संस्करण: 19जनवरी-2009

शिव सरकार का यह कैसा संकल्प ?


 

 

महेश बाग़ी

शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा सरकार की वापसी हुई है और इस सरकार ने जो पहला संकल्प व्यक्त किया है, वह आश्चर्यचकित कर देने वाला है। सरकार सौ दिनी कार्ययोजना बनाने में व्यस्त है।ऊपर से लेकर नीचे तक तमाम अफ़सरान सरकार का विकासवादी चेहरा गढ़ने में लगे हुए हैं। बताने की ज़रूरत नहीं कि इन सौ दिनों में ही लोकसभा चुनाव संपन्न होने है।

ज़ाहिर है कि शिवराज सरकार अपने सौ दिनी संकल्प अभियान के ज़रिये लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को विजयी बनाया जाए, ताकि लालकृष्ण आडवाणी को वेटिंग लिस्ट से हटा कर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठाया जा सके। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत किसी भी राजनैतिक दल को चुनावी व्यूह रचना बनाने का पूरा अधिकार है और इस दृष्टि से शिवराज भी कुछ गलत नहीं कर रहे है। लेकिन सवाल यह है कि क्या मतदाताओं ने उन्हें सिर्फ़ सौ दिनों के लिए गद्दी पर बैठाया है ? क्या इन सौ दिनों के बाद सरकार और उसके नुमाइंदों के पास करने को कुछ नहीं होगा ?

जब मतदाताओं ने भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सौंपी है तो उसे अपने पूरे पांच साल की कार्ययोजना बनाकर उसे मूर्तरूप देने का प्रयास करना चाहिए और यही उसका संवैधानिक दायित्व भी है। ऐसे में अगर शिवराज सरकार सिर्फ सौ दिनों के आधार पर किसी योजना पर आगे बढ़ती है तो इसे इस सरकार का ढोंग कहना ही अधिक उपयुक्त होगा। इन सौ दिनों में से पचास दिन तो योजनाएं बनाने की माथापच्ची में ही निकल जाएंगे। शेष दिनों में काम करने की ऐसी हड़बड़ी होगी कि योजनाओं का बंटाढार होना तय है। यदि शिवराज सरकार की विकास के प्रति नीयत साफ़ होती तो सौ दिनों की बजाय पूरे पांच साल के हिसाब से योजनाएं बना कर क्रियान्वित की जातीं। आम जनता अच्छी तरह से जानती है कि दिखावे के लिए हड़बड़ी में किए गए कार्य कितने स्थायी होते हैं। 1992 के सिंहस्थ महापर्व के समय प्रदेश में भाजपा की ही सरकार थी। तब सिंहस्थ क्षेत्र में बनी एक धर्मशाला का उद्धाटन कर मंत्री महोदय आगे बढ़े ही थी कि वह धर्मशाला भरभरा कर गिर पड़ी थी। गत 2004 के सिंहस्थ महापर्व के समय भी भाजपा की ही सरकार थी। तब सौ करोड़ की लागत से वहां सड़कें बनाई गई थीं, जो अगले तीन माह में ग़ायब हो गई थीं। तत्कालीन बाबूलाल गौर सरकार ने इसकी जांच के लिए एक कमेटी गठित की थी। उनके बाद शिवराज सिंह मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे पहला काम इस जांच कमेटी को भंग करने का किया था। हड़बड़ी में काम करना और उनका बंटाढार होने पर भ्रष्टों का बचाव करना पूर्ववर्ती सरकार का पहला कदम था।

यदि विधिवत योजना बनाकर उनका समय सीमा में क्रियान्वयन किया जाता तो आज प्रदेश की तस्वीर ही अलग होती। उसे प्रदेश के विकास के लिए उद्योगपतियों को आमंत्रित करने की नौटंकियां नहीं करना पड़ती। उससे हासिल भी क्या हुआ ? निवेशक आए, ठहरे, भाषण, खाना-पीना किया और चलते बने। कई एमओयू पर हस्ताक्षर हुए, पर उनमें से एक दर्ज़न भी परवान न चढ़ सके। सरकारी धन की बर्बादी हुई सो अलग। अब यही सरकार अपने पांच साला कार्यकाल में से मात्र सौ दिन विकास के लिए चुन रही है तो उसकी नीति और नीयत पर शुबहा होना लाज़मी है।

वैसे भी शिवराज सरकार को सौ दिनी कार्ययोजना बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है। विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने प्रदेश के विकास का एक घोषणापत्र जारी किया था। अब जबकि उसकी सत्ता में वापसी हो चुकी है तो उसे ईमानदारी से घोषणापत्र के आधार पर काम शुरू कर देना चाहिए। लेकिन राजनीति के जानकारों की मानें तो घोषणापत्र मतदाताओं को छलने के लिए ही होते हैं। 2003 के चुनावी घोषणापत्र में भाजपा ने वादा किया था कि प्रदेश में वृत्ति कर समाप्त कर दिया जाएगा। भाजपा की सरकार पूरे पांच साल चली, किंतु इस महत्वपूर्ण घोषणा को पूरा करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इसके विपरीत पिछली सरकार के मुखिया, शिवराज सिंह चौहान पंचायतों-महापंचायतों की नौटंकियां करने में लगे रहे। और अब जबकि वे फिर से सत्ता की सवारी कर रहे हैं, यही कारनामे जारी हैं। भाजपा का चुनावी घोषणापत्र मुख्यमंत्री सचिवालय की किन्ही फाइलों, में बंद है और मुख्यमंत्री के निर्देश पर सौ दिन की कार्ययोजना बनाने का दिखावा किया जा रहा है।

भाजपा की सत्ता में वापसी भले ही हो गई हो, पर नौकरशाही पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। तहसील कार्यालयों में नामांतरण और ज़मीन की नपती जैसे साधारण दैनंदिनी कार्यों के लिए आम जनता को या तो भेंट चढ़ाना पड़ रही है या जूते घिसने को मज़बूर होना पड़ रहा है। यही हाल ग़रीबी की रेखा के नीचे रहने वालों के राशन कार्ड बनाने का है।

हालत यह है कि राजधानी के कलेक्टर को खुद मुख्यमंत्री को हटाना पड़ रहा है। इससे सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि प्रदेश के सुदूर अंचलों में प्रशासनिक अधिकारी किस कदर लूटखोरी कर रहे होंगे। इससे साफ़ हो गया है कि सरकार नौकरशाही पर लगाम कसने में नाकाम साबित हो रही है और इन नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए सौ दिनी कार्ययोजना जैसी नौटंकियों के ज़रिये जनता का धयान बांटने की कोशिश कर रही है। इसलिए कहा जा सकता है कि प्रदेश की जनता को फिर पांच साल तक प्रशासनिक अत्याचार और सरकार की नौटंकियां झेलना पड़ेगी, जिसका फिलवक्त कोई विकल्प नज़र नहीं आता।

 

 

महेश बाग़ी