन के अंतर्गत वे गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों में गए थे। उद्देश्य था सद्भावना पैदा करना। उनके इसी सद्भावना मिशन के दौरान एक स्थान पर किसी मुस्लिम भाई ने उनके सिर पर एक ऐसी टोपी रखने का प्रयास किया जो साधारणत: मुसलमान पहनते हैं। मोदी ने उस टोपी को पहनने से इंकार कर दिया। मोदी के इस फैसले की सारे देश में निंदा हुई। और उस घटना से मोदी के सद्भावना मिशन में दरार पड़ गई। परन्तु रजा मुराद ने उस दिन तो उस घटना का जिक्र नहीं किया था। हो सकता है उन्हें गुजरात में घटित वह घटना याद आई हो और इससे उन्होंने टोपी का जिक्र कर दिया हो। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट होती है कि संघ परिवार दूसरे धार्मों के मानने वालों के साथ सहअस्तित्व नहीं कर सकता है। इसके पीछे उनका एक राजनीतिक दर्शन भी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सबसे बड़े मुखिया गुरू गोलवलकर हैं। उनकी यह मान्यता है कि भारतवर्ष में रहने का अधिकार सिर्फ हिन्दुओं को है। अल्पसंख्यक रह तो सकते हैं परन्तु दोयम दर्जे के नागरिक की हैसियत से जिन्हें किसी भी प्रकार का अधिकार प्राप्त नहीं होगा। संघ परिवार वीर सावरकर को अत्यधिक श्रृध्दा की दृष्टि से देखता है। वीर सावरकर ने 1923 के आसपास यह कहा था कि भारतवर्ष में वही रह सकता है जिसकी जन्मभूमि के साथ-साथ जिसकी पुण्यभूमि भी भारत में हो। पुण्यभूमि से उनका आशय उन धर्मों से था जो भारतवर्ष में ही पैदा हुए थे। अर्थात भारतवर्ष में हिन्दू (सनातन धर्म को मानने वाले), बुध्दिस्ट, जैनी एवं सिक्ख ही रह सकते हैं। अर्थात इन चार धर्मों के मानने वालों के अतिरिक्त अन्य धर्मों के मानने वाले भारत में रहने के लिए अधिकृत नहीं हैं। यहां यह स्मरणीय है कि भारतवर्ष सिर्फ इन चार धर्मों के मानने वालों का देश है। यह बात जब कही गई होगी तो स्वभावत: अल्पसंख्यक मुस्लिम और ईसाईयों के मन में यह शंका उत्पन्न हुई होगी कि आजाद भारत में उनका क्या स्थान होगा। शायद इसी शंका ने पाकिस्तान को जन्म दिया होगा। जिस समय सावरकर ने अपनी बात कही थी उस समय तक स्वयं जिन्ना कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से थे। उन्हें प्रसिध्द स्वतंत्रता संग्राम सैनानी एवं कवियत्री सरोजनी नायडू ने हिन्दू मुस्लिम एकता का राजदूत कहा था। स्पष्ट है कि जब सावरकर और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा प्रचारित विचार जड़ पकड़ता गया उसके साथ ही साथ मुसलमानों के लिए पृथक राष्ट्र की कल्पना प्रारंभ हो गई। यद्यपि बाद की घटनाओं ने यह बता दिया है कि पाकिस्तान के बनने से मुसलमानों का रत्तीभर लाभ नहीं हुआ है। आज जो पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति है जिसमें शिया सुन्नी विवाद को लेकर रोज कत्लेआम हो रहे हैं वह इस बात का प्रतीक है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि यदि वीर सावरकर के विचार और संघ परिवार द्वारा प्रचारित सिध्दांत प्रस्थापित नहीं किये जाते तो आज भी भारतवर्ष एक होता।

               नरेन्द्र मोदी सच्चे अर्थों में वीर सावरकर और गुरू गोलवलकर के चेले हैं। उन्होंने गुजरात के भीतर ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दी हैं जिनमें गुजरात के मुसलमान यथार्थ में दोयम दर्जे के नागरिक का जीवन बिता रहे है। 2002 के कत्लेआम के बाद जो स्थितियां वहां निर्मित हुई थीं उनमें आज ज्यादा अंतर नहीं आया है। मैंने स्वयं अहमदाबाद और गुजरात के कुछ क्षेत्रों में देखा है कि वहां मुसलमान बस्तियों में कहीं सड़कें नहीं हैं, कहीं सड़कों पर प्रकाश की व्यवस्था नहीं हैं, कहीं बैंक नहीं हैं, कई स्थानों पर बसें भी नहीं पहुंचती। इस तरह की अनेक कठिनाइयों का सामना उन्हें करना पड़ता है।

               भारतीय जनता पार्टी और उनके नेता संघ परिवार के स्वयंसेवक तहेदिल से यह मानते हैं कि किसी और धर्म की प्रतीकात्मक टोपी को पहनने से उनकी आस्था पर चोट हो सकती है। इसी तरह के विचार को आगे बढ़ाते हुए उनकी यह भी मान्यता है कि धर्म परिवर्तन से देश के प्रति वफादारी में भी परिवर्तन हो जाता है। शायद उनका यह विचार है कि सिर्फ हिन्दू ही इस देश के प्रति वफादार हो सकते हैं। इसलिए भाजपा शासित राज्यों में इस तरह के कानून पारित किए गए हैं जिनसे धर्म परिवर्तन ज्यादा से ज्यादा कठिन बनाया जाए। मध्यप्रदेश में भी अभी हाल में ऐसा विधोयक पारित किया गया है। इस विधोयक के अनुसार धर्म परिवर्तन के लिए कलेक्टर की इजाजत अनिवार्य है। परन्तु संघ परिवार के चिंतक इस बात को भूल जाते हैं कि धर्म सभ्यता के किसी भी दौर में राष्ट्र के प्रति वफादारी का आधार  नहीं रहा है। यदि ऐसा होता तो ईराक और ईरान जो दोनों मुस्लिम राष्ट्र हैं उनके बीच में 10 वर्ष तक युध्द नहीं होता। यदि ऐसा होता तो हिटलर और चर्चिल के बीच में युध्द नहीं होता। हिटलर भी ईसाई था और चर्चिल भी ईसाई थे। इसके साथ ही यूरोप के अनेक देश जहां बहुसंख्यक ईसाई रहते थे अनेक वर्षों तक आपस में लड़े हैं। यदि धर्म ही देशभक्ति का आधार होता तो पाकिस्तान के दो टुकड़े नहीं होते। बंगलादेश के मुसलमानों ने इसलिए पाकिस्तान से पृथक होने का फैसला किया क्योंकि उनके ऊपर जबरदस्ती उर्दू थोपी जा रही थी। बंगलादेश के मुसलमानों ने कहा कि हमें इस्लाम से ज्यादा बंगला भाषा से मोहब्बत है और हम अपनी भाषा का अपमान नहीं सह सकते। बंगलादेश के मुसलमानों को अपने भाषा प्रेम के खातिर बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। पाकिस्तान के शासकों ने बंगलादेश के नागरिकों के साथ दरिंदगी की सीमाओं को पार करके उन्हें सताया। परन्तु उनकी जादतियां और जुल्म बंगलादेश के नागरिकों और उनके सबसे बड़े नेता मुजिबुर्रहमान को घुटने टेकने के लिए मजबूर नहीं किया जा सका।  

? एल.एस.हरदेनिया