संस्करण: 19 अगस्त-2013

संशोधित विवाह-कानून क्या स्त्री को सशक्त बनायेगा ?

संदर्भ : सरकार द्वारा प्रस्तावित विवाह (संशोधन) विधेयक

? डॉ. गीता गुप्त

         भारत में विवाह और तलाक संबंधी कानूनों में सुधार की कवायद लम्बे समय से चल रही है। इसके पीछे एक ही उद्देश्य दर्शाया जाता है और वह है-स्त्री के हितों की रक्षा। वैसे तो विवाहित स्त्री अपने पति और पिता,दोनों की सम्पत्ति में अधिकार रखती है परन्तु व्यवहार में इसकी विसंगति या कमी तब उजागर होती है जब उसका वैवाहिक जीवन ठीक पटरी पर नहीं चलता अथवा विवाह विच्छेद हो जाता है। यद्यपि उसे तलाब के बाद कानूनन पति से अपने और अपने बच्चों के भरण-पोषण हेतु प्रति माह एक निश्चित राशि प्राप्त होती है तथापि उसके सिर पर छत की समस्या तो बनी रहती है। प्राय:विवाह-संबंध टूटने पर माता-पिता भी तलाकशुदा बेटी को आश्रय नहीं देते। यह समस्या तब बहुत जटिल हो जाती है, जब वह स्त्री कामकाजी या नौकरीपेशा नहीं होती। आखिर ऐसी स्त्रियों को कैसे राहत पहुंचायी जाए,सरकार की इसी चिन्ता ने एक ऐसा विधेयक हमारे सामने प्रस्तुत किया है जिसके अनुसार स्त्री पति की पैतृक सम्पत्ति या विरासत में मिलने वाली सम्पत्ति में भी हिस्सा प्राप्त कर सकेगी।

                हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमण्डल ने एक ऐसे विधयक को स्वीकृति  दी है जिसके तहत विवाह-विच्छेद की स्थिति में महिला को पति की विरासत में मिली या मिलने वाली सम्पत्ति में भी अधिकार प्राप्त होगा। सम्पत्ति की मात्रा का निर्णय न्यायालय के विवेकाधीन होगा। विरासत में मिलने वाली ऐसी सम्पत्ति,जिसका विभाजन संभव नहीं है,उसमें दोनों पक्षों की स्थिति को धयान में रखते हुए महिला को समुचित मुआवजा दिलवाने का निर्णय भी न्यायालय करेगा। मतलब यह कि प्रस्तावित विवाह कानून (संशोधन)विधेयक में बहुत कुछ न्यायालय की इच्छा पर निर्भर करेगा। यहां तक कि परस्पर सहमति से तलाक चाहने वाले दम्पत्तियों के लिए छ:महीने की प्रतीक्षा अवधि को भी वह चाहे तो समाप्त कर सकती है।

                आज अधिकतर मामलों में हम देखते हैं कि तलाक के बाद स्त्री का जीवन बहुत संघर्षमय हो जाता है। निम्न वर्ग की स्त्रियां प्राय:पुनर्विवाह कर समस्या मुक्त हो जाती है। उच्च वर्ग की स्त्रियां आर्थिक तौर पर सक्षम होती हैं और तलाक के समय भी एकमुश्त अच्छी खासी रकम वसूल लेती हैं। समस्या आती है मध्यम और निम्न मध्य वर्गीय स्त्रियों के सामने,जो विवाह टूटने पर माता-पिता और पति-दोनों के घरों में न केवल आश्रय से वंचित कर दी जाती है,बल्कि सम्पत्ति के अधिकारिणी होते हुए भी अपना हिस्सा नहीं ले पातीं। इसके मूल में कई कारण हैं। प्रमुख कारण यही है कि माता-पिता पुत्री के पालन-पोषण,शिक्षा-दीक्षा और फिर विवाह में भी अपनी सामर्थ्य से अधिक व्यय करने के लिए विवश होते हैं। अतएव विवाहोपरान्त पुत्री को सम्पत्ति में हिस्सा देना सहर्ष स्वीकार नहीं कर पाते। वे मानते हैं कि ब्याहता को पति की सम्पत्ति में अधिकार मिलना ही पर्याप्त है। दूसरे, हमारे समाज की मानसिकता भी विवाह के बाद पिता की सम्पत्ति में स्त्री की भागीदारी की पैरोकार नहीं है।

               निस्संदेह, समस्या जटिल है। सरकार द्वारा प्रस्तावित विधेयक के पक्ष और विपक्ष में तर्क-वितर्क आरंभ हो गए हैं। जो पक्षधार हैं, उनका मानना है कि वर्तमान में तलाकशुदा स्त्रियों को पर्याप्त निर्वाह भत्ता नहीं मिल पाता। जबकि बच्चों की सारी जिम्मेदारी उन्हें ही उठानी पड़ती है। हालांकि उन्हें अपने पिता की जायदाद में भी हिस्सा लेने का हक है परन्तु व्यवहार में यह मिल नहीं पाता। ऐसे में यदि उन्हें पति को विरासत में मिली या मिलने वाली सम्पत्ति में से हिस्सा मिलता है तो उनकी बड़ी आर्थिक सहायता हो पाएगी। यह सहायता उन्हें न केवल आर्थिक दृष्टि से सशक्त बनाएगी बल्कि भविष्य की चिंताओं से भी उबरने में सहायक होगी। इस विधेयक के विरोधियों का तर्क है कि इससे तलाक और समत्ति के बंटवारे का मामला बहुत विवादग्रस्त हो जाएगा। यही नहीं, यदि इस विधेयक ने कानून का रूप ले लिया तो महिलाएं इसका दुरुपयोग भी दहेज-कानून और महिला हिंसा कानून की तरह ही करेंगी। अगली आशंका यह कि तलाक के बाद पत्नी को अपनी और विरासत में मिली सम्पदा में से हिस्सा न देना पड़े, इसके लिए पुरुष गलत हथकण्डे अपना सकते हैं। अत: स्त्री की जान को जोखिम हो सकता है। और यह भी कि अपनी पैतृक सम्पत्ति पाकर सम्पन्न हो जाने पर भी अपनी पति की पैतृक सम्पत्ति में दावा करने वाली तलाकशुदा महिला का यह कदम आर्थिक दृष्टि से कमजोर पतियों के लिए बहुत त्रासद होगा। क्योंकि उसपर स्त्री और बच्चों के गुजारा भत्ते का भार भी होगा और अपनी सम्पत्ति से भी हाथ धोना पड़ेगा।

               ग़ौरतलब है कि ब्रिटेन सहित विकसित राष्ट्रों में विवाह-विच्छेद होने पर स्त्री को केवल उस सम्पत्ति में से हिस्सा मिलता है, जो विवाह के बाद उसके पति ने अर्जित की हो। भारत में प्रस्तावित उपर्युक्त विधेयक ने तलाक के मामले को उलझा दिया है। विधेयक का स्वागत करने के बावजूद महिला संगठनों का मानना है कि 'स्त्री को मिलने वाली सम्पत्ति 50 प्रतिशत या जितनी भी हो, कानून में उसका उल्लेख विवादों से बचने के लिए आवश्यक है। इसका निर्णय न्यायालय के विवेक पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए क्योंकि इससे स्त्री के हित प्रभावित हो सकते हैं।'

                मगर धयान रहे कि न्यायालय और सरकार स्त्री हितों की अवहेलना  नहीं करते और करना भी नहीं चाहिए। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला देते हुए कहा था कि तलाक के बाद भी स्त्री अपने पति के ही घर में रह सकती है और गुजारा भत्ता भी प्राप्त कर सकती है। घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के लागू होने से पहले के मामलों में भी नये कानून के तहत सुरक्षा के प्रावधानों का लाभ महिलाओं को दिया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, पति अपनी पत्नी को अपने निवास का एक हिस्सा दे, जिसमें वह सभी जरूरी सुविधाओं का लाभ उठा सके। उस हिस्से को उचित तरीके से फर्निश्ड होना चाहिए ताकि पत्नी सम्मान सहित साझा घर में रह सके। वी.डी. भनोत और सविता भनोत की शादी 23 अगस्त 1980 को हुई थी। कुछ मतभेदों के कारण दोनों जुलाई 2005 में अलग हो गए थे। 29 नवम्बर 2006 को सविता ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत महिलाओं को प्राप्त सुरक्षा के अधिकार की मांग की थी। तब यह निर्णय सामने आया। निश्चय ही स्त्रियों के लिए यह राहत की बात है।

                 विचारणीय है कि भारत का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य तेज़ी से बदल रहा है। स्त्रियों के जीवन में भी बहुत बदलाव आये हैं। वे पहले की तरह दुर्बल और असहाय नहीं है। सरकारी योजनाओं और शिक्षा ने भी उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से सशक्त बनाया है। यह भी सच है कि तलाक के मामले में केवल स्त्री ही पीड़ित नहीं होती, पुरुष भी उत्पीड़ित रहते हैं। लेकिन कानून एकांगी है इसलिए पुरुष को ही उत्पीड़क मान लिया जाता है जोकि गलत है। दाम्पत्य जीवन पूरी तरह स्त्री-पुरुष के बीच परस्पर आदर-सम्मान, विश्वास, प्रेम, निष्ठा, समर्पण, गहरी संवेदना,उत्तरदायित्व की भावना और सामंजस्य पर अवलंबित होता है। इसमें सारे अधिकार और कर्तव्य कानून तय नहीं कर सकता। यह दम्पत्तियों की सर्वथा निजी अवधारणा भी हो सकती है जो उन्हें एक सूत्र में बांध रखती है। इसे नकारा नहीं जा सकता।

               मगर यह भी सत्य है कि दाम्पत्य में दरार आ रही है, घर परिवार टूट रहे हैं। इसे बचाने की चिन्ता किसी को नहीं है। उल्टे,न्यायालय और सरकार से गुहार की जा रही है कि ऐसे कानून बनाये जायें ताकि आसानी से विवाह-संबंध तोड़े जा सकें और स्त्री के आर्थिक हित प्रभावित न हों। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सभी सामाजिक संगठनों और आयोगों सहित सरकार को ऐसे प्रयास करने चाहिए कि स्त्रियां आर्थिक दृष्टि से मजबूत हों लेकिन परिवार का स्वरूप खण्डित न हो। न्यायालयों को भी चाहिए कि वे एकांगी निर्णय न दें। वे परिवारों को तोड़ने की बजाय जोड़ने वाले निर्णयों और कानूनों में रूचि लें ताकि वैवाहिक जीवन किसी के भी लिए अभिशाप न बन जाए।

? डॉ. गीता गुप्त