संस्करण: 19 अगस्त-2013

मानसिकता बदले तो

रूकेगी महिला हिंसा

? अमिताभ पाण्डेय

                हिलाओं के साथ होने वाली अपराधिक घटनाओं को रोकने के लिए सरकारी और सामाजिक स्तर पर जो प्रक्रिया चलाई जा रही हैं,वे अब तक हिसां को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं कर पाई हैं। इसका नतीजा यह है कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराध का प्रतिशत बढ रहा है। देश-विदेश-प्रदेश से लेकर गॉव-शहर, गली-मुहल्ले तक में महिलाओं के साथ हो रही हिंसा बताती है कि अपराधी मानसिकता के पुरूष उनकों आसान शिकार समझते हैं। एकांत हो या भीड भरे इलाके महिलाओं के साथ कभी भी ,कुछ भी घटना हो सकती है। महिलाओं के साथ होने वाली शारीरिक-मानसिक उत्पीडन की घटनाओं का विश्लेषण करने वाले यह मानते हैं कि जिस तेजी से महिलाओं सम्बन्धी अपराध बढे हैं उसकी तुलना में ऐसे अपराध के आरोपियों को मिलने वाली सजा में कमी आई हैं। मतलब यह कि महिला हिंसा-उत्पीडन के आरोपी या तो आरोपमुक्त,बाईज्जत बरी हो गये अथवा न्याय की प्रक्रिया इतनी लम्बी हुई कि पीडित महिला ने खुद ही अपनी हार मान ली। ऐसे कई मामले है जिनके निर्णायक निष्कर्ष यह बताते हैं कि औरतों के लिए न्याय तक पहुॅच पाना आज भी आसान नहीं है। आजादी के 66वर्ष बीत गये परन्तु संविधान के अनुसारसभी महिलाओं को स्वतंत्रता,सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल सकी। अनेक महिलाएं भय,शोषण,अन्याय के माहौल में अपना जीवन बिताने पर मजबूर हैं। एक जानकारी के मुताबिक देश में प्रतिदिन लगभग 17 हजार महिलाएं किसी न किसी प्रकार से हिसां का शिकार होती हैं। कम से कम 4 महिलाओं को देश के किसी भाग में दुष्कृत्य की  जानलेवा पीडा से गुजरना पडता है। महिला हिंसा के मामले जिन राज्यों में सर्वाधिक सामने आ रहे हैं उनमें मधयप्रदेश का नाम प्रमुख है।

                अधिकारिक आंकडे बताते हैं कि वर्ष 2011 में मध्यप्रदेश में दुष्कृत्य के 3 हजार 406 मामले पंजीबध्द किये गये जो कि देश में घटी इस प्रकार की घटनाओं का 14प्रतिशत है। मध्यप्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा की तमाम योजनाएॅ और उन पर खर्च की जा रही बडी रकम भी प्रतिदिन 9 महिलाओं को दुष्कृत्य का शिकार होने से नहीं रोक पाई। बालिकाओं के यौन उत्पीडन के आंकडे भी मध्यप्रदेश के लिए शर्मनाक हैं। वर्ष 2011 में 1 हजार 262 बच्चों के साथ दुष्कृत्य के मामले पंजीबध्द किये गये। जिन बच्चों या बच्चियों को यौन उत्पीडन की पीडा से गुजरना पडा उनमें  65 प्रतिशत मामलों में तो आरोपी घर,परिवार,जान-पहचान वाले लोग ही थें। मतलब यह कि महिलाओं ,बच्चों, बालिकाओं के लिए अब घर परिवार में भी खतरा बढ गया है। ऐसी  अपराधिक मानसिकता के बीच बच्चे ,महिलाएं कहॉ ? कैसे ? सुरक्षित-हिसांमुक्त जीवन बिता सके ? यह बडा सवाल है।

               प्रसगंवश बताना होगा कि मध्यप्रदेश में कुल जनसंख्या का 66 प्रतिशत भाग दलित,पिछडा,आदिवासी समुदाय से मिलकर बना है। दुखद बात यह है कि इस वर्ग की महिलाएं उत्पीडन करने वालों के लिए सबसे आसान निशाना बन गई हैं। वे डरा धमकाकर अथवा किसी झूठे प्रलोभन के माध्यम से इस वर्ग की महिलाओं को अपनी मनमानी का शिकार बना लेते हैं। देश में आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाली दुष्कृत्य की घटनाओं में सर्वाधिक  9 प्रतिशत घटनाएं मध्यप्रदेश में ही पंजीबध्द की गई। इसी प्रकार छेडछाड और अन्य किसी भी प्रकार से उत्पीडन के कुल 6हजार 665से अधिक मामले यह जाहिर करते हैं कि मध्यप्रदेश इस अपराध में भी देश के अन्य राज्यों से आगे है जहॉ प्रतिदिन 18लडकियों महिलाओं को किसी न किसी प्रकार की छेडछाड बर्दाश्त करना पडती है। उल्लेखनीय है कि भोपाल के एक एफ एम रेडियो से जुडी रेडियो जाकी ने कुछ माह पहले अपने श्रोताओं से यह जानना चाहा था कि ऐसी कितनी लडकियॉ,महिलाएं है जिनके साथ कभी  किसी भी प्रकार की छेडछाड अथवा अभद्रता, भाषा या व्यवहार के द्वारा नहीं की गई ? इस सवाल के जवाब में किसी लडकी या महिला ने यह नहीं कहा कि उसके साथ ऐसी कोई घटना कभी नहीं हुई। सीधी सी बात है कि हमारे समाज का वातावरण कुछ ऐसा है कि लडकियों,महिलाओं साथ होने वाली हल्की फुल्की छेडछाड या अभद्रता को नजरअदांज कर दिया जाता है। माहौल ऐसा बनाया गया कि लडकी,महिला को थोडा मान अपमान तो सहन करना ही होगा। यदि सबको पलटकर जवाब देने लगी तो उसे रोज अपराधिक मानसिकता के लोगों से दो-दो हाथ करना होगें। शायद यही कारण है कि उसे बचपन से ही सहनशीलता का पाठ पढाया जाता है। यदि बचपन से ही बेटियों को छेडछाड,अभद्र व्यवहार का तत्काल जोरदार जवाब देना सिखाया जाये तो अपराधिक मानसिकता को बढने से रोका जा सकता है।

                महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा की रोकथाम और हिंसा की शिकार महिलाओं को त्वरित न्याय मिले इस मुद्दे पर हाल विचार विमर्श के लिए हाल ही में एक सेमिनार भोपाल में आयोजित किया गया। सेमिनार में उत्तरप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली, राजस्थान से आये नारीवादी संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस बात पर चिंता जताई कि महिलाओं के लिए घर बाहर,कार्यस्थल पर सुरक्षा के पक्के इंतजाम आज तक नहीं हो पाये हैं। महिला हिंसा के जिम्मेदार अपराधी तत्वों में कानून का डर खत्म होता जा रहा है। केवल दलित,पिछडी और वंचित वर्ग की नहीं बल्कि उच्च वर्ग ,सम्पन्न घराने की महिलाएं भी शारीरिक-मानसिक प्रताडना, का शिकार हो रही हैं। महिलाओं के प्रति बढती हिंसा की घटनाओं ने बच्चों के मन पर भी भय और आतंक की ऐसी छाप छोडी है कि बच्चे कई बार बातों में, चित्रों में , अपने इस भय को व्यक्त करते हैं। उनके मन में भी ऐसी घटनाओं के कारण डर बैठ गया है। सेमिनार में सामाजिक संस्था एक्शन एड से जुडी सारिका सिन्हा,शिवानी सैनी, अनामिका राय,जागोरी संस्था की आभा भैया,गीता, महिला मुद्दों पर काम करने वाली पूनम कथूरिया,मनीषा देसाई, हंगर प्रोजक्ट से जुडी बेला,शिवानी शर्मा,स्वाति,सफिया खान के साथ ही योगेश दीवान,आनंद पवॉर,बृजमोहन,ने भी यह माना कि हिंसा की शिकार महिलाओं को त्वरित और पूर्ण न्याय नहीं मिल पा रहा है। महिलाएं सामाजिक न्याय के मामले में भेदभाव की शिकार हो रही है। महिलाओं का न्याय प्रणाली पर भरोसा कम होता जा रहा हैं। ऐसे माहौल में महिलाओं के लिए न्यायसंगत दुनिया की परिकल्पना कैसे साकार होगी? सेमिनार के दौरान महिला हिसां रोकने के लिए काम कर रहे संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि महिलाओं के प्रति समाज में संवेदनशीलता बढाने और अपराधिक मानसिकता को सख्ती से खत्म करने की जरूरत है। अपराधियों को बिना किसी दबाव-प्रभाव के ऐसी कडी सजा मिले जो कि सबके लिए उदाहरण बन सके। ऐसा करने के लिए महिलाओं और उनके सम्मान,सुरक्षा के पक्षधार पुरूषों को एकजुटता के साथ साझा प्रयास करने होगें। इस बारे में यह रणनीति बनाई गई कि आगामी 14 फरवरी 2014 को दुनियाभर में महिलाएं समाज में सुरक्षा,समानता और न्याय का नारा बुलन्द करेगीं। दुनिया के हर देश,प्रदेश,गॉव शहर की महिलाएं 14 फरवरी 2014 को उन सभी संस्थाओं के सामने एकत्र होकर प्रदर्शन करेगीं जहां से न्याय मिलने की उम्मीद की जाती है। ऐसे प्रदर्शन विदेशी दूतावास,महिलाओं से सम्बन्धिात शासकीय विभागों,न्यायालयों,पुलिस थानों के सामने किये जायेगें जहॉ महिलाओं के मामले सुनवाई के लिए आते हैं। दुनिया की सौ करोड़ से अधिक महिलाओं द्वारा अपने अपने क्षेत्र में किये जाने वाले इस प्रदर्शन को 'न्याय के लिए उमडते सौ करोड'  अभियान का नाम दिया गया है। महिला मुद्दों को लेकर दुनिया के अलग अलग देशों में काम करने वाले संगठनों को यह विश्वास है कि महिला हिंसा के विरोध में न्याय के लिए उमडते सौ करोड अभियान को देश विदेश की महिलाओं के साथ ही बडी संख्या में पुरूषों का भी समर्थन मिलेगा। महिला हिंसा की पूरी तरह से रोकथाम हो और पीडित महिलाओं को त्वरित न्याय मिले तभी हिंसामुक्त न्याययुक्त समाज की अवधारण साकार हो सकेगी।

? अमिताभ पाण्डेय

(लेखक महिला सशक्तिकरण सम्बन्धी मुद्दों के स्वतंत्र पत्रकार हैं। )