संस्करण: 19जनवरी-2009

इजरायल के कहर पर चुप्पी क्यों ?


 

 

अंजनी कुमार झा

रब देशों की मदद और स्वार्थ की खातिर हिजबुल्ला व हमास जैसे आतंकी संगठनों की जिहादी राजनीति से इजरायल का अस्तित्व खतरे में दिखता है। यह खौफ उसे विचलित करता है। फिलीस्तीन प्रयोगशाला है जहां पनाह लेकर ये खूंखार संगठन इजरायल में खत बहाकर अमेरिका को चेतावनी देते हैं। यहूदी देश होने के कारण स्वाभाविक लगाव के साथ रणनीति के लिए महत्वपूर्ण इजरायल पर प्रहार चुनौती को आमंत्रित करता है। इस खेल में लाखों जिंदगी के सपने गोले-बारूद के धुएं में ही धू-धू कर जल जाते हैं।

अल जजीरा को दिए इंटरव्यू में हमास के खालिद मशाल ने इसे तीसरा इंटीफाड़ा बताया।पहला इंटीफाड़ा अर्थात बड़े पैमाने पर हिंसा 1980 में शुरू हुआ किंतु यह विफल रहा। स्वतंत्र फिलिस्तीन की मांग को राजनीतिक रूप दिया गया।ओस्लो समझौते के तहत नींव रख दी गई। इजरायल और अमेरिका के विरोध के बावजूद फिलिस्तीन अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर स्थापित हो गया। दूसरा इंटीफाड़ा सितंबर, 2000 में शुरू हुआ। येरूशलम स्थित टेम्पल माउंट एरिया यहूदियों के लिए पवित्र स्थल है, किंतु इस पर फिलिस्तीनी ने दावा करते हुए इसे अल हरम अस शरीफ बताया। तत्कालीन प्रधानमंत्री शेरॉन की यात्रा के बाद वहां दंगे कराकर इसे राजनीतिक विवादित क्षेत्र बनाया गया जो अब भी जारी है। उस अवधि में इजिप्टीयन मुस्लिम ब्रदरहुड़ की इकाई हमास ने गाजा में अपनी पैठ मजबूत कर ली। 2004 में फिलिस्तीन मुक्ति मोर्चा (पी.एल.ओ.) के सर्वेसर्वा यासर अराफात की मौत के बाद हमास ने 'फतह' का बीड़ा उठाया।अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक नैराश्य के घटा के बीच हमास ने शांति वार्ता की आलोचना करते हुए समझौते को दरकिनार करना शुरू किया। पी.एल.ओ. की भांति हमास भी जिहादी कहा जाने लगा। इसके संस्थापक शेख अहमद यासीन की 22 मार्च, 2004 को इजरायल ने हत्या करा दी। एक माह बाद यासीन के उत्तराधिकारी अब्दुल अजीज अल एंटीसी भी मारे गये। 2006 में संपन्न संसदीय चुनाव में हमास बड़े विजेता के रूप में उभरा, किंतु सत्ता नहीं संभाली। क्षेत्र में व्यापक ऊर्जा स्रोतों पर कब्जा जमाने के लिए अमेरिका और इजरायल ने गाजा पट्टी पर बमबारी कर उसे बंजर व मानवविहीन बनाने में आज भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील हमेशा औपचारिक ही रहा। इरान की इस्लामिक क्रांति से अमेरिका हित को धाक्का पहुंचा।असीमित तेल भंडार को पाने के लोभ में अमेरिका ने 'इजरायल' को जबरिया बसाया और 'आतंक' का खेल शुरू किया। इसे रोकने के लिए मिस्र, इरान आदि मुस्लिम देशों ने आतंकी संगठनों की पौधा खड़ी कर दी। जिहाद, धार्म को हिस्सा बनाकर समाज को साधने की कोशिश जारी है। सांस्कृतिक दृष्टि से समृध्द इरान जो शिया बहुल देश है, ने अमेरिका प्रभुता को दूर रखा। उसने इराक को बहलाकर इरान के खिलाफ खड़ा किया और आठ वर्षों तक चले युध्द में लाखों जानें चली गयीं। यह नुकसान मधयपूर्व के देशों को हुआ।

इरानी प्रभाव के लगातार बढ़ने के कारण अमेरिका फिर युध्द कराने की ताक में है। इरान समर्थित हिजबुल्लाह की गोलीबारी लिटानी नदी को लेकर हुआ। उल्लेखनीय है कि अरब देशों में जल को लेकर कई युध्द हुए। जुलाई-अगस्त 2006 में 34 दिनों तक चली लड़ाई के बावजूद हिजबुल्लाह को इजरायल परास्त न कर सका। अनवर सादात के राष्ट्रपति काल में अमेरिका व इजरायल की चाल कामयाब न हो सकी। अरब राष्ट्रवाद और बाथिस्ट विचारधाारा के प्रभाव के कारण हमास ने काफी प्रगति की। सीरिया का धवज फिलिस्तीन के साथ फहराया जाने लगा। हमास व हिजबुल्लाह के संयुक्त प्रयास से अमेरिका की इच्छा जब पूरी न हो सकी तो तेल के लिए शुरू राजनीतिक खेल ने रक्त की दरिया को बड़ा कर दिया। चहुंओर अशांति बढ़ रहा है। लगातार हो रहे संघर्ष के कारण इजरायली नेसेट (संसद) में बहस हो रही है कि गाजा पट्टी के लिए और कितने खून बहेंगे ?

वेस्ट बैंक और गाजा में रह रहे 40 लाख फिलिस्तीनी के पास बमुश्किल दस प्रतिशत जमीन है। फिलिस्तीन की जमीन पर 1922 में 11 फीसदी यहूदी थे, जो दूसरे विश्वयुध्द के अंत तक 33 फीसदी हुए और 1948 से 1958 के दस साल में इजरायल की आबादी 8 लाख से 20 लाख हो गई। इजरायल ने कानून बनाकर इन यहूदियों को 49 साल के पट्टे पर जमीन दे दी। फिलिस्तीनियों को बेदखली से आतंक बढ़ा, जो अब भी जारी है। अराफात ने पूरी जिंदगी लड़ाई लड़ी और बुरी तरह मार गिराये गये। रीगन-बुश-क्लिंटन-बुश-ओबामा की रणनीति वहीं है। पंडित नेहरू ने अराफात के फिलिस्तीन को मान्यता दी थी। यूरोप व अमेरिका इस कदम से भले ही नाराज रहे, किंतु भारत की कूटनीति मानवतावादी है। एक धा्रुवीय व्यवस्था ने अरब देशों की एकता को तार-तार कर दिया है। परिणाम स्वरूप आतंकवाद के खेल ने अमन-चैन को समाप्त कर दिया है। गाजा एक बहुत बड़ी कब्रगाह है। एक बड़े स्लम में लाखों लोग वहां किसी तरह पेट की आग को शांत करते हैं। राबर्ट फिस्क के मुताबिक, यह इतिहास जानना उन सबके लिए जरूरी है जो ऐसा समझते हैं कि कुछ पागल कट्टरपंथी मुसलमान बिना वजह बेचारे इजरायल पर रॉकेट छोड़ रहे हैं और इजरायल के पास इस रोज-रोज की किच-किच को बंद करने का कोई उपाय नहीं रह गया था, सिवाय इसके कि वह एक फैसलाकुन हमला करे और हमास को पूरी तरह से नाकाम कर दे। इसी तर्क का सहारा लेकर अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में कुछ वक्त के युध्दविराम के प्रस्ताव को भी वीटो कर दिया। गाजा का चिर-विद्रोही बने रहना एक तरह की बाधयता है। साठ साल क्या इतनी बड़ी अवधि है कि फिलिस्तीनियों से यह कहा जाए कि वे सब कुछ इसलिए भूल जाएं क्योंकि अमेरिकी दादागिरी का विरोधा का मतलब जान से हाथ धो बैठना हैं इजरायल का एलान है कि वह हमास को नेस्तनाबूद किये बिना गाजा से नहीं लौटेगा। इस जंगली मानसिकता से बचे हजारों लोग अपाहिज बन जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र महासभा रबर स्टांप है, जिसका उद्देश्य अमेरिका के हर गैर मानवतावादी कदम को सराहना है। गाजा की नाकेबंदी से वहां की सांस थम गयी है। तस्वीर ऐसी पेश की जा रही है कि बेचारा इजरायल भी आतंकवाद का शिकार है। वह फिलिस्तीनियों की जमीन पर गैर कानूनी कब्जा करने का अपराधी है और उसकी सारी ताकत इस गैर कानूनी कब्जे को बरकरार रखने के लिए ही हैं। यह विडंबना है कि हमलावर खुद को एक शिकार की तरह पेश कर रहा है और इस धोखाधड़ी में दुनिया के सभी सभ्य देश शामिल हैं।

गिडियोन लेवी ने ठीक ही लिखा है कि किसी भी हिसाब से इस युध्द को उचित नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि यह एक ऐसी आबादी के खिलाफ है जो शायद दुनिया की सबसे असहाय आबादी है। हमास के पास इजरायल की तरह हथियारों का जखीरा नहीं है। हृदयहीनता इजरायल के बहुतांश का स्वभाव बन गई है। इजरायली लेखक सामी मिखाइल के अनुसार इजराइलियों को यही सिखाया गया कि अरब मनुष्य नहीं है। इसलिए उनका मारा जाना तिलचट्टे के मारे जाने से कुछ अधिक नहीं। इस तरह की भयानक तस्वीरों के बावजूद पूरी दुनिया स्तब्ध व चुप है। निहित स्वार्थ की खातिर बेगुनाहों के कत्ल को रोकना चाहिए।

 

अंजनी कुमार झा