संस्करण: 18  जून-2012

मप्र लोनिवि में फर्जीवाड़ा

 

? महेश बाग़ी

               निर्धारित से कम चौड़ाई की सड़कें, सिलेक्टेड स्वाइल की परत की मोटाई आधी,  लेकिन भुगतान पूरा? लोक निर्माण विभाग में  सड़क निर्माण की यह बिटलू-तकनीक  पिछले कुछ वर्षों से खूब परवान चढ़ रही है।  बिटलू महराज के 'काबिल' अधिकारियों ने  इस तकनीक का सफल प्रयोग मुख्यमंत्री के  पूर्व संसदीय क्षेत्र विदिशा जिले के शमशाबाद  क्षेत्र में बनी एक सड़क से किया है। इसतकनीक में सड़कें भले ही बनते-बनते टूट-फूट जाती हों,लेकिन संबंधित अधिकारी, ठेकेदार और खुद मंत्री महोदय के लिए संभवत: यह भारी मुनाफे का सौदा साबित होगा, तभी तो अनियमितताओं के उजागर हो चुके मामलों में सभी की जुबां खामोश है?

              भोपाल। बिटलू तकनीक से बन रही मध्यप्रदेश की सड़कों में भले ही उनके बनते से ही गङ्ढे उभरन लगें, लेकिन लोक निर्माण विभाग का मैदानी अमला इस तकनीक से बहुत खुश है। विभागीय जानकारों की मानें तो इस तकनीक में न तो सड़क निर्माण की गुणवत्ता पर ध्यान दने की जरूरत होती है,और न ही लागत-व्यय में किसी गाइड-लाइन पर अमल करने की बाध्यता आडे आती है? बिटलू महराज के आशीर्वाद से शिकायतों और विभागीय जांच जैसे झमेलों से भी इस तकनीक का पालन करने वाले अधिकारियों की सेहत हमेशा स्वस्थ बनी रहती है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के पूर्व संसदीय क्षेत्र विदिशा में 'बिटलू हाइवे' पैटर्न पर जिन सड़कों का निर्माण हुआ है, उनकी बानगी देखकर खुद मुख्यमंत्री भी इस तकनीक से अवश्य प्रभावित हुए होंगे, प्रशासनिक गलियारों में ऐसी खबरें हवा में तैरती नजर आने लगीं हैं?

                 क्या है बिटलू तकनीक : विदिशा जिले के शमशाबाद से कोटरा नामाखेड़ी, बेरखेड़ी, कोटीचार कला, सूखा सेमरा मार्ग बिटलू-तकनीक से सड़क निर्माण का एक उत्.ष्ट नमूना माना जाता है? इस सड़क की लंबाई से सड़क 21 किमी है, जिसे मे. रतन कंस्ट्रक्शन कंपनी भोपाल ने बनाया है। 730.00 लाख रुपए की प्रशासकीय स्वी.ति वाले इस निर्माण कार्य के लिए मुख्य अभियंता (राजधानी परिक्षेत्र), भोपाल ने अपने पत्र क्रमांक 1185 दिनांक 20608 के द्वारा 728.62 लाख रुपए की तकनीकी स्वी.ति प्रदान की थी। लेकिन अनुबंध क्रमांक 179डी2008-09 के माध्यम से ठेकेदार मे. रतन कंस्ट्रक्शन कंपनी के साथ विभाग ने जब निर्माण कार्य के लिए अनुबंध किया, तो अनुबंधित राशि बढ़कर 849.34 लाख हो गई। कार्यादेश दिनांक 17092010 को दिया गया था। बिटलू हाइवे के नाम से कुख्यात हो चुके इस 21 किमी लंबे मार्ग को निर्माण की .ष्टि से तीन भागों में बांटा गया था। गंगरवाड़ा से सांकलखेड़ा मार्ग (लंबाई 4.92 किमी), कोटरा नामाखेड़ी, बेरखेड़ी परर्निया मार्ग (लंबाई 9.72 किमी) और मडियासांकलखेड़ा से सूखा सेमरा मार्ग (लंबाई 7.88 किमी)।

              विभागीय जांच प्रतिवेदन में इन तीनों मार्गों के निर्माण में बिटलू-तकनीक की जिस कलाकारी का खुलासा किया गया है, उसके तथ्य चौंकाने वाले हैं। गंगरवाड़ा से सांकलखेड़ा मार्ग निर्माण के जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि सब ग्रेड की ऊपरी सतह की चौड़ाई माप पुस्तिका क्रमांक 2130 में 11.90 मी. दर्ज है, जबकि स्थल पर चौड़ाई मात्र 7.85 मी. है। इस तरह यह चौड़ाई निर्धारित से 4.05 मी. कम है। यह बिटलू तकनीक का पहला करिश्मा है।  इसी सड़क में सिलेक्टेड स्वाइल की सतह की मोटाई मार्ग के मध्य में केवल 25 सेमी पाई है, जबकि माप पुस्तिका में इसे 50 सेमी दर्ज किया गया है। बिटलू तकनीक में ऐसा ही होता है? इसी मार्ग के चैनेज 4500 में सब ग्रेड की ऊपरी सतह की चौड़ाई माप पस्तिका में 11.9 मी. दर्ज है, लेकिन जमीन पर यह चौड़ाई 4.40 मी. कम, अर्थात मात्र 7.50 मी. ही है। इसी में सिलेक्टेड स्वाइल की मोटाई मार्ग के मधय में 35 सेमी है, जबकि माप पुस्तिका में 50 सेमी दर्ज है। चैनेज 4400, 4200, 3500 और 1100 में भी बिटलू तकनीक पर अमल किया गया है और शायद यही कारण है कि माप पुस्तिका में दर्ज आंकडे वास्तविक स्थिति से कहीं भी मेल नहीं खा रहे। यह बात अलग है कि ठेकेदार को राशि का भुगतान माप पुस्तिका में दर्ज फर्जी आंकड़ों के आधार पर ही किया गया है? जांच प्रतिवेदन में सिलेक्टेड स्वाइल के नीचे ब्लैक काटन स्वाइल की लेयर पाए जाने पर भी घोर आपत्ति जताई गई है और इस हेतु उपयंत्री तथा सहायक यंत्री को उत्तरदायी माना गया है।

              कोटरा नामाखेड़ी-बेरखेड़ी-पुरर्निया मार्ग के चैनेज 1600 मीटर तक तक स्वाइल से खोदकर बीसी स्वाइल से ही एम्बेकमेंट बना दिया गया है एवं चैनेज 1700 में पिट खोदने पर पाया गया कि बाहर से सिलेक्टेड स्वाइल लाकर 20 सेमी की लेयर डाली गई है जिसका काम्पेक्शन अभी भी ठीक ढंग से नहीं किया गया है। मार्ग की चौड़ाई वास्तव में 8.90 मीटर पाई गई जबकि माप पुस्तिका 2130 में यह 11.90 मी. दर्ज है। इस प्रकार 3.00 मी. कम चौड़ाई की सड़क बना दी गई और भुगतान 11.90 मीटर के हिसाब से ले लिया गया। सिलेक्टेड स्वाइल की मोटाई भी 30 सेमी कम पाई गई है।

                चैनेज 2700 में भी सिलेक्टेड स्वाइल की मात्रा कम होने और बीसी स्वाइल का उपयोग करने के कारण पूरी सड़क पर क्रेक्स आ गए हैं। इस चैनेज में भी सड़क की चौड़ाई निर्धारित माप से 3.90 मी. कम पाई गई। चैनेज 3100 में तो और भी कमाल दिखाया गया है। माप पुस्तिका में दर्ज सड़क की चौड़ाई 11.90 से 4.90 मी. कम, अर्थात केवल 7.90 मी. चौड़ी सड़क का ही निर्माण किया गया है। यही हाल चैनेज 4900 में है। इसमें सड़क की चौड़ाई 8.10 मी. है, जो निर्धारित से 80 मी. कम है।  मडियासांकलखेड़ा से सूखा सेमरा मार्ग जिसकी लंबाई, 7.88 किमी है, में भी बिटलू तकनीक का खुलकर प्रयोग किया गया है। चैनेज 800 में सड़क की चौड़ाई 4.70 मी. और सिलेक्टेड स्वाइल की मोटाई 8 सेमी कम पाई गई है। यही हाल चैनेज 2400, 3400 और 5200 का भी है। कुल मिलाकर पूरी सड़क में निर्माण मापदंडों की अनदेखी की गई है। जिसकी वजह से लगभग पूरे मार्ग में दरारें पड़ गई हैं। तत्कालीन कार्यपालन यंत्री मुकेश निगम का कहना है कि उनके द्वारा प्रथम चल देयक का रनिंग माप के आधार पर भुगतान किया गया है जिसके लिए सहायक यंत्री, उपयंत्री तथा ठेकेदार जिम्मेदार हैं और इस अनियमितता के लिए उन सभी से स्पष्टीकरण मांगा गया है। यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि सिलेक्टेड स्वाइल के लिए 82978.50 घ.मी. मात्र के लिए भुगतान किया गया था, जबकि इसकी वास्तविक मात्रा 41862.50 घ.मी. ही थी। इस प्रकार ठेकेदार को 34 लाख 16 हजार रुपयों का अधिाक भुगतान कर दिया गया। हालांकि इस अनियमितता और अधिक भुगतान के लिए उप संभाग विदिशा के अनुविभागीय अधिकारी आरके सक्सेना और उपयंत्री एके सक्सेना को दिनांक 4-6-2011 को ही आरोप पत्र जारी कर दिए गए हैं, लेकिन उन पर आज तक क्या कार्यवाही की गई है, पता ही नहीं है।  यह तो महज एक उदाहरण है जो यह बताता है कि लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह के संरक्षण में प्रदेश में किस तरह सड़कों का निर्माण हो रहा है और किस तरह घटिया काम के लिए शासकीय धन लुटाया जा रहा है। चूंकि यह मामला विधानसभा में भी उठाया जा चुका है, इसलिए स्वाभाविक है कि यह मुख्यमंत्री को भी इसकी जानकारी होगी? फिर भी घटिया सड़क निर्माण और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर शासकीय राशि हड़पने के लिए जिम्मेदार लोगों पर कोई कार्यवाही न होना इस बात का संकेत है कि भ्रष्टाचार की बिटलू-तकनीक से मुख्यमंत्री भी सहमत हैं?

               प्रमुख सचिव ने बिगाड़ा बिचौलियों का खेल : लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह और इसी विभाग के प्रमुख सचिव के बीच मधुर व्यवहारिक संबंधों में इन दिनों कुछ कड़वाहट आने की खबरें चर्चा में है। विभागीय अधिकारियों के मैदानी अमले में ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर दोनों के बीच असहमति होना इसकी प्रमुख वजह बताई जा रही है। बताया जाता है कि मंत्री जी कुछ अधिकारियों को उनके मनचाहे स्थान पर पदस्थ करना चाह रहे थे, लेकिन प्रमुख सचिव ने मंत्री की मंशा के विपरीत संबंधित अधिकारियों को अन्यत्र पदस्थ करने के आदेश निकाल दिए। हालांकि यह एक सामान्य बात थी और इससे मंत्री की प्रतिष्ठा के आहत होने जैसा कोई सवाल नहीं था, लेकिन जानकार बताते हैं कि जिन लोगों ने मनचाही पोस्टिंग के लिए आर्थिक संसाधनों के माध्यम से मंत्री जी पर विश्वास जताया था, वे काम न हो पाने की वजह से स्वयं को लुटा सा महसूस कर रहे हैं। मंत्री जी की एक खासियत है कि यदि किसी के द्वारा उप.त होने हैं तो पूरी ईमानदारी से अपना वायदा निभाते हैं। परंतु इस मामले में प्रमुख सचिव को संभवत: कुछ भनक लग गई थी, इसलिए उन्होंने मंत्री जी की मंशा के विपरीत वह किया जो विभाग और लोकतंत्र की मर्यादाओं के हित में था। अब मंत्री से यादा उनका निजी स्टाफ परेशान है, क्योंकि मनचाही पोस्टिंग का प्रयास करने वाले अधिकारियों और मंत्री के बीच मौखिक-आर्थिक इकरारनामें को फायनल कराने में इस स्टाफ की भूमिका शुरू से अंत तक बिचौलिये की तरह तरह होती है, जिसमें इनके निजी स्वार्थ भी समाहित होते हैं। खबरे तो यह भी हैं कि मंत्री जी के स्टाफ के दो महत्वपूर्ण स्तंभों की कारगुजारियों की जानकारी प्रमुख सचिव तक पहुंच रही थी। ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामलों में मंत्री-स्टाफ के इन दिनों कतिपय बिचौलियों की विभागीय बडे अधिकारियों के कामकाज में अनावश्यक दखलंदाजी और दबाव की राजनीति के कारण ही प्रमुख सचिव को कड़ा रुख अपनाना पड़ा और यही बात नागेंद्र सिंह को नागवार गुजर गई। सवाल केवल मंत्री पद की सहज 'ठसक' का नहीं है, गोपनीय आर्थिक लेनदेन की उस विश्वसनीयता का भी है, जिसके लिए लोक निर्माण विभाग हमेशा से बदनाम और इस विभाग के मंत्री नागेंद्र सिंह सुर्खियों में बने रहे हैं? यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नागेंद्र सिंह वाकई मुख्यमंत्री को 'हकीकत' से अवगत कराएंगे। या केवल अपनी खीझ मिटाने के लिए ऐसी खबरें उड़ाई जा रही हैं। यह बात तर्क संगत है कि निजी स्टॉफ में कार्यरत कोई भी अधिकारी-कर्मचारी अपने मंत्री की इच्छा-निर्देश के विरुध्द कोई भी मनमानी नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में यदि लोनिवि मंत्री के स्टॉफ के ये दोनों 'बिचौलिए' अपने निर्धारित काम से अधिक तथाकथित व्यावसायिक गतिविधियों में यादा रुचि लेते हैं तो स्वाभाविक रूप से मानना पडेग़ा कि उनकी गतिविधियों को मंत्री महोदय का सहयोग और संरक्षण दोनों ही प्राप्त है। विभाग में बदनामी का बवंडर भी इन्हीं कारणों से उठता है। प्रमुख सचिव चाहते हैं कि विभाग की गतिविधियां पारदर्शी और राय के हित में हों, उनके द्वारा वर्तमान में बरती गई सख्ती की वजह भी शायद यही है।


? महेश बाग़ी