संस्करण: 18 अक्टूबर-2010   

गले तक भ्रष्टाचार में डूबी कर्नाटक सरकार का पतन तो होना ही था

? एल.एस.हरदेनिया

            

             न् 2008 में संपन्न चुनावों के बाद कर्नाटक में पहली बार भाजपा की सरकार बनी। कर्नाटक क्या दक्षिण भारत में पहिली बार भारतीय जनता पार्टी को सत्ता का स्वाद चखने का अवसर मिला था। कर्नाटक में भाजपा की विजय के अनेक कारण थे। उसमें जनता दल (सेक्यूलर) द्वारा किया गया अत्यधिक गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण था। उस समय संघ परिवार कर्नाटक में मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने में सफल रहा था। कर्नाटक में अनेक सांप्रदायिक दंगे हुए थे। जिसके चलते भाजपा अपना हिन्दू वोट बैंक बनाने में सफल हुआ था।

         मुझे 2008 के चुनाव के कुछ दिनों पहिले कर्नाटक जाने का अवसर मिला था। मुझे अपने प्रवास के दौरान ही यह स्पष्ट महसूस हुआ था कि वहां अगली सरकार भाजपा की बनेगी। वहां सांप्रदायिकता का विष इतना फैल चुका था कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद(एबीव्हीपी)  हिन्दू छात्र-छात्राओं को आदेशित करती थी कि वे मुस्लिम छात्र छात्राओं से किसी भी प्रकार का संबध न रखे। यहां तक कि वे उनसे बात तक न करें।  

         इस हद तक ध्रुवीकरण के बावजूद भाजपा विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर पाई। कर्नाटक की विधानसभा की सदस्य संख्या 224 है। चुनाव में भाजपा को कुल 110 सीटे मिली। बहुमत हासिल करने के लिए उसे तीन और विधायकों की आवश्यकता थी। बहुमत हासिल करने के लिए भाजपा के नेतृत्व ने सबसे पहिले निर्दलीय सदस्यों का समर्थन हासिल किया। प्रारंभ में 6 स्वतंत्र विधायक भाजपा  के साथ हो  लिए। फिर भाजपा ने जनता दल (सेक्यूलर) और कांग्रेस के सदस्यों की घेराबंदी की। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत 7 विधायक भाजपा के साथ हो लिए। इस तरह सत्ताधारी पार्टी की कुल संख्या 123 हो गई। जो स्थिर सरकार के लिए यथेष्ठ थी। इन सभी सदस्यों को भाजपा की तरफ खीचने में रेड्डी बन्धुओं की प्रमुख भूमिका थी। इन रेड्डी बन्धुओं को कर्नाटक में भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का सिरमौर समझा जाता है। रेड्डी बन्धुओं के विरूध्द आरोप है कि इन्होंने गैर कानूनी ढंग से करोड़ो रूपयों का लौह अयस्क निकालकर बेचा है। आरोपित है कि इन्होंने 1200 करोड़ रू. का अयस्क देश के बाहर भेजा है। इनके विरूध्द मीडिया में बहुत कुछ लिखा गया है। इंडियन एक्सप्रेस ने इन्हें बैल्लारी जिले का ''महाराजा'' निरूपित किया है जहां लौह अयस्क की खदानें स्थित हैं। बैल्लारी और उसके आसपास के क्षेत्रों में इनका एक क्षेत्र राज चलता है। यहां तक कि रेड्डी बन्धुओं की इजाजत के बिना पुलिस थाने में रिपोर्ट भी नहीं लिखी जाती है। उस क्षेत्र में अधिकारियों की पदस्थापनायें रेड्डी बन्धुओं की मर्जी से होती है। यह जगजाहिर है कि रेड्डी बन्धुओं के ऊपर लोकसभा में भाजपा की नेता सुषमा स्वराज का हाथ है। यह दावा किया जाता है कि जब तक इन्हें सुषमा स्वराज का आर्शीवाद प्राप्त है तब तक ''भगवान'' भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। सुषमा स्वराज के अतिरिक्त इन्हें अनंत कुमार का भी समर्थन प्राप्त है। रेड्डी बन्धुओं के गुट को मुख्य मंत्री के गुट से भी ज्यादा शक्तिशाली माना जाता है। रेड्डी बन्धुओं ने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को अनेक बार सताया है। जिन विधायकों ने विद्रोह किया उनकी शिकायत है कि रेड्डी बन्धुओं को अनावश्यक महत्व दिया जाता है। रेड्डी बन्धुओं के विरूध्द की जा रही जांच में डाली जाने वाली बाधाओं से नाराज होकर कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया था। इस तरह यह कहा जा सकता है कि कर्नाटक में भाजपा के वर्तमान संकट के लिए रेड्डी बन्धुओं का प्रभाव और उनका भ्रष्टाचार भी काफी हद तक जिम्मेदार है। जहां तक भ्रष्टाचार का सवाल है। रेड्डी बन्धुओं के भष्टाचार के अतिरिक्त स्वयं मुख्यमंत्री और कुछ अन्य मंत्रियों के भ्रष्टाचार ने भी भाजपा सरकार को अस्थिर करने में भूमिका अदा की है। स्वयं मुख्यमंत्री पर आरोप है कि अपने पुत्रों को लाभ पहुंचाने के लिए बंगलौर में एक एकड़ बेशकीमती जमीन के उपयोग में परिवर्तन किया। बाद में 5 एकड़ जमीन के उपयोग परिवर्तन की इजाजत दे दी। इसी तरह लोकायुक्त द्वारा की गई जांच में सामने आया कि इन्फारमेशन टेक्नॉलाजी मंत्री कट्टा सुब्रमन्दा नायडू के परिवार वालों ने एक अत्यधिक मूल्यवान सरकारी जमीन पर अपना कब्जा दिखाकर उसे एक आईटी कंपनी के लिए सरकार द्वारा खरिदवाकर बेच डाला। इससे उन्हें लाखों रूपये का लाभ हुआ। मेडीकल शिक्षण मंत्री रामचन्द्र गौड़ा को उस समय त्यागपत्र देना पड़ा जब उनके विरूध्द यह आरोप लगा कि उन्होंने दो मेडीकल कालजों के स्टाफ से अनियमितता का सहारा लेकर अपने चहेतों को भर्ती कर दिया। लोकायुक्त की जांच में यह पाया गया कि छ:ह हजार करोड़ की कीमत का लौह अयस्क गैर कानूनी तरीके से निर्यात कर दिया। यह आरोप लगभग सही साबित हो गया। उसके बावजूद रेड्डी बन्धुओं के विरूध्द कोई भी कार्यवाही नहीं हुई यहां तक कि उन्हें मंत्रिपरिषद से नहीं निकाला गया। इसके ठीक विपरीत रेड्डी बन्धुओं की सिफारिशों पर अनेक विधायकों को मंत्री बनाया गया और अनके मंत्रियों को मंत्रिपरिषद से निकाला गया। इसी तरह हाऊसिंग मंत्री एम.एन.सेट्टी ने किसानों से सस्ती दर में जमीन खरीद ली और फिर उसी क्षेत्र में जहां जमीन खरीदी गई वहीं हाऊसिंग का एक प्रोजेक्ट मंजूर कर दिया गया और फिर खुद के द्वारा खरीदी जमीन का हाऊसिंग बोर्ड क़ो बेच डाला।

            इस तरह 2008 से ही कर्नाटक की भाजपा सरकार एक के बाद दूसरे संकट में फंसी रही। एक तरफ उसे जबरदस्त गुटबाजी का सामना करना पड़ा दूसरी ओर मंत्रियों के भ्रष्ट आचरण के मामले उजागर होने से कर्नाटक की सरकार की प्रतिष्ठा धूल धूसरित हो गई थी। इन विपरीत परिस्थितियों के चलते कर्नाटक की सरकार का अध:पतन होना ही था। विश्वास मत में भले ही वहां की सरकार बच जाए परंतु यह सरकार कर्नाटक की जनता का विश्वास खो चुकी है जिसे वापिस पाना उसके लिए लगभग असंभव है।

 

? एल.एस.हरदेनिया