संस्करण: 19जनवरी-2009

'भूमंडलीकरण एवं भारत की प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था'

 

स्वाति शर्मा

किसी भी देश के सर्वांगीण विकास के लिए यह आवश्यक है कि देश में पर्याप्त मात्रा में मानव संसाधन उपलब्ध हों जो प्रकृति प्रदत्त संसाधनों का समुचित प्रयोग कर सकें। मानव संसाधन के विकास में सर्वप्रमुख स्थान शिक्षा का है। उचित शिक्षा के अभाव में विशाल जनसंख्या वाले देश में भी उचित दक्षता प्राप्त मानव संसाधन की कमी महसूस की जा सकती है। सरकार की ओर से समय-समय पर देश में प्राथमिक शिक्षा का स्तर बढ़ाने तथा शिक्षा के प्रचार-प्रसार हेतु प्रयास किए जाते रहे हैं। परंतु कार्यक्रम गत कुछ कमियों के कारण ये अपने लक्ष्यों को पाने में प्राय: विफल ही रहे हैं। यद्यपि शिक्षा के क्षेत्र में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के वर्षों में निश्चित रूप से प्राप्ति हुई है, आज साक्षरता दर बहुत बढ़ चुकी है लेकिन निरक्षरों की वास्तविक संख्या आज भी कम नहीं है। इनमें भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़ा वर्ग एवं महिलाओं की संख्या अधिक है।

शिक्षा क्षेत्र के विकास के आंकड़े तब धूमिल लगने लगते हैं जब हम पाते हैं कि देश के 5-14 आयु वर्ग के लगभग 22 करोड़ बच्चों में मात्र 15 करोड़ ही विद्यालयों में नामांकित हैं। इनमें भी बालिकाओं का नामांकन बालकों से कम है। गरीब व पिछड़े वर्ग के बच्चे अभी भी स्वयं को शिक्षा से वंचित रखते हुए घर-परिवार के कार्यों में हाथ बंटाने को विवश हैं। गरीबी व भुखमरी की समस्या इन्हें विद्यालय जाने से रोके हुए है।

वर्तमान उदारीकरण के युग में शिक्षा की विस्तार शहरी क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक व्यापक व तीव्र गति से हुआ है। साथ ही देश में शिक्षा के विस्तार के अनुपात में ही शिक्षा-स्तर व उसकी गुणवत्ता के मध्य खाई बढ़ी है। शहरों में जहां पब्लिक एवं कान्वेंट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे प्राथमिक स्तर पर ही आधुनिक सूचना व संचार माधयमों द्वारा शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, वहीं देश नौनिहालों का एक विशाल भाग आज भी इन सबसे वंचित है। विभिन्न राज्यों की माध्यमिक शिक्षा परिषदों, सी.बी.एस.ई. भारतीय   माध्यमिक शिक्षा प्रमाण पत्र आदि संस्थाओं के पाठयक्रमों में निहित विषमताओं के कारण शिक्षा स्तर में असमानता बढ़ती जा रही है। इस असमानता का दीर्घकालिक प्रभाव यह है कि शिक्षा के साथ ही विकास की अन्य प्रक्रियाओं में भी विषमता की खाई लगातार बढ़ रही है। भूमंडलीकरण के इस युग में जहां विश्व की परिकल्पना एक 'विश्व गांव' के रूप में की जा रही है, यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपने देश में प्राथमिक शिक्षा का न केवल विस्तार करें वरन् उसमें गुणात्मक सुधार लाने पर भी धयान दें।

आज देश में शैक्षिक बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है, जो नई-नई समस्याओं को जन्म देती है। उचित रोजगार न मिल पाने की स्थिति में ऐसे विद्यार्थी प्राय: गलत कार्यों में संलिप्त हो जाते हैं। कश्मीर, पंजाब, असम, पूर्वोत्तर भारत के कई राज्य, बिहार के नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्र आज इन्हीं समस्याओं से जूझ रहे हैं। आखिर देश के इन अधिाकांश शिक्षित नवयुवकों की शिक्षा की सार्थकता क्या है ? क्या इनकी शिक्षा उनकी योग्यता को भली-भांति प्रदर्शित कर पाती है ? क्या ये नवयुवक अपने शिक्षा-स्तर के अनुरूप समाज में योगदान कर रहे हैं? क्या ये लोग आगामी पीढ़ी के लिए शिक्षा प्राप्ति का उचित आदर्श स्थापित कर रहे हैं।

जाहिर है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था और साथ ही शिक्षा पध्दति में कुछ ऐसे विकार हैं, जो देश के नौजवानों के शिक्षा पूरी कर लेने के उपरांज समाज में उनके संभावित योगदान में बाधक बन जाते हैं। वास्तव में हमारी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था देश के नौजवानों में आत्मविश्वास का संचार करने में असफल रही है। एक पढ़ा-लिखा नवयुवक जो कि ज्ञान के आधार पर कृषि कार्य को अच्छी तरह करके देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में योगदान कर सकता था, आज खेत की ओर देखना तक पसंद नहीं करता। देश के नियोजकों को भूमंडलीकरण को धयान में रखते हुए इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि क्या वर्तमान परिस्थिति में ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के विद्यार्थियों के लिए प्राथमिक स्तर पर एक समान पाठयक्रम बनाया जाए। और यदि हाँ तो यह किस प्रकार संभव हो। साथ ही देश की विविधतापूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों को धयान में रख कर भारतीय शिक्षा व्यवस्था किस प्रकार निर्मित की जाए कि शिक्षा के सार्वभौमिकरण के साथ ही बेरोजगारी की समस्या का हल भी निकाला जा सके।

जहाँ तक सरकारी प्रयासों का प्रश्न है, देश की बढ़ती जनसंख्या ने भी सरकार के सीमित संसाधनों को अन्य क्षेत्रों में व्यय को बाधय किया है। खाद्यान्न वितरण, परिवहन, रोजगार सृजन, चिकित्सा, पेयजल, विद्युत आदि अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ सार्वजनिक व्यय हुआ है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि शिक्षा के राज्य सूची का विषय होने के कारण प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था राज्य सरकारों द्वारा ही की जाती है। राज्यों की वित्तीय स्थिति अच्छी न होने के कारण बहुत से राज्यों में प्राथमिक शिक्षा विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की मदद से चल रही है। यह निर्विवाद है कि विकास प्रक्रिया के दौरान आने वाली किसी भी चुनौती का सामना मात्र शिक्षा द्वारा किया जा सकता है। अत: हमें प्रयास करना होगा कि कम से कम प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में तो सरकारें अपना व्यय बढ़ायें।

शिक्षा के क्षेत्र में कुछ प्रश्न और उठते हैं कि आखिर शिक्षा की अनिवार्यता किस स्तर तक या कब तक हो ? शिक्षा केवल नौकरी के लिए हो समाज निर्माण के लिए हो ? शिक्षा के माध्यम से स्वरोजगार को कैसे बढ़ावा दिया जाए ? सर्वप्रथम तो यह आवश्यक है कि शिक्षा का उद्देश्य मात्र नौकरी प्राप्त करना न होकर अधिक व्यापक होना चाहिए।प्रारंभ से ही विद्यार्थियों में उनके भौगोलिक व सांस्कृतिक परिवेश के अनुसार स्वावलंबन बढ़ाने वाली शिक्षा की व्यवस्था की जाए। इस प्रकार प्रारंभ से ही ऐसी शिक्षा से नवयुवक रोजगार की तलाश में अपनी ऊर्जा व्यय करने के बजाय देश के निर्माण पर ज्यादा धयान केंद्रित कर सकेंगे। विश्व के सभी देशों में तीव्र गति से हो रहे आर्थिक परिवर्तनों के इस युग में यह आवश्यक है कि हम अपनी प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था में अनुकूल सुधार करें तथा शिक्षा के क्षेत्र में प्राचीन काल से ही स्थापित भारत की गरिमा को बनाए रखें।


स्वाति शर्मा