संस्करण: 18  जून-2012

कई लाड़लियों को है रोजी-रोटी की तलाश

कूड़े-कर्कट के आसपास

? राजेन्द्र जोशी

               स्तियों में जगह-जगह कूड़े-कर्कटों के ढेरों के आसपास कंधों पर बड़ा सा बोरा लटकाये प्राय: हर दिन देखी जा सकती हैं, एक नहीं अनेक लड़कियां ये लड़कियां किसी की लाड़ली बेटी है, किसी की बहन या बुआ हैं तो किसी की भानजी या भतीजियां हैं। विडम्बना है कि इनका जन्म ऐसे परिवार या ऐसे माहौल में हुआ है कि जहां इन्हें न तो कभी स्कूल की बस लेने आती हैं और न ही इनके माता-पिता उस हैसियत के रहे हैं कि वे उनको स्कूल में दाखिला दिला सके। सबेरा हुआ नहीं कि मुर्गे की बांग के साथ उठ जाना इनकी नियति है। पता नहीं,जब सुबह-सुबह ये लड़कियां अपना घर छोड़कर कांधे पर थैला टांगकर सड़कों पर निकलती है तो इन्हें सुबह की चाय भी नसीब होती है या नहीं ? गंदे, मैले-कुचेले कपड़ों में अपने बदन को ढांपकर निकल पड़ती है ये बेटियां अपने-अपने घरों से। बस्तियों के गली मुहल्लों में पिछले 24 घंटों के दरम्यान जितना कूड़ा-कचरा घर-घर से बाहर निकलकर आ जाता है, उनका गलियों में किसी एक पाइंट पर ढेर लग जाता है। इन ढेरों को कुरेद-कुरेद कर ये लड़कियां पता नहीं क्या, क्या खोज लेती हैं और अपने-थैलों में उन्हें डालती जाती हैं। मुहल्ले के लोग इन्हें पन्नी बीनने वाली बाइयां' कहते हैं। नाम तो हैं पन्नी बीनने का,किंतु उसके अलावा भी अलग-अलग कई घरों से कचरों के संग में फेंकी गई ऐसी-ऐसी कई वस्तुएं, डिब्बे-डिब्बियां, शीशियां और टिन-लोहे की वस्तुएं भी ये उठा उठाकर ले जाती हैं।

               हजारों की भीड़ में चल रहे लोगों में एक आध कोई व्यक्ति ऐसा निकल आता है जो ऐसा विडंबनापूर्ण जीवन जीने वाली इन किशोरियों की दयनीय दशा को देखकर चिंतन और मनन करता है तथा उन लड़कियों के इस अभिशप्त जीवन के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या इस तरह की सहानुभूति के प्रदर्शन मात्र से उनके अभिशप्त जीवन को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में किसी तरह की कामयाबी हासिल हो सकती है ? यह प्रश्न इतनी अधिक जटिलता लिए हुए है  कि जिसे सुलझा पाना समाज के किसी एक सामान्यजन के बूते की बात नहीं है। इस प्रगतिशील युग के दौर में इस तरह की सामाजिक-व्याधि का अस्तित्व में बने रहना ऐसा लगता है जैसे थैला लटकाकर, मैले-कुचैले कपड़ों में गलियों में घूम-घूमकर रोजी-रोटी तलाशती ये बालाऐं हमारी प्रबंधन नीतियों का मुंह चिढ़ा रही हैं।

               अच्छा पहनना, अच्छा खाना, अच्छे साफ सुथरे मकान में रहना, पढ़-लिखकर सुसंस्कृत और संभ्रांत कहलाने का अधिकार क्या कुछ ही लोगों को हैं ?जो एक विशेष रेखा के नीचे रहकर अपना गुजर बसर कर रहे हैं उनके जीवन में क्या इस तरह के सुखद अवसरों के लिए हमेशा दरवाजें बंद ही रहेंगे ?अनेक लोग इस तरह के जीवन के बारे में यह कहते हुए मिल जाएंगे कि,यह तो अपना अपना भाग्य है !ऐसे जीवन यापन करने वाले लोगों के जीवन में बदलाव लाकर उन्हें आत्मसम्मान से जीने और उन्हें अपने पांवों पर खड़ा करने की अनेक योजनाएं सरकार द्वारा संचालित की जा रही है। क्या इन योजनाओं के माध्यम से सड़कों पर पड़े कचरे में से रोजी-रोटी ढूंढने वालों के जीवन में प्रकाश की किरणें नहीं लाई जा सकती ?जरूर लाई जा सकती है। परंतु इसके लिए राजनैतिक और सामाजिक दृष्टि होना जरूरी है। प्रबंधन में इसके प्रति मजबूत इच्छाशक्ति का जब तक अभाव रहेगा तब तक कांधों पर थैला लादने वाली उस असहाय पीढ़ी के जीवन में किसी भी तरह का बदलाव संभव नहीं हो पायगा।

               कूड़े-कर्कट में से कचरा बीनने वाली लड़कियां अधिकतर 4 से 15 वर्ष की उम्र तक की देखी जा सकती हैं। यह उम्र वह होती है जब सामान्य परिवार के लड़के बच्चे शिक्षा ग्रहण करने पाठशालाओं में जाया करते हैं। सरकारें इस आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं को अनिवार्य शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत स्कूल भेजने के लिए कार्यक्रम संचालित करती हैं। लेकिन इस तरह की बालिकाओं और किशोरियों को जब कचरों के ढेरों के आसपास मंडराते हुए देखा जाता है तो लगता है कि शिक्षा की इस तरह की योजनाऐं और इस तरह के कार्यक्रम केवल विज्ञापनों के कालमों तक ही सीमित रह जाते हैं। एक तरफ तो बाल मजदूरी के खिलाफ सरकारें और कई अशासकीय संगठन अभियान चलाते रहते हैं किंतु कचरा बीनने के कार्य में लगे इन बाल श्रमिकों के कल्न्याण के प्रति किसी भी स्तर पर किसी भी तरह के अभियान की कोई ठोस शुरूआत नहीं दिखाई देती है।

                एक कहावत चली आ रही है-'गरीबी पाप का मूल होती है'। पता नहीं इस तरह की कहावत के जन्म का आधार क्या था, किंतु यह तो माना ही जा सकता है कि गरीबी एक अभिशाप है जिसके खिलाफ चल रहे अभियान में समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। एक तरह से देखा जाय तो इस तरह की कम उम्र की अशिक्षित और सामाजिक सरोकारों से कटकर जी रही इस  कार्य में जुड़ी लड़कियों में अपराधिक प्रवृत्तियों के जन्म लेने की संभावनाऐं बढ़ जाती हैं। कई ऐसे उदाहरण भी मिले हैं जब पन्नी बीनने वाली लड़कियां घरों के आसपास से छोटी-मोटी चीजें भी चोरी से उठाकर ले जाया करती हैं। इन किशोरियों की बढ़ती उम्र पर समाज में कतिपय बुरी नज़र रखने वाले मनचले भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं। इस वर्ग के कल्याण की दिशा में सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को विशेष धयान देने की जरूरत है। जिससे इस वर्ग की किशोरियों की रोजी-रोटी की समस्या हल हो सकेगी और उन्हें स्वावलंबी बनकर आत्मसम्मान के साथ अपने जीवन के गुजर बसर की नई दिशाऐं मिल सकेंगी।


? राजेन्द्र जोशी