संस्करण: 18 अक्टूबर-2010

 कर्नाटक में लोकतंत्र की हत्या

 ? महेश बाग़ी

                       

      बसे अलग चाल, चरित्र और चेहरे की दुहाई देने वाली भारतीय जनता पार्टी का असली चेहरा कर्नाटक में सामने आ गया है। मुख्यमंत्री वाई.एस. येदियुरप्पा ने जिस तरह बहुमत सिध्द होने का दावा किया है, उससे लोकतंत्र शर्मसार हुआ हैं। विधानसभा का सत्र इसलिए बुलाया गया था कि येदियुरप्पा बहुमत साबित करें, किंतु सदन में इस संबंधी न प्रस्ताव रखा गया और न ही मतदान कराया गया। विधानसभा अध्यक्ष ने सीधो घोषणा कर दी कि बहुमत साबित हो गया। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी विधानसभा अध्यक्ष ने निर्दलीय विधायकों को अयोग्य करार दे दिया हो। जब इन निर्दलीय विधायकों ने दलबदल नहीं किया था तो उन्हें दलबदल कानून के तहत अयोग्य कैसे ठहरा दिया गया ? क्या यह क़ानून कैसे दुरुपयोग और लोकतंत्र का अपमान नहीं हैं?

         कायदे से येदियुरप्पा को उसी वक्त इस्तीफा दे देना चाहिए था, जब 16 विधायकों ने उनकी सरकार के प्रति अविश्वास जताया था। ऐसा न कर बगैर मतदान कराए विश्वास मत हासिल होने की घोषणा करना सरासर बेईमानी है, जिसने भाजपा के चेहरे पर चस्पे नैतिकता के कथित मुखौटे को उतार दिया है। इससे यह भी सिध्द हो गया है कि येदियुरप्पा की सरकार जमाखोरों के जमघट के अलावा और कुछ नहीं है। ख़ास बात यह है कि येदियुरप्पा सरकार के अल्पमत में होने के पीछे भाजपा के ही एक वरिष्ठ राजनेता का हाथ है, जो खुद मुख्यमंत्री पद पाने की महत्वकांक्षा पाले बैठे है। इस दृष्टि से इस संकट के लिए खुद भाजपा ही जिम्मेदार है।

         किसी भी सदन में मतदान के समय उस सदन के सदस्यों के अलावा कोई और व्यक्ति उपस्थित नहीं हो सकता, लेकिन कर्नाटक विधानसभा में तो पुलिस तक बुला ली गई थी। आनन-फानन में विधानसभा अध्यक्ष ने 16 विधायकों को अयोग्य करार दिया और बहुमत सिध्द होने की घोषणा कर दी गई। नियमानुसार सदन के प्रत्येक सदस्य की राय ली जाना थी या मतदान कराया जाना था, किंतु भाजपा ने लोकतंत्र का चीरहरण करते हुए सीधो विश्वास मत पाने की घोषणा कर दी। क्या आवाज लगा कर बहुमत साबित किया जा सकता है ? सबसे आश्चर्य जनक तथ्य तो यह है कि सारे टी.वी. चैनल्स ने सच्चाई जाने बग़ैर समाचार जारी कर दिए कि येदियुरप्पा सरकार ने बहुमत साबित कर दिया। टीवी चैनल्स की इस ग़ैर जिम्मेदाराना हरक़त की भी निंदा की जाना चाहिए। ये लोग अपनी ज़िम्मेदारी कब समझेंगे !

         यहां 1969 में उत्तर प्रदेश की चरण सिंह सरकार का उदाहरण देना प्रासंगिक होगा। संयुक्त विधायक दल की उस सरकार के मुख्यमंत्री चरण सिंह जब पूर्वी उत्तर प्रदेश के दौरे पर थे, तब लखनऊ से ख़बर आई कि कुछ निर्दलीय विधायकों ने उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। इस कारण उनकी सरकार अल्पमत में आ गई है। चरण सिंह ने तत्काल सरकारी वाहन छोड़ा और एक टैक्सी बुलवा कर उसमें बैठे। इतना ही नहीं, उन्होंने वहीं से अपना इस्तीफ़ा राज्यपाल को भेज कर कहा कि अब उन्हें पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है। इसे कहते हैं लोकतंत्र में आस्था, लेकिन चाल, चरित्र और चेहरे का दंश भरने वाली भाजपा की बेशर्मी तो देखिए कि वह खुलेआम सत्ता की खरीद-फरोख्त करती नज़र आई और विधानसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सत्ता की नीलामी करता रहा। लोकतांत्रिक व्यवस्था के चीरहरण का ऐसा दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है। खेदजनक तथ्य यह है कि सत्ता की नीलामी करने वाली भाजपा बड़ी बेशर्मी से कह रही है कि कुछ विधायकों को धन देकर ख़रीदा गया है। यदि ऐसा है तो भाजपा धन देने वाले व्यक्ति का नाम उजागर क्यों नहीं करती ? क्या इसलिए कि इससे उसी के नंगे होने का डर है ? अपने दल के अंतरकलह को छुपा कर दूसरों पर दोष मढ़ना कहां कहा न्याय है ?

            सवाल भाजपा या कांग्रेस का नहीं है। सवाल लोकतंत्र और उसकी अस्मिता का है और भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि उसकी आस्था लोकतंत्र में नहीं, बल्कि मुनाफ़ाखोरों में है। ऐसी स्थिति में कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश कर ठीक ही किया है। उनकी इस सिफारिश से राज्य में सरकार बनाए रखने के लिए चल रही सौदेबाजी पर विराम लगाएगा। लोकतंत्र की मर्यादा का तकाज़ा भी यही है कि केंद्र सरकार कर्नाटक में तत्काल राष्ट्रपति शासन लागू कर दे। भाजपा आलाकमान को भी चाहिए कि वह राज्यपाल की अनुशंसा का सम्मान करे और येदियुरप्पा को इस्तीफा देने के लिए बाध्य करें। यदि ऐसा नहीं होता है तो आम जनता में यहीं संदेश जाएगा कि भाजपा के लिए लोकतंत्र से बढ़ कर सत्ता में बने रहना और उसके लिए सौदेबाजी करना महत्वपूर्ण हैं ?

 

 ? महेश बाग़ी