संस्करण: 18 अक्टूबर-2010  

बदल रहा है राजनीति का मौसम

असर दिखा रही है राहुल-आंधी

? राजेंद्र जोशी

     

           मौसम सदैव परिवर्तनशील होते हैं। कभी सर्द तो कभी गर्म होते मौसम झड़ी लगते ही एकदम से बदल जाया करते हैं। वायु के बढ़ते-घटते वेग का भी मौसमों के मिज़ाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है। राजनीति भी एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें मौसम आते हैं मौसम जाते हैं और आंधी तूफानों के थपेड़ों  से प्रभावित होते रहते हैं।

        भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश की नींव राजनीति में आते-जाते मौसमों पर टिकी हुई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की राजनीति में कांग्रेस पार्टी की खिलाफत के लिए जितने भी राजनैतिक दल समय-समय पर बनते-बिगड़ते रहे हैं उनकी अपनी अलग-अलग कहानियां हैं। सन् 1967 के आम चुनाव के बाद सत्ता की लालच में जिस तरह के कतिपय नेताओं ने अपनी सत्ता लोलुपता के चलते संविदा शासन की राजनीति का खेल शुरू किया उसने राजनीति की शूचिता को खंडित करना शुरू किया। उसके बाद से राजनीति के मौसमों में निरंतर उतार-चढ़ाव आता चला गया। राजनीति के कई ऐतिहासिक दौर आये और चले गये। नेहरू युग की राजनीति की अपनी एक पहचान थी। नेहरू युग देश का वह दौर था जब गुलामी के पिंजड़े से मुक्त हुए पंछी की तरह देश ने अपने पंख फैलाकर विश्वाकाश में ऊंचाई तक उड़ने की कवायद शुरू की थी। उस दौर में सचमुच ऐसे अनेक मुकाम तैयार हुए जिसने स्वाधीन भारत की शक्ति से विश्व को चमत्कृत कर दिया था। देश में बड़े-बड़े औद्योगिक तीर्थों के साथ ही देशभक्ति प्रदर्शित करने के ऐसे ऐसे महत्वपूर्ण केंद्र स्थापित हुए जिसने प्रजा को ही राजा की शक्ति का स्त्रोत बना डाला। इंदिरा गांधी की आंधी ने भी राजनैतिक मौसम के दौरान जिस तरह फलों-परिणामों की खेती बढ़ाई उसकी इतिहास के पन्ने सदैव गवाही देते रहेंगे। प्रजातंत्र के इस विशाल देश की प्रजा ने भी राजनैतिक मौसमों की कतिपय खामियों के प्रभाव में आकर मौसम को बदला और संपूर्ण देश जे.पी. आंदोलन के आंधी तूफान से प्रभावित हो उठा और नेहरू इंदिरा युग के राजनैतिक मौसम को बदलकर एक नये तरह का देश की प्रजा को अनुभव दिया एक ही बाग में तरह की जातियों-प्रजातियों के पेड़-पौधो लहलहाने लगे। बाद में फिर एक ऐसी आंधी के झोंके आये जिससे मौसम फिर उसी तासीर का हो गया।

        हमारा देश एक भावना प्रधान देश है। आस्था और विश्वास यहां की जनता की मूल पहचान है। सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक भावनाओं से ओत-प्रोत हैं, यहां के लोगों के दिल और दिमाग। ऐसे कोमल हृदय और संवेदनाओं के धानी लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके कतिपय राजनैतिक दल सदैव ही अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहते हैं। ऐसे माहौम के चलते विभिन्न विचारधाराओं के कारण देश को बांटकर अपना राजनैतिक खेल खेलने में कतिपय दल बहुत ही माहिर हैं। सत्तारूढ़ दलों के खिलाफ विपक्षी दलों की बिछी बिछाते यदाकदा अपना असर दिखाती रहती हैं। झारखंड प्रदेश जैसी राजनैतिक स्थिति और राजनैतिक दलों की सहभागिता तथा उनकी चाल, चोला और चरित्र की हरकतों से तो राजनीति के प्रति आम जनता की विश्वसनीयता खत्म होती जा रही है। पूरे देश में राजनैतिक हॉच-पॉच का ऐसा माहौल बनता जा रहा है जिससे राजनैतिक मर्यादा की सीमाऐं विवादग्रस्त होती जा रही हैं।

        वर्तमान में राजनीति के इस मौसम बदलाव के अभियान का जिस तरह युवाशक्ति ने एक चुनौती के रूप में बीड़ा उठाया है वह निश्चित ही देश में राजनीति के मौसम की कतिपय विभीशिकाओं को खत्म करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शितापूर्ण कदम नज़र आने लगा है। कांग्रेस के युवा सिपहसालार राहुल गांधी ने वर्तमान में देशभर में अपने संकल्प और सपनों की धूम मचाकर आने वाली पीढ़ी के हृदयों में राजनीति की मैली होती जा रही चादर को जिस तरह से धोकर चमकदार छवि बनाने का साहस जुटाया है उससे मौसम के परिवर्तन के आसार दृष्टिगोचर होने लगे हैं। देश के कोने-कोने में पहुंचकर राहुल गांधी अपने परम्परागत और पैतृक गुणों से जिस तरह राजनीति के प्रति अरूचि रखने वाले युवाओं को सक्रियता का संदेश दे रहे हैं वह निश्चित ही देश के खुशहाल भविष्य का संकेत दे रही हैं। इस युवा नेता की प्रत्येक यात्रा उस क्षेत्र के लिए 'राहुल-आंधी' बनकर सारे वातावरण को प्रभावित कर युवाओं में देश, भक्ति, देशप्रेम और देश के प्रति उनमें लगाव पैदा करने में कामयाब हो रही है।

          'राहुल-आंधी' का प्रभाव चुपके चुपके नहीं जम रहा है बल्कि बड़े साहस और दिलेरी के साथ युवा-कोंपलों को संवारने में देखा जा रहा है। आज उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सभी तरफ राजनीति के मौसम की सशक्त परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में युवाओं के हौसले देखे जा रहे हैं। राहुल जो भी देख रहे हैं, सुन रहे हैं और उसके आधार पर उन्हें देश में जो करना चाहिए, वे धाड़ल्ले से कहते और करते जा रहे हैं। कतिपय राजनैतिक और कट्टरपंथी संगठनों को कटु सत्य कभी भी गले नहीं उतर सकता किंतु राहुल अपनी यात्राओं में ऐसी ताकतों के हथियारों को बोथरा करने में जुट गये हैं। राहुल की खरी-खरी टिप्पणियों पर स्वाभाविक है कतिपय विघ्न संतोषियों में खलबली मच जाती हैं किंतु उनका विरोध राहुल आंधी के थपेड़ों की आवाज में गुम हो रहा है। 'राहुल-आंधी' के प्रभाव से बदलते मौसम के अनेक चिन्ह दिखाई देने लगे हैं। उनकी टिप्पणियों पर भाजपा सांसद श्रीमती यशोधारा राजे से मीडिया ने प्रतिक्रिया चाही तो उन्हें कहना पड़ा कि 'राहुल तो उनका बेटा है' समाचार पत्रों में छपा है कि देश में नई सांस्कृतिक क्रांति लाने के नायक बने बाबा रामदेव ने भी राहुल से अकेले में मिलकर गुप्त चर्चा की। आखिर इन सब घटनाओं का सबसे बड़ा यही प्रमाण मिल रहा है कि 'राहुल-आंधी' ने राजनीति के मौसम के स्वरूप को बदलने के लिए अपने ठोस कदम दिलैरी के साथ आगे बढ़ा दिए हैं।


? राजेंद्र जोशी