संस्करण: 18 अक्टूबर-2010  

सिमी से तुलना पर क्यों बौंखलाया है संघ

 

  ? जाहिद खान

       

            नौजवानों के आईकॉन कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की संघ पर टिप्पणी से समूचा संघ परिवार बौखलाया हुआ है। संघ, खास तौर पर प्रतिबंधित अतिवादी संगठन सिमी से अपनी तुलना पर राहुल गांधी से खफा है। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तर्ज पर संघ और उसके सियासी बाजू बीजेपी के तर्जुमान राहुल गांधी को लगभग चेतावनी भरे लहजे में धमका रहे हैं कि ''राहुल गांधी राष्ट्रवादी संगठन और राष्ट्रद्रोही संगठन के फर्क को समझें और संघ पर इल्जाम लगाने से बाज आएं।'' मुल्क में हालिया बम विस्फोटों में संघ परिवार के आनुशंगिक संगठनों के नाम एक के बाद एक आने के बाद, संघ परिवार की इस खिसियाट का अंदाजा लगाया जा सकता है। पहले ही अपनी खराब छवि से जूझ रहे संघ को अब समझ में नहीं आ रहा है कि वह राहुल गांधी के इस सीधो हमले का किस तरह से जबाब दे।

           गौरतलब है कि अभी हाल ही में मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले में युवा कांग्रेसियों के सम्मेलन को मुखातिब करते हुए राहुल गांधी ने कहा था कि कांग्रेस में संघ और सिमी जैसी कट्टरपंथी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले युवाओं को कोई जगह नहीं है। जाहिर है जम्हूरियत और धर्मनिरपेक्षता में यकीन रखने वाला हर हिंदोस्तानी इस बयान से अपना इत्तोफाक जताएगा। दरअसल, जो शख्स संघ और सिमी की विचाराधारा से थोड़ा सा भी वाकिफ है, वह जानता है कि ऐंसे बयानों की मौजूदा दौर में मुल्क की एकता, अखंडता और धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को बरकरार रखने के लिए कितना महत्व है। गोयाकि संघ और सिमी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों ही समान रूप से युवाओं में कट्टरपंथी विचारों के पोशक हैं। सिमी जैसा जिहादी संगठन जहां इस्लाम के नाम पर नौजवानों को गुमराह कर जिहाद की ओर ले जाता है। वहीं संघ बरसों से कथित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर युवाओं को कट्टर हिंदुत्व की तरफ खींच रहा है। सिमी इस्लामी गणतंत्र की कायमगी को लेकर मुल्क में दहशतगर्दी फैला रहा है तो संघ के तसव्वुर में हिंदू ही राष्ट्र है। अपनी कायमगी से हिंदू राष्ट्र का ख्वाब देख रहे संघ का, एक मुल्क के तौर पर भारत और उसके संविधान में कोई आस्था नहीं। सिमी के संविधान को उठाकर देखें तो इसमें मुल्क को मजहबी बिना पर बांटने की बात साफ कही गई है। सिमी भारतीय राष्ट्रवाद के खिलाफ है और वह उसकी जगह बैनुल अकवामी इस्लामी निजाम लाने के लिए काम करता है। वहीं संघ को जो करीब से जानता है, उसे अच्छी तरह से पता है कि संघ ऐंसा संगठन है जो खुले आम लोकतांत्रिक, संघीय एवं धर्मनिरपेक्ष भारत के अस्तित्व की निंदा करता है।

           बीजेपी के वरिष्ठ लीडर लालकृष्ण आडवाणी संघ का बचाव करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी 'भूमिका' की तारीफ करते नहीं अघा रहे हैं। जबकि इसके उलट संपूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन में संघ एक अकेला ऐंसा संगठन है, जिसने न सिर्फ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चलाए गए आजादी के आंदोलन की निंदा की बल्कि भगत सिंह जैसे शहीदों और उनके तमाम साथियों की कुर्बानी का मखौल उड़ाया। दरअसल, छद्म राष्ट्रवाद और बहुसंख्यक समाज की धार्मिकता का स्वांग आरएसएस के अहम औजार हैं। और जाहिर है जब भी वह कठघरे में आता है तो इन्हीं औजारों का सहारा लेता है। राहुल गांधी के इस साहसिक बयान के बाद पूरा संघ परिवार अपने आप को बचाने के लिए मोर्चेबंदी में जुट गया है। रोज-ब-रोज राहुल गांधी की मुखालफत में नए-नए बयान आ रहे हैं। मुल्क को यह बतलाया-जतलाया जा रहा है, कि संघ राष्ट्रीय विचारधारा से जुड़ा सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन है और मुल्क की एकता और अंखडता कायम रखने में इसकी हमेशा भूमिका रही है। लेकिन इन बयानबाजियों से उलट सच्चाई कुछ ओर है।

           अपने आपको महज सांस्कृतिक संगठन कहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक के कथित महान नेताओं, सरसंघचालक हेडगेवार और गुरू गोलवलकर के अलग-अलग वक्त दिये गये बयानों से उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का खुलासा होता है। साथ ही इस बात का भी पता चलता है कि वे दरअसल भारत को क्या बनाना चाहते हैं? हमारे राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की आन-बान-शान के लिये हजारों वतनपरस्तों ने अपनी जान हँसते हुये देश पर न्यौछावर कर दी। इसके उलट आरएसएस खुले आम राष्ट्रीय झंडे की निंदा करता है उसे अपमानित करता है। आरएसएस की सभी शाखाओं में आज भी तिरंगे झंडे की बजाय भगवा झण्डा फहराया जाता है और उसे ही पूजा जाता है। भारतीय संविधान के लिये आरएसएस के दिल में क्या इज्जत-एहतराम है, गुरू गोलवलकर के इस वक्तव्य से समझी जा सकती है ''हमारा संविधान भी पश्चिमी देशों के संविधानों में से लिये गये विभिन्न अनुच्छेदों के एक भारी भरकम तथा बेमेल अंशों का संग्रह मात्र है उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसको कि हम अपना कह सकें। उसके निर्देशक सिध्दांतों में क्या एक भी शब्द इस संदर्भ में दिया है कि हमारा राष्ट्रीय जीवन उद्देश्य तथा हमारे जीवन का मूल स्वर क्या है?''

           धर्मनिरपेक्षता भारत के संविधान का अहम पहलू है लेकिन आरएसएस में चलने वाली प्रार्थना और प्रतिज्ञा भारतीय धर्मनिरपेक्षता के अस्तित्व का खुला विरोधा करती है। इसके अलावा आरएसएस लोकतंत्र के सिध्दांतों के विपरीत लगातार ये मांग करता रहा है कि भारत एक तानाशाही शासन द्वारा शासित हो। संघ परिवार के पूज्यनीय गुरू गोलवलकर ने 1940 में मद्रास में कार्यकर्ताओं के सामने तकरीर देते हुये एलान किया था कि ''एक धवज के नीचे, एक नेता के मार्गदर्शन में, एक ही विचार से अनुप्राणित होकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हिन्दुत्व की प्रखर ज्योति इस विशाल भूमि के कोने-कोने में प्रज्वलित कर रहा है।'' दरअसल एक झण्डा, एक नेता और एक विचारधारा का यह नारा सीधो यूरोप की नाजी एवं फासिस्ट पार्टियों के कार्यक्रम से लिया गया है। संविधान का संघीय ढांचा जो भारतीय राजनैतिक व्यवस्था का एक बुनियादी पहलू है, आरएसएस उसके एकदम खिलाफ है। अपनी किताब 'विचार नवनीत' में गुरू गोलवलकर 'एकात्मक शासन की अनिवार्यता' अध्याय में लिखते हैं ''इस लक्ष्य की दिशा में सबसे महत्व का और प्रभावी कदम यह होगा कि हम अपने देश के विधान से सांघिक ढांचे की सम्पूर्ण चर्चा को सदैव के लिये समाप्त कर दें, एक राज्य के अर्थात भारत के अंतर्गत, अनेक स्वायत्ता अथवा अर्ध्द स्वायत्ता राज्यों के अस्तित्व को मिटा दें तथा एक देश, एक राज्य, एक विधान मण्डल, एक कार्यपालिका घोषित करें। उसमें खण्डात्मक, क्षेत्रीय, साम्प्रदायिक, भाषायी अथवा अन्य प्रकार के गर्व का चिन्ह भी नहीं होना चाहिए एवं इन भावनाओं को हमारे एकत्व के सामंजस्य को उध्दवंस करने का अवकाश नहीं मिलना चाहिए। संविधान का पुन: परीक्षण एवं पुन:र्लेखन हो।''

           मुल्क के स्वतंत्रता आंदोलन, संविधान और राष्ट्रीय ध्वज के जानिब संघ के इन 'राष्ट्रवादी' विचारों के बाद भी संघ का दावा है कि ''राष्ट्रीयता उसके लिए सर्वोपरि रही है और वह राष्ट्र के विकास का मार्ग दर्शाता है।'' संघ, राष्ट्र के विकास का मार्ग किस तरह से प्रशस्त कर रहा है ? आईए अब इस पर जरा नजर डालें। किसी भी संगठन या पार्टी द्वारा सांप्रदायिकता का इंसानियत मुखालिफ इस्तेमाल, मुल्क के लिए विनाशकारी, घृणित और निंदनीय है। लेकिन संघ अपने कयाम से लेकर आज तक बहुसंख्यकों को अपने धर्म के बाहर के लोगों से नफरत करने के लिए संगठित कर, उसे अपने मन मुताबिक इस्तेमाल करता रहा है। गोयाकि, आजादी के पूर्व और बाद मुल्क में जितने भी साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं, उसमें संघ की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका रही है। साम्प्रदायिक दंगों पर गठित तमाम जांच आयोग और कमीशन अपनी तहकीकात में यह साबित कर चुके हैं कि, दंगों में संघ परिवार बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी करता है। आठवे-नंवे दशक में उत्तरप्रदेश, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगे इसकी जीती जागती मिसाल हैं। साल 1927 में नागपुर से शुरु हुई संघ की साम्प्रदायिक हिंसा आज तलक जारी है। कल तक वह साम्प्रदायिक घृणा फैलाने का काम और छोटे-मोटे दंगे कराता था। लेकिन अब यह दंगे सामूहिक नरसंहार की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। साल 2002 का गुजरात इसकी एक छोटी सी मिसाल भर है। इसके बावजूद जब भी आरएसएस पर साम्प्रदायिकता और आतंकवाद पोषित करने का इल्जाम लगता है तो, वह संगठित होकर यह प्रचार करने लगता है कि ''यह इल्जाम राजनीति से प्रेरित हैं।''

           राहुल गांधी के बयान से संघ परिवार को सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात की हुई है, कि उसकी तुलना प्रतिबंधित कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन सिमी से की गई है। जबकि खुद संघ, सिमी की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों की आलोचना में पेश-पश रहा है। यह बात सच है कि साल 1977 में कायम हुए स्टूडेंट्स इस्लामिक मूव्हमेंट ऑफ इंडिया यानी सिमी को उसकी गैर कानूनी और देशद्रोही गतिविधियों को देखते हुए भारत सरकार ने साल 2001 में उस पर पाबंदी लगा दी थी। जो आज तलक बरकरार है। लेकिन संघ भी दूधा का धुला नहीं है। सिमी को राष्ट्रद्रोही और अपने आप को राष्ट्रवादी संगठन कहने वाले संघ की असल हकीकत यह है कि उस पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के इल्जाम में हिंदुस्तानी हुकूमत, आजादी के बाद से 3 मर्तबा पाबंदी लगा चुकी है। संघ पर पहली पाबंदी 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या और साम्प्रदायिक घृणा फैलाने के इल्जाम में लगी तो दूसरी इमर्जेंसी में। साल 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस और मुल्क के कई हिस्सों में साम्प्रदायिक दंगों के बाद एक बार फिर उस पर पाबंदी लगा दी गई। इन पाबंदियों के बावजूद, संघ बिल्कुल भी नहीं सुधारा। और हर बार पाबंदी हटते ही दोबारा उन्हीं गतिविधियों में लिप्त हो जाता है, जैंसा कि कुछ हुआ ही नहीं। बल्कि अब तो अपने खतरनाक मंसूबों को पूरा करने के लिए उसे आतंकवाद से भी कोई गुरेज नहीं। मालेगांव बम विस्फोट के सिलसिले में, महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद विरोधी दस्ते द्वारा जनवरी 2009 में अदालत में दायर की गई चार्जशीट का गंभीरता से अध्यन करने पर मालूम चलता है कि, हिंदुत्ववादी आतंक अब उसकी कार्यपध्दति का अहमतरीन हिस्सा बन चुका है। यदि संघ की गैर कानूनी गतिविधियों पर अंकुष नहीं लगाया गया और उसे नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह संगठन अपनी विध्वंसकारी गतिविधियां आगे भी जारी रखेगा। जनमानस को प्रदूशित करेगा और साम्प्रदायिक विद्वेश पैदा कर मुल्क के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नुक्सान पहुंचाएगा। हमारे मुल्क के आंतरिक सुरक्षा विषेशज्ञों का मानना है कि, संघ सिलसिलेवार बम विस्फोट कर मुल्क के माहौल को खराब करना चाहता है। मालेगांव बम विस्फोट की तहकीकात के बाद से मुल्क के कई हिस्सों में हुई आतंकवादी वारदातों के सिलसिले में सुरक्षा और खुफिया एजंसियां उस पर निगाह रखे हुए हैं। खुद गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने अभी हाल ही में पुलिस अफसरों के एक सम्मेलन में दहषतगर्दी के भगवा चेहरे को मुल्क का सबसे बड़ा दुश्मन बतलाया था।

           कुल मिलाकर, संघ और सिमी एक जैसी कट्टरपंथी विचारधारा का नाम हैं। इनके साथ जरा सी भी रियायत या इनकी हिमायत करना हिंसा और आतंक को शह देना होगा। संघ कहता है कि महात्मा गांधी की हत्या उसने नहीं की, लेकिन क्या वह इस सच्चाई से मुंह झुठला सकता है कि, नाथूराम गोडसे ने जिस विचारधारा के असर में आकर बापू की हत्या की, वह संघ ने उसके दिलो दिमाग में नहीं भरी थी। राहुल गांधी के बयान की आलोचना करने वाले संघ परिवार को चाहिए कि वह सबसे पहले अपने गठन से लेकर अब तक के क्रियाकलापों का आत्मावलोकन करे। फिर उन्हें कोई नसीहत दे। कट्टरपंथी विचारधारा दुनिया में किसी भी मुल्क के मुस्तकबिल के लिए ठीक नहीं। यदि राहुल गांधी ने नौजवानों को कट्टरपंथी विचारधारा से दूर रहने के लिए कहा है, तो ठीक ही कहा है। आज हमारे मुल्क के सामने सबसे बड़ा खतरा बढ़ती साम्प्रदायिकता और आतंकवाद है। और यह सोची समझी बात है कि साम्प्रदायिकता और आतंकवाद का रिश्ता धार्मिक कट्टरता से जुड़ा है। लिहाजा, जो संगठन धार्मिक कट्टरता और साम्प्रदायिक वैमनस्यता फैलाने में लगे हुए हैं, उनसे नौजवानों को सावधान करने के अलावा उन पर समय रहते निर्णायक कार्रवाई भी जरूरी है। वरना, साम्प्रदायिकता और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जुबानी जमा खर्च तक ही महदूद होकर रह जाएगी, उससे आगे नहीं बढ़ेगी।

 

? जाहिद खान