संस्करण: 18 अक्टूबर-2010  

अयोध्या फैसले पर अतिवादियों का मुँह बन्द क्यों

 

 ? सुनील अमर

           

         योध्या विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला आने के कुछ पहले ही विश्व हिन्दू परिशद के अध्यक्ष अशोक सिंहल ने अचानक यह कहना शुरू कर दिया था कि इस मामले का फैसला संसद में कानून बना कर किया जाना चाहिए, यह न्यायालयों के वश का नही है। श्री सिंहल ने एक और विचित्र बयान दिया था कि श्री आडवाणी की वर्ष 1991 में की गई रथ यात्रा ही गलत थी और ऐसा करके उन्होंने धर्म का राजनीतिकरण किया जो कि बहुत गलत हुआ। उक्त विवाद पर अपनी रणनीति स्पष्ट करते हुए श्री सिंहल ने बताया था कि देश के प्रमुख 120 मंदिरों में उन्होंने हनुमान चालीसा का पाठ शुरू करवा दिया है और हिन्दू जन-मानस को जागृत करने का प्रयास किया जा रहा है। उस दौरान श्री सिंहल के बयानों से लग रहा था कि माना एक बार फिर '92 जैसे हालात पैदा करने की कोशिश में विश्व हिन्दू परिषद है। और श्री सिंहल ही क्यों, भाजपा के भी विनय कटियार सरीखे नेता आग उगलना शुरु ही कर दिये थे। वयोवृध्द आडवाणी भी कुछ ऐसा बोलने लगे थे, जैसे कि एक नये सिरे से कोई आन्दोलन शुरू होने जा रहा है। सांगठनिक और कार्यकर्ता स्तर पर भी ऐसे संगठनों की गतिविधियाँ कुछ इस तरह हो चली थीं कि लोगों में खौफ तारी होने लगा था। रही सही कसर उ.प्र. की मुख्यमंत्री मायावती ने भारी फौजों की तैनाती करके कर दी थीं। जनता के मन में यह भय बैठ गया था कि फैसले के बाद जरुर कोई बवाल होगा। लोगों ने वह सारे एहतियात बरत लिये थे जो कि कर्फ्यू आदि लगने के अंदेशे पर बरते जाते हैं। फैसले के बाद जनता तो जस की तस ही रही है, लेकिन बड़े-बड़े बोल बोलने और उन्मादी अभियान चलाने का मंसूबा बाँधाने वालों के मुँह जरुर बंद हो गये हैं।

            तो फिर किस उम्मीद में थे ये कथित हिन्दूवादी नेत? वास्तव में अदालत के इस तरह के फैसले की आशा तो शायद किसी को ही नहीं थी। मुस्लिम नेता और संगठन दबे स्वर से यह जरुर कहते थे कि फैसला माफिक न होने पर वे सर्वोच्च न्यायालय जायेंगें लेकिन इसमें कहना क्या, यह तो दिन की रोशनी की तरह साफ ही था। फैसले के बाद असल समस्या तो विहिप और भाजपा को हो गयी कि वे जिस माँग को लेकर इतना हल्ला मचाये हुए थे वह तो लगभग पूरी हो गयी, तो अब उनके आन्दोलन की कट्टरता का आधार क्या हो ? ऐसा लगता है कि इस फैसले से ये सब सदमे में आ गये हैं और इनकी बोलती बंद हो गयी है। 120 मंदिरों में चल रहा अनवरत हनुमान चालीसा का पाठ भी अब बंद हो गया है।

           वास्तव में संघ, भाजपा और विहिप यह उम्मीद लगाये बैठे थे कि चूँकि विवाद बाबरी मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक़ को लेकर है और आज तक सभी हिन्दूवादी संगठन यही कहते आये हैं कि एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो या फिर जो कहा सो किया, या फिर ये कि सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनायेंगें आदि तो फिर जाहिर है कि वह मस्जिद ही थी। इन संगठनों को इसी आधार पर उम्मीद थी कि फैसला तो मुसलमानों के पक्ष में ही होना है, और इस प्रकार इन्हें एक बार फिर बासी कढ़ी में उबाल लाने का मौका मिल जायेगा। यकीन मानिये, इनमें से तमाम की बाँछें खिली हुई थीं।

           ऐसे अतिवादियों को काफी निराशा उन हिन्दुओं से भी हुई है जिन्हें वह अपने पाले में समझते थे और उम्मीद रखते थे कि उनके निराश और आन्दोलित होने पर ये हिन्दू भी निराश और आन्दोलित हो जायेंगें। उन्हें सबसे ज्यादा निराशा तो मुसलमानों से हुई है, जिन्होंने ने प्रशंसनीय धीरज का परिचय दिया है। अयोध्या तो इस दौरान वीतरागी भाव में रही। न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर। यह समझा जा सकता है कि अगर अयोध्या शांत न रहती तो क्या बाकी देश शांत रह सकता था? अयोध्या का एक हल्ला, बाकी देश में हजार हल्ला बनकर पहुच जाता। शासन का भी सारा प्रयास अयोध्या को ही संभालने में लगा था। अयोध्या में जिस तरह देशी-विदेशी मीडिया का जबर्दस्त जमावड़ा 24 सितम्बर के बाद से 10 दिनों तक बना रहा, उससे इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें भी विहिप और भाजपा की तरह ही दोनों समुदायों के भड़क उठने की या अतिवादी संगठनों द्वारा कुछ किये जाने की पूरी उम्मीद रही होगी।

           भाजपा और विहिप के सामने इस बार सर्वथा नये तरह का संकट है। एक तो उक्त फैसले ने उनके हाथ आते-आते एक जबर्दस्त मुद्दे को खत्म कर दिया, दूसरे, इस मामले से उब चुके लोगों ने बहुत ठंढ़े मन से सिर्फ फैसले का इंतजार किया। उधर मीडिया की अतिषय सक्रियता ने फैसला आते ही यह बताना शुरु कर दिया कि अब इसके बाद उस स्थान पर वास्तविक मालिकाना हक़ किसका बनता है, और भाजपा व विहिप की वैधानिक स्थिति वहाँ क्या है। अयोध्या में विवादित स्थल पर जिस निर्मोही अखाड़े का हक़ बना है, उसे पटाने के लिए विहिप व भाजपा ने जाल फेंकना शुरु कर दिया है। इस प्रकार अब स्थिति यह है कि न तो इन संगठनों के पास जमीन का मालिकाना हक़ है कि ये मंदिर निर्माण का हल्ला मचा सकें और न मुद्दा ही बचा कि उक्त स्थल हिन्दुओं को दिया जाय।

           एक दूसरी तरह का अंतर तब और अब की परिस्थितियों में यह आ गया है कि समाज में सोच और समझ के स्तर पर बड़ा परिवर्तन हो चुका है। कहा जा सकता है कि देश की नदियों में काफी पानी बह चुका है। वर्ष 1992 में जिस पीढ़ी ने जन्म लिया था वह अब बालिग होकर देश में सरकार चुनने वाली मतदाता बन चुकी है। उसने वह वाकया देखा नहीं सिर्फ सुना है और इक्तफाक़ से इस देश का मिजाज़ ही अपने इतिहास को भूलने का रहा है। सो, इस पीढ़ी को बीती और कटु बातों को याद न करने में ही अपनी भलाई और अपना भविष्य दिखता है। ऐसी उम्मीद बंधाती है कि यह पीढ़ी उकसाने पर उकसने वाली नहीं है। अयोध्या मामले में बाबरी मस्जिद की तरफ के मुद्दई वयोवृध्द श्री हाषिम अंसारी ने जिस तरह से सद्भावना का परिचय देते हुए यह ऐलान किया है कि वे अब इस विवाद को सर्वोच्च न्यायालय नहीं ले जाना चाहते तथा चाहते हैं कि यह मामला अगली पीढ़ी के लिए न छोड़ा जाय, अगर इसी तरह की कोई घोषणा हिन्दुओं की तरफ से भी की जाती तो निश्चित ही यह सद्भावना की अप्रतिम मिसाल होती। यहाँ यह जानना चाहिए कि श्री हाशिम से ज्यादा उम्र के निर्मोही अखाड़ा के महन्थ भास्कर दास हैं, लेकिन अफसोस कि ऐसी कोई घोशणा अभी तक वे नहीं किये हैं, और हिन्दू पक्ष सिर्फ हाशिम मियाँ से ही सारी कुर्बानी चाह रहा है।


? सुनील अमर