संस्करण: 18  जून-2012

अकाली दल का एसजीपीसी ग्रंथी को समर्थन भाजपा भी अवसरवादिता दिखा रही है

? बी.के.चम

               चंडीगढ़: पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं, जो पंजाब और देश के लिए शुभ नहीं हैं। दोनों घटनाएं एक दूसरे से जुड़ी हैं। उन घटनाओं पर सत्तारूढ़ अकाली दल ने जो रवैया अपनाया है, वह आपत्तिजनक तो है ही, सहयोगी भाजपा ने चुप्पी साधकर अपनी अवसरवादिता का प्रदर्शन किया है।

               एक घटना आपरेशन ब्लू स्टार का स्मारक बनाने से संबंधित है। दूसरी घटना बेअंत सिंह के हत्यारे राजौना को जिंदा शहीद घोषित करने की है। गौरतलब है कि 1984 में जून महीने में आपरेशन ब्लू स्टार हुआ था, जिसके तहत सेना ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर और अकाली तख्त से आतंकवादियों को निकाल बाहर करने के लिए कार्रवाई की थी। उस कार्रवाई के दौरान आतंकवादियों के साथ साथ स्वर्ण मंदिर में उस समय स्थित अनेक निर्दोष लोग भी मारे गए थे। अकाल तख्त को भी नुकसान पहुंचा था।

                मुख्य ग्रंथियों ने जहां आपरेशन ब्लू स्टार का स्मारक बनाने का फैसला किया, तो अकाली दल के जत्थेदार ने राजौना को जिंदा शहीद घोषित कर दिया। राजौना ने बेअंत सिंह की हत्या कर दी थी। श्री सिंह पंजाब के मुख्यमत्री थे और उस हैसियत से उन्होंने आतंकवाद ग्रस्त राज्य में शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शांति स्थापित करने के लिए बल का प्रयोग करना पड़ा था और उसके कारण ही उनकी हत्या की गई थी।

               मुख्य ग्रंथियों और अकाली तख्त के जत्थेदार से जुड़ी इन घटनाओं पर अकाली दल का रवैया गैर जिम्मेदाराना रहा। उपमुख्यमंत्री सुखवीर सिंह बादल ने तो पहले स्मारक बनाने को उचित ठहराया और कहा कि इसे उन निर्दोश लोगों की याद में बनाया जा रहा है, जो आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान मारे गए थे। उनका यह कहना सही हो सकता था, यदि आपरेशन ब्लू स्टार का उद्देश्य निर्दोष लोगों को मारना रहता, पर सच्चाई यह है कि वह सैनिक आपरेशन स्वर्ण मंदिर परिसर में घुसे आतंकवादियों के सफाये के लिए किया गया था। वे आतंकवादी उस परिसर में पनाह लेकर वहां से पंजाब के लोगों की हत्या कर रहे थे। 1980 के दशक में हत्याओं का दौर चल रहा था। बसों से उतारकर लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता था। हिंदुओं ही नहीं, बल्कि सिखों की भी हत्या की जा रही थी। सच तो यह है कि उन आतंकवादियों के शिकार हिंदू से ज्यादा सिख हो रहे थे। उन्हें स्वर्ण मंदिर परिसर से बाहर निकालने के लिए आपरेशन ब्लू स्टार के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह गया था।

               इसलिए इस तरह का स्मारक बनाना अपने आपमें गलत है। जब उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल की आलोचना होने लगी,तो वे कहने लगे कि स्मारक बनाने अथवा राजौना को जिंदा शहीद घोषित करने में उनके दल की कोई भूमिका नहीं हैं। मुख्य ग्रंथी स्मारक बनवा रहे हैं और अकाली तख्त के जत्थेदार ने राजौना को जिंदा शहीद घोषित किया है।

                 इस तरह का बयान देकर सुखबीर किसे मूर्ख बना रहे हैं? सबको पता है कि मुख्य ग्रंथियों और अकाली दल के जत्थेदार की नियुक्ति शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के द्वारा किया जा सकता है। यह भी सबको पता है कि उस कमिटी पर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह का नियंत्रण हैं। कमिटी के प्रबंधक प्रकाश सिंह बादल द्वारा तय किये गये लोग ही हैं। उनके द्वारा वे खुद उस पर नियंत्रण करते हैं और जत्थेदार हों यह मुख्य ग्रंथी, सब पर परोक्ष रूप से प्रकाश सिंह बादल का ही नियंत्रण है। इसलिए वे जो कुछ भी कर रहे हैं, वे बिना बादल के सहमति के हो ही नहीं सकते।

                दरअसल प्रकाश सिंह बादल चुनाव जीत कर आए हैं, तो उसका एक कारण राज्य के उग्रवादी तत्वों का चुनाव के दौरान उन्हें मिला समर्थन भी था। दमदमी टकसाल ने उनकी पार्टी का समर्थन किया था। अब अकाली दल की ओर से कहा जा रहा है कि ये स्मारक इसलिए बनाए जा रहे हैं, ताकि उग्रवादी तत्वों को लोगों के बीच कमजोर किया जा सका। इस तरह का तर्क कितना गलत है, हम जानते हैं। इसी तर्क के द्वारा ज्ञानी जैल सिंह व कुछ अन्य कांग्रेसी नेताओं ने 1980 के दशक में उग्रवादी तत्वों को संरक्षण दिया था, पर इतिहास जानता है कि उसका क्या हश्र हुआ।

               अकाली दल की राजनीति तो अपनी जगह है, पर सत्ता में उसकी सहयोगी के रूप में शामिल भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मसले पर चुप्पी साधा ली है। उसकी यह चुप्पी अवसरवादी राजनीति का एक नमूना है।

? बी.के.चम