संस्करण: 19जनवरी-2009

सीएम बनाम सीईओ

 

 

प्रमोद दुबे

ध्यप्रदेश की पब्लिक ने अपना सीएम चुन लिया। अब वह सीएम; सीईओ बनना चाहते हैं!.....क्या यह संभव है ?

पूरे प्रदेश के किसी भी एक व्यक्ति ने अपना वोट ऐसे व्यक्ति को समर्पित नहीं किया है जो सीईओ बनना चाहता है या जिसमें सीईओ छुपा बैठा हो। सबने अपना वोट ऐसी छवि वाले व्यक्ति को दिया है जो अपेक्षाकृत सरल व लोकलुभावन होकर उनका प्रतिनिधित्व करना चाहता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या सीईओ होना ऐसे व्यक्ति के लिये सरल है जो प्रथमदृष्टया निर्मम नहीं है ? ना ही लक्ष्य और उसकी उपलब्धि को लेकर कठोर दिखता हो। वह जो भली-भाँति जानता है कि कठोर प्रशासनिक निर्णयों के प्रति आज नागरिकों का अरूचि रखना राष्ट्रीय चरित्र बन गया है। आखिर वह व्यक्ति सीईओ क्यों बनना चाहता है ?

सवाल है कि एक ऐसा व्यक्ति जो सेवक बनकर जनता के द्वार पर जाता है वह सीईओ बनकर कार्यपालक कैसे हो सकता है ? दोनों ही व्यक्तियो की संस्कृति में भारी अंतर है। सीईओ लक्ष्य के प्रति निर्दयी होता है और 'टारगेट' की नंगी तलवार के नीचे बैठता है। उसका एकमात्र अंतिम धर्म, लक्ष्य की प्राप्ति होता है। चाहे वह किसी भी परिस्थिति में प्राप्त किया गया हो। लेकिन जनता ने जिस व्यक्ति को सीएम के पद पर पहुंचाया है कहना न होगा कि उसे सफलता, विनम्रता के अतिरेक से मिली है और वह व्यक्ति अपनी छवि (ईमेज) के प्रति इतना सतर्क है कि उसे हम अपने आप के प्रति कठोर मान सकते हैं.........कार्य के प्रति नही। भोपाल में बढ़ती लूट की घटनाएं इसका प्रमाण हैं। ऐसी स्थिति में शंका उत्पन्न हो जाती है कि हमने जिस व्यक्ति को चुना वह व्यक्ति प्रतिस्पर्धी कार्पोरेट संस्कृति का हिस्सा या मुखिया कैसे बन सकता है ?

आज मध्यप्रदेश नें जिस व्यक्ति को अपना नुमाईंदा चुना है वह इस बात से बखूबी वाकिफ है कि उसके अंदर क्या गुण है और क्या क्षमताएं है। यह बात प्रत्येक सफल व्यक्ति पर लागू होती है इसे शिवराज जी के संदर्भ में इस तरह भी कह सकते है कि सफल वह है जिसे अपने गुण व क्षमता कि वह 'सीएम है या सीईओ' का आभास हो। आज प्रदेश में जो व्यक्ति सिंहासनारूढ़ है उस व्यक्ति का गुण है लोप्रोफाईल रहना, और क्षमता है जन-जन से सीधा संवाद स्थापित करना। किसी भी सीईओ की कार्य पध्दति इससे सर्वथा विपरीत होती है। वह जनता के प्रति जवाबदेह नही होता और जानता है कि किसी भी प्रकार का जनसंवाद लिए गए निर्णय के प्रतिपालन में बाधक होता है। कारपोरेट के विपरीत प्रजातांत्रिक सिस्टम एक ऐसी व्यवस्था के तहत कार्य करता है जहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि सरकारी नौकरों (सीईओ) से जनता के हित में कार्य करवाते हैं। इसीलिये इस सिस्टम को जनता का, जनता के लिये जनता के द्वारा चलाया जाने वाला शासन कहा जाता रहा है। प्रत्येक राज्य के मुखिया के पास सरकारी सीईओ की एक कर्तव्यनिष्ठ जमात होती है और उसके ऊपर बैठकर वह उनसे काम लेता है। यह सीईओ जनता द्वारा देखे गये सपनों को प्रदेश के मुखिया के ईशारे पर पूरा करने के लिये नियुक्त किये जाते हैं। ये सीईओ किसी दूसरे के हिस्से के सपनें नही देखते बल्कि जनता के सपनों को पूरा करते है। दोनों के ही व्यक्तित्व में जमीन आसमान का फर्क है, यदि कोई सीएम इन सीईओ की जमात में शामिल हो जाए तो जनता के सपने खतरे में पड़ जाते है। आन्ध्र के 'लेपटाप सीएम चंद्रबाबू' का उदाहरण सामनें है। चंद्रबाबू नायडू ब्यूरोक्रेट की सलाह पर 'सीईओ' बने तो फिर सीएम भी नही रह पाये। कारण यह है कि यदि निर्वाचित प्रतिनिधी अपनी भूमिका में इस तरह का बदलाव लाते हैं तो गवर्नमेंट का चरित्र भी बदल जाता है। फिर उसका जनता की आकांक्षा के अनुरूप व्यवहार करना संदिग्ध हो जाता है। इस तरह के प्रसंग हमें आम तौर पर राष्ट्रपति शासन के दौरान मिलते रहे है। जब सीईओ की फौज शासक बन बैठती है और जनता की जुबान को स्वर भी हासिल नहीं हो पाते। बेज़ूबान लोग बेबसी में ऐसे तथाकथित सीईओ के शासन का समय काटते है। किसी भी शासक को जनता की समस्याओं के समाधान देने के लिये अपनी भूमिका में परिवर्तन करने के पहले यह बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि 'व्हेन द गवर्नमेंट इज एफीसिएंट एंड स्मार्ट इट्स पीपल आर डिस्कंटेंटेड'। कहने का तात्पर्य है कि जब भी कोई सीएम अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये सीईओ का मुखौटा लगाकर प्रजातांत्रिक सरकार को ज्यादा चुस्त और कठोर बनाता है तो उसकी प्रजा असंतुष्ट हो जाती है।

प्रश्न उठता है कि आखिर जनता चाहती क्या है ? जनता स्पष्ट रूप से अपनी और प्रदेश की बेहतरी चाहती है। वह चाहती है कि जो भी व्यक्ति जिस भी भूमिका में है वह उसे बेहतर ढ़ंग से निभाए। जैसे कि एक सीईओ या एक कलेक्टर को यह देखना ही होगा कि किसान उसकी अकर्मण्यता या उसके मातहतों के भ्रष्ट आचरण के चलते कलेक्ट्रेट में दिन दहाड़े आत्महत्या ना करनें लगे। रही मुख्यमंत्री की बात तो मुख्यमंत्री को यह देखना होगा कि किसान की जान किसी भी स्थिति में न जाए। जान जाने की स्थिति में वह ऐसे कलेक्टर को दंडित करे। उसे यह भी देखना होगा कि वह दण्ड देनें के अपनें निर्णय का अनुपालन बिना प्रतिरोध या न्यूनतम प्रतिरोध के करवा सके। वह देखे कि दूसरे अधिकारी सुधारनें के बजाय तीव्र प्रतिक्रिया न करनें लगे। यदि उच्च प्रशासनिक सेवा संघ मुख्यमंत्री के निर्णय का ही विरोध करनें लगे तो एक मुख्यमंत्री ऐसे उपद्रव से सीईओ बनकर नही एक मुख्यमंत्री बनकर ही निपट सकता है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात कि हमारे प्रदेश में सामाजिक परिस्थितियां बेहद विषम है। जनपद के एक सीईओ और एक गरीब ग्रामीण के जीवन स्तर में इतना फर्क है कि उसे कभी-कभी गरीब के सम्मान की बात भी धयान में नही आती । लेकिन जनता के प्रतिनिधी या एक मुख्यमंत्री से ऐसी भूल की अपेक्षा नहीं की जा सकती। वास्तव में नौकरशाह दोहरी भूमिका में होता है जनता के प्रति असंवेदनशील और शासक के प्रति संवेदनशील........लगभग दुम हिलाता हुआ। यही कारण है कि शिवपुरी जिला पंचायत की आदिवासी अधयक्ष श्रीमती जूली आदिवासी का एक सीईओ रतन श्रीवास्तव अपमान कर देता है। उसे अपनी हरकत का पता भी नही चला होगा और अपमान हो गया होगा। उदाहरण के तौर पर रतन श्रीवास्तव के कक्ष में यदि कलेक्टर प्रविष्ट होते और वह उन्हें कुर्सी ऑफर नही करता तो यह इरादतन अपमान होता। और यह वह कर नही सकता था। क्योंकि कलेक्टर इस ढ़ंग की सुविधा नही देते। वस्तुत: व्यक्ति की जीवनशैली मान-अपमान की विषयवस्तु है या फिर उसके सम्मान का निर्धारण करती है। साधारण नागरिक का व्यक्तित्व सर्वथा जनप्रतिनिधियों के माध्यम से ही प्रक्षेपित होता है। ऐसी स्थिति में यदि सीएम स्वयं ही सीईओ बन जाए तो आमजन की अपने आप को सीएम के जरिये अभिव्यक्त करनें की यह एकमात्र सुविधा भी दुविधा बन जाए।

खैर......यह पूरा विवरण प्रसंगवश है। लगता नहीं कि मध्यप्रदेश में ऐसा कुछ होगा क्योंकि इसके लिए कठिन शर्तें हैं एक तो यह कि जिसे सीईओ का रोल अदा करना है वह दुस्साहसी हो और विनम्रता का मुखौटा सार्वजनिक रूप से उतार सके। यदि वह ऐसा करतें हैं तो लोग कहेंगे कि कमाल है यार मुखौटा बड़ी खूबसूरती से लगाया था अब जाकर पता चला!!

 

प्रमोद दुबे