संस्करण: 19जनवरी-2009

खूब इश्तहार निकालो, खूब सपने दिखाओं, स्वागत है,
परंतु, कुछ साकार भी करके दिखाओ !

 

 

राजेंद्र जोशी

राजनैतिक पार्टियां सत्ता पर काबिज होने के लिए निर्वाचन के समय खूब प्रचार करती हैं, बढ़ चढ़कर आम जनता को सुखी और समृध्द बनाने के सपने दिखाती हैं, खूब प्रलोभन देती हैं, लोकलुभावन वायदें करती हैं। यह सब सुनकर बहुत अच्छा लगता है। निर्वाचन का समय एक ऐसा अवसर होता है जिसमें विभिन्न राजनैतिक दल और उनके नेतागण आमजन को स्वर्णिम सुबह, स्वर्णिम दिन और स्वर्णिम शाम उपलब्ध कराने की प्रतीज्ञा लेते हैं। उनके द्वारा फेंके गये शब्दजालों में फंसकर आमजन अपने भावी जीवन के प्रति आश्वस्त हो जाता है। यह तो हुआ निर्वाचन की बेला के पूर्वाध्द का सच, किंतु जब भावनाप्रधान और आशावादी जनता के उदार-हृदय से विजयश्री का तोहफा मिल जाता है तो स्थिति एकदम से पलटी मार जाती है। जो सपने थे, वे सपने ही बने रहते हैं, इश्तहार के होर्डिंग्स उतर जाते हैं, वायदों और घोषणाओं की इबारत वाले कागजों को बस्तों में बांध दिया जाता है और मखमल की कालीन पर अपने पांव आगे बढ़ाते-बढ़ाते सोने के सिंहासन तक पहुंचने वाले तथाकथित विजय वरण करने वाले हमारे बीच के सामान्य जन व्ही.व्ही.आई.पी.की सुविधाओं और सम्मानों के रसास्वादन में मशगूल हो जाते हैं।

निर्वाचन परिणामों के आने के बाद अव्वल रही पार्टी और उसके नेतागण पलटकर यह देखना भी नहीं पसंद करते हैं कि वे जिस माहोल से यहां तक पहुंचते हैं, उस माहोल की दशा बदलने के लिए उन्होंने क्या-क्या वायदे किए थे और जिनके कांधों पर चढ़कर यहां तक आये हैं, उनको क्या क्या सपने दिखाते हुए यहां तक आये थे। मंजिल पर पहुंचकर ये नेतागण अपने ही सुनहरे ख्वाबों को जमीन पर उतारने में काफ़ी व्यस्ततम देखते जाते हैं।

निर्वाचन के परिणाम आ जाने के ठीक एक माह बाद मध्यप्रदेश की राजधानी से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक समाचार पत्र ने अपने प्रथम पृष्ठ पर जिस तरह के शीर्षक से एक समाचार छापा है वह निर्वाचन जीतने के पहले और जीतने के बाद की राजनीतिक प्रवृत्ति की कलई खोलने के लिए पर्याप्त है। समाचार का शीर्षक है-खाली पड़ा, खजाना, खर्चे बेसुमार, संकट में सरकार। जो राजनैतिक पार्टी प्रदेश में सत्ता पर काबिज हुई है, उसे दुबारा से प्रदेश की सेवा का यह अवसर मिला है। सत्ता सम्हालते ही खाली ख़जाना मिलना और संकट का आसन्न होना उस स्थिति में है जब पूर्ववर्ती सत्ता भी इसी दल के पास थी। कोई दूसरी राजनैतिक पार्टी यदि पूर्व में सत्ता में होती और उससे सत्ता छीनकर इस पार्टी को अवसर मिला होता तो उस पूर्ववर्ती सरकार के क्रियाकलापों और उसके काल के भ्रष्टाचारों के मुद्दों को यह सत्तासीन दल खूब उछाल-उछालकर उसकी बखिया उघेड़ देते। किंतु सत्तासीनों की चुप्पी सत्ता की अंतर्कथा को उजागर होने से नहीं रोक पाई है। खाली पड़े खजाने और सरकार पर आये संकट पर वित्त मंत्री जी ने जरूर दबी जुबान में स्वीकार किया है-'मुश्किल वक्त हैं'। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार ने निर्वाचन के सही आंकड़े प्रस्तुत करते हुए प्रदेश के प्रति भेदभाव के आरोप बेबुनियाद बताये थे और मदवार केंद्र द्वारा दिए गये आर्थिक सहयोग का विवरण दिया था तो हमारे सत्ताधाारी लोगों को बगल--झांकते हुए यह कहते हुए पाया गया था कि राज्य को केंद्र से राशि मिली तो है किंतु केंद्र ने कोई एहसान नहीं किया है। एक तरफ तो कहते रहे कि सहयोग नहीं मिल रहा है। दूसरी तरफ जब आंकड़े गिना दिये तो आरोपों के बयानों की भाषा ही बदल दी गई।

समाचार पत्र में इस आकलन को भी उजागर किया है कि सरकार के खजाने में सिर्फ 1600 करोड़ रु. बचे हैं जबकि सौं दिन की घोषित कार्ययोजना समेत कई बड़े खर्चों का अंबार सामने है। वेट, रजिस्ट्री, शुल्क, खनिज व परिवहन राजस्व समेत आय के सूखते अन्य स्रोतों ने संकट बना दिया है। विगत 2003 में सत्ता में आये इस राजनैतिक दल ने प्रदेश की पूर्ववर्ती सरकार की नाकामयाबियां गिनाकर जनता की नज़र से उस सरकार की छवि गिराने में कसर नहीं छोड़ी थी। जिन बिजली, पानी, सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत ज़रूरतों को पूरा करने के वायदों और घोषणाओं के दम पर पांच वर्ष पूर्व से चल रही सरकार के उस कार्यकाल में भी पूर्ववर्ती सरकार की तरह ही स्थिति बनी रही। वायदों और घोषणाओं को अपने अगले कार्यकाल में पूरा करने का संकल्प लेकर अब पुन: काबिज इस सत्ता से जो उम्मीद जागी है, वह खज़ाने की वर्तमान हालत के चलते बेमानी सी लगती है।

आम लोगों के मन में खाली खजाने की दम पर आगे कदम बढ़ाने वाली सरकार के प्रयासों के प्रति शंका पैदा होना स्वाभाविक है। चुनावी वायदों और घोषणाओं को जमीन पर उतारने के नतीजे कैसे मिल पायेंगे, यह प्रश्न आज साफ-साफ खड़ा है। चुनावी घोषणाओं के अनुसार किसानों को तीन प्रतिशत ब्याज पर ऋण देने की स्थिति क्या होगी। ऐसे कई सवाल उठना स्वाभाविक है। अभी से यह प्रचारित होने लगा है कि मंडी आने वाले को पांच रुपये में भोजन, बी.पी.एल. परिवारों को दो रु. किलो गेहूं और साढ़े तीन रु. किलो चावल, सभी गांवों में 24 घंटे बिजली, एम्स की तर्ज पर छ: बड़े अस्पतालों का निर्माण विभिन्न विभागों की अधूरी योजनाऐं, छठे वेतनमान को केंद्र की तरह लागू करना और एरियर्स भुगतान के लिए मोटी रकम का इंतजाम छात्राओं के नि:शुल्क साइकिल जैसे महत्वपूर्ण घोषणाओं को पूरा करने की चुनौतियों को, खाली पड़े खजाने ने और ज्यादा बढ़ा दिया है।

हालांकि सरकार यह आश्वस्त जरूर कर रही है कि बिजली के लिए पांच सौ करोड़ रु. जुटा लिए जायेंगे और प्रयास यह रहेगा कि ओवर ड्राफ्ट की स्थिति न बने। आशा करना चाहिए कि सरकार इस वित्तीय संकट से उबरने के लिए कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल पायेगी। जनता सदैव ही वायदों, घोषणाओं, सब्जबागों और सपने दिखाने के तरीकों का स्वागत करती आई है, अब वह उसे दिखाये रहे ख्वाबों को जमीन पर देखने को बेचैन हो उठी है।

 

राजेंद्र जोशी