संस्करण: 19जनवरी-2009

सशक्तिकरण का आधार है :

स्वास्थ्य चेतना

 

 

डॉ.गीता गुप्त

जकल दूरदर्शन पर एक विज्ञापन प्रदर्शित किया जा रहा है जिसमें यह संदेश निहित है कि गर्भवती स्त्रियों को अपने खानपान का विशेष धयान रखना चाहिए। उन्हें आयोडीन युक्त नमक का ही इस्तेमाल करना चाहिए अन्यथा उनका होने वाला बच्चा दैहिक एवं मानसिक रूप से कमज़ोर हो सकता है। कुछ ऐसा ही विज्ञापन आकाशवाणी केंद्रों से भी प्रसारित हो रहा है। निश्चित रूप से यह समाज में स्वास्थ्य-चेतना उत्पन्न करने में सहायक होगा।

आज की नारी शिक्षित है। वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी है तथापि उसमें स्वास्थ्य के प्रति सजगता का अभाव है। स्त्री को स्मरण रखना चाहिए कि वह परिवार की धुरी है। वही परिवार को एक सूत्र में पिरोकर रख सकती है। लेकिन घर-परिवार का धयान रखते हुए वह सदैव अपनी अवहेलना करती देखी जाती है। आज जब कामकाजी महिलाओं की संख्या में निरंतर वृध्दि हो रही है, ऐसे में अपने स्वास्थ्य के प्रति उनका जागरूक होना आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विश्व की 50% से भी अधिक महिलाएं रक्ताल्पता की शिकार हैं। भारत में यह प्रतिशत और अधिक हो सकता है। यहाँ गर्भवती ही नहीं, सामान्य महिलाएं भी कैल्शियम, आयरन और रक्त की कमी से पीड़ित हैं।

आश्चर्यजनक बात यह है कि गांवों में तो अशिक्षा और जागरूक न होने के कारण स्त्रियां स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयों से जूझ रही हैं लेकिन लगभग 40% शहरी महिलाएं रक्ताल्पता की शिकार हैं। आम तौर पर भोजन में पोषक तत्वों के अभाववश शहरी का पोषण ठीक ढंग से नहीं हो पाता। यह भी सच है कि महिलाएँ घर भर के स्वास्थ्य की चिंता तो करती हैं किंतु अपने प्रति बहुत लापरवाह होती हैं। सामान्यत: प्रतिदिन उन्हें 30 ग्राम लौह तत्व की आवश्यकता होती है, परंतु वे 10-15 ग्राम से अधिाक नहीं लेती। गर्भवती स्त्री को 50 ग्राम लौह तत्व प्रतिदिन लेना चाहिए किंतु वे आवश्यक मात्रा में लौह तत्व, कैल्शियम, विटामिन आदि न लेने के कारण ही अनेक रोगों से घिर जाती हैं।

आजकल महिलाओं को पर्याप्त स्वास्थ्य-सुविधाएं सुलभ करायी जा रही हैं तथापि उनमें हिमोग्लोबिन की कमी चिंताजनक है। सरकार ने गर्भवती स्त्रियों की स्वास्थ्य-रक्षा हेतु अनेक महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की हैं लेकिन महिलाएं स्वयं ही अपने स्वास्थ्य की अनदेखी करती हैं। एक महिला में सामान्यत: हिमोग्लोबिन का स्तर 12.5 होना चाहिए परंतु अधिाकतर महिलाओं में यह 10 से भी कम पाया जाता है। यदि आम लड़कियों के हिमोग्लोबिन की जांच करवायी जाये तो वह भी कम ही होगा। उच्च वर्ग की स्त्रियों में डाइटिंग के कारण हिमोग्लोबिन कम हो रहा हैं।

वस्तुत: स्त्रियां स्वास्थ्य की अपेक्षा सौंदर्य को अधिक महत्वपूर्ण मानती रही हैं। वे मोटापा घटाने और खूबसूरती पाने के लिए भरसक प्रयत्न करती हैं। जबकि उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि वास्तविक सौंदर्य उत्तम शारीरिक स्वास्थ्य से ही प्राप्त होगा और उत्तम स्वास्थ्य संतुलित व पौष्टिक आहार पर निर्भर है जिससे शरीर के सभी अंग भली भांति क्रियाशील रहते हैं। कायिक सौंदर्य के प्रति सचेत महिलाएँ पौष्टिक आहार की बजाय गोलियों से कैल्शियम, लौह, तत्व, विटामिन आदि की कमी दूर करने का प्रयास करती हैं जोकि सही नहीं है क्योंकि इससे शरीर का समुचित पोषण संभव नहीं है।

खेद की बात है कि सामाजिक तौर पर स्त्री के स्वास्थ्य की चिंता कदापि नहीं की जाती। घरों में भी आम तौर पर यही धारणा है कि उसे अधिक देखभाल की ज़रूरत नहीं है, उसे क्या होगा ? लड़कियों के बीमार पड़ने पर उसकी ओर प्राय: धयान नहीं दिया जाता। समाज में तो स्त्री के स्वास्थ्य के प्रति चेतना का अभाव है ही, मगर शिक्षित व स्वावलंबी महिलाएँ भी अपनी सेहत को सदैव दूसरे क्रम पर रखती हैं। जब तक कोई गंभीर तकलीफ़ नहीं होती, तब तक वे चिकित्सक के पास नहीं जाती। स्वास्थ्य पर होने वाला व्यय उन्हें फिज़ूल लगता है जबकि स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति स्त्री की सजगता उसके सशक्तिकरण का एक महत्वपूर्ण सोपान है।

'पहला सुख निरोगी काया' जैसी बात बारंबार सुनने के बावजूद निरोग रहने की दिशा में स्त्री की चेष्टा संतोषजनक नहीं हैं। प्राय: उसकी यह मानसिकता होती है कि घर के सभी सदस्य भरपेट भोजन करें, स्वस्थ रहें-इसी में नारी-जीवन की सफलता है। अशिक्षित और अल्प शिक्षित ही नहीं, सुशिक्षित और उच्च पदासीन नारियां भी अधिकतर यही सोचती हैं। जबकि प्रत्येक स्त्री को यह सोचना चाहिए कि वह परिवार की एक अहम सदस्या है, जिसके स्वास्थ्य पर ही संपूर्ण परिवार का स्वास्थ्य, सुख और प्रसन्नता निर्भर है। यदि वे स्वयं अस्वस्थ होगी तो परिवार का धयान कैसे रख पाएंगी ? बहुत कम परिवार या पुरुष ऐसे हैं जो घर में स्त्री के भोजन और स्वास्थ्य की परवाह करते हैं। अस्तु, सभी गृहिणियों और कामकाजी महिलाओं को स्वयं ही अपनी सेहत का भी धयान रखना चाहिए। छोटी-सी असावधानी से कभी कभी गंभीर रोग हो जाते हैं, यह नहीं भूलना चाहिए।

उत्तर-प्रदेश स्थित 'गौरांग क्लीनिक एवं सेंटर फॉर होम्योपैथिक' द्वारा किए गए शोधा से आश्चर्यजनक तथ्य प्रकाश में आए हैं। छ: सौ मरीजों पर किए गये शोध में तनाव, क्रोध, चिड़चिड़ापन, डरावने स्वप्न और जीवनसाथी से झगड़े जैसे कारणों से महिलाओं के अंडाशय में रसौली की समस्या सामने आयी हैं। गौरांग क्लीनिक के चिकित्सक गिरीश गुप्ता के अनुसार 'वर्तमान में महिलाओं से संबंधित बीमारियों में रसौली पहले स्थान पर है। इसका कारण है-तनाव, चिंता, पौष्टिक भोजन का अभाव आदि-आदि। पहले महिलाएं कैरियर के प्रति इतनी जागरूक नहीं थी अत: वे कम ही बीमार दिखाई देती थी। लेकिन अब जॉब और कैरियर की चाहत से उनमें तनाव और बीमारी की समस्या बढ़ रही है। तनाव का असर दिमाग पर होता है, जो उनके स्वास्थ्य के लिए घातक सिध्द हो सकता है।' इस स्थिति से बचने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि महिलाएं अपना और परिवारजन का हर तीन महीने में मेडिकल जांच करवाने की आदत डालें। यदि हर तीन माह में संभव न हो तो वर्ष में कम-से-कम एक बार तो ऐसा कर ही सकती हैं। इससे कोई भी बीमारी आरंभिक अवस्था में ही पकड़ में आ जाएगी और उससे छुटकारा पाना आसान होगा।

दूसरी बात, अपना व अपने परिवार का स्वास्थ्य/चिकित्सा बीमार अवश्य करवायें। इसमें अधिक खर्च नहीं आता और कभी संयोगात् दवा या चिकित्सा हेतु अधिक खर्च करने की बाधयता हो, तो बीमा होने से यह कार्य आसान हो जाता है। केंद्र सरकार की यूनीवर्सल हेल्थ पॉलिसी द्वारा छोटे व कम आय वाले परिवार के लिए कुछ बीमा कंपनियां स्वास्थ्य बीमा की सहूलियत दे रही हैं। जिसमें तीन माह के बच्चे से लेकर सत्तर साल तक के लोगों का क्षेत्रवार बीमा किया जा रहा है। न्यू इंडिया, ओरियंटल, नेशनल यूनाइटेड, जनरल इंश्योरेंस जैसी कंपनियां अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं को भी स्वास्थ्य बीमा की सुविधा सुलभ करा रही हैं जो परिवार के सदस्यों को अस्पताल के हितलाभ व शल्य क्रिया हितलाभों में मददगार सिध्द होगी।

भारतीय जीवन बीमा की हेल्थ प्लस पॉलिसी में स्वास्थ्य-बीमा के रूप में साधारण चार्ज लिया जाता है और अन्य राशि यूनिट मूल्य/ बाज़ार मूल्य के आधार पर रिफंड कर दी जाती है। इसमें किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होता है साथ ही राशि निकाली भी जा सकती है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों के लिए भी यूनीवर्सल हेल्थ पॉलिसी है। इसमें मुखिया के एक्सीडेंटल केस कवर के साथ 50% की छूट भी दी गयी है। ऐसे परिवारों के लिए अलग से प्रीमियम तय है। इसमें 165 रुपये में एक व्यक्ति, 248 रुपये में पांच व्यक्ति और 330 रुपये सालाना प्रीमियम में परिवार के सात सदस्यों को बीमा-सुविधा दी जाती है। स्वयं न कमाने वाली महिलाएं भी पति की आय के आधार पर मेडिक्लेम ले सकती हैं। सरकारी कंपनी द्वारा बीमाधारक को एक वर्ष में पांच सदस्यों में से किसी भी क्लेम के लिए पंद्रह हज़ार रुपये मेडिक्लेम मिलता हैं सरकारी व निजी अस्पताल में कराये गये इलाज का क्लेम क्लियरेंस सामान्यत: 15-20 दिनों में हो जाता है। नियमित स्वास्थ्य बीमा में एड्स को छोड़कर किसी भी रोग का इलाज कराना संभव है।

अच्छी सेहत पर ही खुशहाल जिंदगी का दारामेदार है परन्तु 90% महिलाएँ अपनी सेहत पर धयान नहीं देती। यह भी सच है कि सरकार व निजी कंपनियों द्वारा दी जा रही स्वास्थ्य बीमा सुविधा से भी वे अनभिज्ञ हैं। कामकाजी महिलाएँ तक अपने स्वास्थ्य का बीमा करवाने में रूचि नहीं लेती। यह एक अच्छा संकेत अवश्य है कि स्थान-स्थान पर व्यावसायिक लाभ की दृष्टि से खुलने वाले हेल्थ सेंटर, फिगर सैलून, ब्यूटी पार्लर और योग केंद्र अब महिलाओं को सौंदर्य के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक करने का कार्य कर रहे हैं। अतएव महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी तथ्य एवं सत्य समझ में आने लगा है। दैनंदिन जीवन में पौष्टिक आहार का महत्व जतलाने में संचार माधयमों की भूमिका महत्वपूर्ण है।

स्त्रियों को यह जानना चाहिए कि स्वास्थ्य और सौंदर्य का अन्योन्याश्रित संबंध है। इसलिए उत्तम स्वास्थ्य हेतु अनिवार्य सभी शर्तों की जानकारी उन्हें होनी चाहिए। यह तय है कि शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा होगा तभी मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होगा और इसका प्रभाव उनके चेहरे के सौंदर्य पर दिखाई देगा।यह भी महत्वपूर्ण बात है कि बिना अतिरिक्त समय और श्रम के यदि प्रतिदिन के आहार की पौष्टिकता सुनिश्चित कर ली जाये तो शरीर की रोग प्रतिरोधाक क्षमता में वृध्दि होगी और सही पोषण संभव हो सकेगा। भोजन तैयार करते समय अनाज, वनस्पति एवं अन्य वस्तुओं की सही मात्रा और उचित पाक विधि अपनायी जानी चाहिए। इसके अलावा दैनंदिन जीवन में स्त्रियों के लिए भी धयान, योग, व्यायाम जैसी गतिविधियां अनिवार्य हैं।

प्राय: स्त्रियां मोटापा, मधाुमेह, रक्ताल्पता, जोड़ों के दर्द आदि ऐसी तकलीफों से जूझ रही होती हैं, जिनका आरंभ ही गलत जीवन-शैली के कारण होता है। अत: इक्कीसवीं सदी में महिलाओं को चाहिए वे अपने तन-मन दोनों की सुंदरता के लिए जागरूक व सचेष्ट हों। वे अपनी जीवनचर्या व्यवस्थित रखें। नियमित रूप से चिकित्सक से अपने स्वास्थ्य की जांच करवाने की आदत डालें। स्वास्थ्य-बीमा योजना का लाभ उठायें। स्वयं रोगमुक्त रहें और अपने परिजनों को भी रोग मुक्त रखने हेतु समय-समय पर चिकित्सक से सलाह लें। स्मरण रहे कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। स्वस्थ प्राणी ही जीवन का आनंद ले सकता है। स्त्रियों के संदर्भ में तो यह भी कहा जा सकता है कि उनकी स्वास्थ्य चेतना ही सशक्तिकरण का आधाार है।

 

 

डॉ.गीता गुप्त